भाषा के तत्त्व - elements of language

भाषा की संरचना या संघटना में विभिन्न तत्त्वों का योगदान रहता है। इन तत्त्वों में मुख्य हैं ध्वनितत्त्व, - रूपतत्त्व, अर्थतत्त्व तथा शब्दतत्त्व। ध्वनि भाषा का मुख्य तत्त्व है। वही भाषा का मूलाधार होती है। ध्वनि आशय है स्वर, व्यंजन आदि स्वर (ध्वनियाँ) भाषा में स्वरों और व्यंजनों के साथ मात्रा, सुर और बलाघात जैसे तत्त्वों - का भी योगदान होता है। भाषा के निर्माण में रूप तत्त्व का भी प्रबल योगदान रहता है। डॉ. सरयूप्रसाद अग्रवाल कहते हैं कि - "ध्वनियों को ही लघुतम अर्थ पूर्ण इकाईयों के रूप में प्रयोग करने पर हम रूप की संज्ञा देते हैं।

वास्तव में 'रूप' ही भाषा की लघुतम अर्थपूर्ण इकाई होते हैं, जिनमें एक अथवा अनेक ध्वनियों का प्रयोग किया जाता है।" भाषा के इस महत्त्वपूर्ण तत्त्व को भाषाविदों ने मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा है शब्द तथा पद । - पाणिनि ने शब्द के जहाँ दो भेद सुबन्त तथा तिङन्त किये हैं, तो आचार्य यास्क ने निरुक्त में चार भेद नाम, - - आख्यात, उपसर्ग तथा निपात। स्थूल रूप में इन्हें ही अर्थतत्त्व और सम्बन्धतत्त्व भी कहा जाता है।


भाषा के अंग या अवयव


भाषा के अंग और तत्त्व, क्या ये दो भिन्न-भिन्न अस्तित्व के बोधक हैं या एक ही हैं। कुछ भाषाविदों का मानना है कि यदि हाथ, पैर, गला, कान, नाक, आँख आदि शरीर के अंग है तो इन्हें जीवन्त और पुष्ट बनाये रखने के लिए उचित खुराक पहुँचाने वाले मांस-मज्जा, खून आदि 'तत्त्व' की श्रेणी में आयेंगे। बहरहाल इनमें इनमें कोई स्थूल अन्तर नहीं है। विद्वानों ने वाक्य, रूप, ध्वनि (स्वन), शब्द तथा अर्थ को भाषा का महत्त्वपूर्ण अंग माना है।