पूर्वी और पश्चिमी हिन्दी में अन्तर - difference between eastern and western hindi

पूर्वी और पश्चिमी हिन्दी - ये नाम ग्रियर्सन के रखे हुए हैं। वे केवल आठ बोलियों को ही भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से हिन्दी के अन्तर्गत मानते थे। इन दोनों में अन्तर मूलतः इनकी भौगोलिक स्थिति तथा इन दोनों के इतिहास पर आधारित है। भौगोलिक दृष्टि से 'पश्चिमी हिन्दी' पंजाबी, राजस्थानी, पहाड़ी, पूर्वी हिन्दी तथा मराठी भाषाओं के बीच में है, अतः उसमें इन भाषाओं की कुछ बातें न्यूनाधिक रूप में पायी जाती हैं। दूसरी ओर, 'पूर्वी हिन्दी' पहाड़ी, बिहारी, उड़िया, मराठी तथा पश्चिमी हिन्दी के बीच में है। अतः उसमें इनकी विशेषताएँ अंशतः समाहित हैं। 'पश्चिमी हिन्दी' शौरसेनी से उद्भूत है, अतः उसे उक्त अपभ्रंश की परम्पराएँ मिली हैं,

जबकि 'पूर्वी हिन्दी' अर्द्धमागधी से विकसित हुई है इसलिए उसमें पूर्वी शौरसेनी तथा पश्चिमी मागधी की विशेषताएँ मिल गई हैं। इन दोनों में मुख्य अन्तर निम्नांकित हैं-


(1) ध्वनि के आधार पर पूर्वी हिन्दी में 'अ' ध्वनि का उच्चारण 'ओ' के निकट होता है जबकि पश्चिमी हिन्दी में ह्रस्व 'इ', 'उ' का उच्चारण दीर्घ 'ई', 'ऊ' के निकट होता है। पूर्वी हिन्दी में दो स्वर एक साथ आते हैं जबकि पश्चिमी हिन्दी में नहीं। पूर्वी हिन्दी में 'र', 'ल' हो जाता है, इसी प्रकार पश्चिमी हिन्दी में 'शब्द के आदि में प्रयुक्त 'य', 'व' ध्वनि पूर्वी हिन्दी में 'ए' हो जाते हैं।

पश्चिमी हिन्दी में आकारान्त या ओकारान्त पूर्वी हिन्दी में अकारान्त ही रह जाते हैं पश्चिमी हिन्दी का 'बड़ा' पूर्वी हिन्दी में 'बड़ो' या 'बड' हो जाता है।


(2) वाक्य-रचना के आधार पर पूर्वी और पश्चिमी हिन्दी का सबसे महत्त्वपूर्ण अन्तर वाक्य रचना से - सम्बन्धित है। इसी विशेषता को आधार बनाकर डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने भारतीय आर्यभाषाओं को दो भागों में विभाजित किया है। उक्त विभाजन का आधार लेकर कहा जा सकता है कि पश्चिमी हिन्दी कर्म प्रयोग प्रधान भाषाओं के साथ आती है और पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ कर्त्री प्रयोग प्रधान भाषाओं के साथ