तत्पुरुष समास के भेद - Differences of Tatpurush Samas
यह तो आप जान ही गए हैं कि तत्पुरुष समास में भी पूर्वपद गौण तथा उत्तरपद प्रधान होता है। ऊपर हमने जिन तत्पुरुष समासों के उपभेद प्रस्तुत किए वे सब कारकीय सम्बन्धों वाले उदाहरण हैं। लेकिन कुछ तत्पुरुष समास ऐसे भी होते हैं जिनके दोनों पदों के बीच कारकीय सम्बन्ध नहीं होता, अतः उनका विग्रह करते समय कारकीय चिह्न या परसर्ग नहीं लगाए जाते। ऐसे तत्पुरुष समास दो तरह के हो सकते हैं - (क) कर्मधारय समास तथा (ख) द्विगु समास । चूँकि कर्मधारय तथा द्विगु दोनों ही तत्पुरुष समास के उपभेद हैं अतः यह ध्यान रखना चाहिए कि इनका पूर्व पद हमेशा विशेषण तथा उत्तर पद विशेष्य होगा. इनमें भी यदि पूर्व पद संख्यावाची विशेषण है तो वह 'द्विगु समास' के अन्तर्गत आएगा और यदि कोई अन्य विशेषण है तो वह 'कर्मधारय समास' के अन्तर्गत ।
(क) कर्मधारय समास -
जैसा ऊपर बताया गया 'कर्मधारय समास' के पूर्वपद तथा उत्तरपद के बीच विशेषण- विशेष्य सम्बन्ध होता है तथा विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच कारकीय चिह्न नहीं आते। यह विशेषण विशेष्य सम्बन्ध दो तरह का हो सकता है-
क. संख्यावाची विशेषण को छोड़कर पूर्व पद कोई भी विशेषण हो ।
ख. पूर्वपद तथा उत्तर पद के बीच उपमेय- उपमान का सम्बन्ध हो ।
ध्यान रखिए, उपमेय विशेषण का कार्य करता है तथा उपमान विशेष्य का।
(ख) द्विगु समास-
आपको ऊपर बताया जा चुका है कि द्विगु समास भी तत्पुरुष समास का ही भेद है, क्योंकि इसका भी पूर्वपद विशेषण होने के कारण गौण तथा उत्तरपद विशेष्य होने के कारण प्रधान होता है, पर ध्यान रखिए द्विगु समास का पूर्व पद हमेशा संख्यावाची विशेषण ही होता है। इसके अलावा इसका उत्तरपद किसी समूह का बोध कराता है। अतः विग्रह करते समय उत्तरपद के साथ 'समूह' या 'समाहार' शब्द का प्रयोग अवश्य किया जाता है।
यहाँ एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि यदि विग्रह करते समय उत्तरपद के साथ 'समूह' या 'समाहार' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया तो पूर्वपद संख्यावाची होते हुए भी यह 'कर्मधारय समास' का उदाहरण माना जाएगा।
बहुब्रीहि समास
बहुब्रीहि समास के दोनों पद गौण होते हैं तथा दोनों पद एक जोड़े के रूप में आते हैं जिससे कोई तीसरा पद ही प्रधान हो जाता है। वास्तव में बहुब्रीहि समास में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ में रूढ़ हो जाते हैं और उसका वही अर्थ हर व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया जाता है। उदाहरण के लिए 'दशानन' शब्द में 'दश' तथा 'आनन' एक जोड़े के रूप में आए हैं और दोनों मिलकर 'रावण' के अर्थ में रूढ़ हो गए हैं।
दो पदों का जोड़े के रूप में आने से तात्पर्य है कि दोनों में से किसी भी पद को उसके समानार्थी शब्द से 'रिप्लेस' नहीं किया जा सकता।
'दशानन' में यदि 'आनन' के स्थान पर 'मुख' रिप्लेस किया जाए तो 'दश' तथा 'मुख' के मेल से (दशमुख) तो तीसरा अर्थ 'रावण' नहीं निकलेगा।
यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि 'कर्मधारय', 'द्विगु' तथा बहुब्रीहि तीनों के उदाहरण समान हो सकते हैं। तीनों का अन्तर विग्रह के आधार पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए 'चतुर्भुज' शब्द 'चतुर' तथा 'भुज' दो पदों से मिलकर बना है। यदि इस शब्द का विग्रह 'चार भुजाएँ हैं जो' किया जाएगा तो 'विशेषण' तथा 'विशेष्य' होने के कारण यह 'कर्मधारय समास' का उदाहरण होगा,
किन्तु यदि इसका विग्रह 'चार भुजाओं का समाहार' किया जाएगा तो यह द्विगु समास का उदाहरण बन जाएगा तथा यदि इसका विग्रह 'चार भुजाएँ हैं जिसकी अर्थात् विष्णु' किया जाएगा तो यही उदाहरण 'बहुब्रीहि समास' का हो जाएगा, क्योंकि इस विग्रह में 'चतुर' तथा 'भुज' दोनों पद जोड़े के रूप में तीसरे पद 'विष्णु' की विशेषता बता रहे हैं। अतः समास का निर्धारण विग्रह के आधार पर करना चाहिए।
द्वन्द्व समास
द्वन्द्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं तथा दोनों पद समुच्चयबोधक अव्यय 'और', 'या' ' अथवा ' आदि से जुड़े रहते हैं।
समास होने पर इन समुच्चयबोधक अव्ययों का लोप कर दिया जाता है तथा विग्रह करते समय इनको लगाकर लिखा जाता है। जैसे, 'भाई-बहन' समस्त पद का विग्रह होगा भाई और बहन। ध्यान रखिए द्वन्द्व समास के दोनों पद या तो 'संज्ञा + संज्ञा' होते हैं या 'विशेषण + विशेषण' या 'क्रिया + क्रिया।
अव्ययीभाव समास
जिस समास का पहला पद कोई अव्यय या अविकारी शब्द होता है उस समास को 'अव्ययीभाव समास' कहा जाता है जैसे 'प्रतिदिन' समस्त पद 'प्रति' और 'दिन' पदों के योग से बना है। इसका पूर्वपद 'प्रति' एक अव्यय है और इसका विग्रह 'दिन-दिन' किया जाएगा।
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