अपभ्रंश के भेद - distinctions of apabhramsa
मार्कण्डेय (17वीं शती) ने प्राकृत सर्वस्व में अपभ्रंश के तीन भेद माने हैं नागर, उपनागर और ब्राचड़। नागर, गुजरात की अपभ्रंश, ब्राचड़ सिन्ध की उपनागर दोनों के मध्य की मानी है। स्पष्टतया यह पश्चिमी प्राकृतों का ही विभाजन है। सामान्यतया विद्वानों का मत है कि प्राचीन पाँच प्राकृतों से पाँच अपभ्रंशों का विकास हुआ। इनसे ही आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ विकसित हुई। प्राचीन प्राकृत और वर्तमान भारतीय भाषाओं को मिलाने वाली कड़ी वस्तुतः अपभ्रंश भाषाएँ हैं।
प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी डॉ. भोलानाथ तिवारी ने विभिन्न प्राकृतों से विकसित अपभ्रंश के निम्नलिखित सात भेद स्वीकार किए हैं, जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं / उपभाषाओं का जन्म हुआ-
(1) शौरसेनी
(ii) पैशाची
(iii) ब्राचड़
(iv) खस : पहाड़ी
पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी और गुजराती
लहँदा, पंजाबी
(v) महाराष्ट्री
मराठी
(vi) मागधी
बिहारी, बांग्ला, उड़िया व असमिया
(vii) अर्द्धमागधी :
पूर्वी हिन्दी
अपभ्रंश के उपर्युक्त सात रूपों से आधुनिक भाषाओं या भाषा वर्गों के तेरह रूपों का विकास हुआ है। कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा का विकास अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी और अर्द्धमागधी रूपों से हुआ है।
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