मनोविश्लेषणवादी आलोचना का मूल्यांकन - Evaluation of Psychoanalytic Criticism
मनोविश्लेषणवाद के अनुसार साहित्यिक रचनाएँ मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं को परिलक्षित करती हैं । फ्रायड के अनुसार साहित्यिक रचना स्वप्न की तरह अवचेतन मन की ऊर्जा का प्रतिफलन होती है। साहित्यिक रचना रचनाकार के अन्तर्मन को अभिव्यक्त करती है। साहित्यिक कृति में वर्णित जटिल अन्तर्वस्तु और गूढार्थ को विश्लेषित करने तथा प्रतीकों और मिथकों को समझने में मनोविश्लेषणवादी दृष्टि सहायक हुई है। इससे रचनाकार के व्यक्तित्व में छिपे हुए मनोवैज्ञानिक निहितार्थों को पहचानना और रचना के मनोवैज्ञानिक यथार्थ का मूल्यांकन कर पाना सम्भव हुआ।
मनोविश्लेषणवादी आलोचना में एक रचना को लेखक के व्यक्तित्व, उसकी मानसिक दशा, भावनाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति मान कर उसका मूल्यांकन किया जाता है। मुख्य आधार यह है कि एक साहित्यिक रचना उसके लेखक की मानसिक विशेषताओं से सम्बद्ध होती है। रचना की व्याख्या और विश्लेषण में लेखक के व्यक्तित्व को दृष्टिगत रखकर निर्णय दिया जाता है। इस पद्धति में यह माना जाता है कि रचना के अर्थ-ग्रहण की दृष्टि से लेखक और पात्रों के मनोविज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है।
मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों के आधार पर कला और साहित्य का सम्यक् विवेचन और मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ।
मनोविश्लेषणवादी कला-चिन्तन में पूर्वाग्रह और अतिवाद बहुत स्पष्ट है। मनोविश्लेषण के अनुसार कलाकार को मनस्तापी मान लेने से कला में अव्यवस्था आ जाती है, लेकिन वास्तविक अर्थों में कला व्यवस्था, सौन्दर्य और यथार्थ का चित्रण है जो मानसिक अस्वस्थता की स्थिति में सम्भव नहीं है। फ्रायड ने कला को यौन इच्छा के निर्गम का साधन कहते समय यह भी कहा है कि इसे सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है। अपर्याप्त सामग्री के आधार पर प्रस्तुत उसकी यह मान्यता स्वतः ही अन्तर्विरोधी सिद्ध हो जाती है। फ़्रायड कला के साथ-साथ धर्म और संस्कृति को भी उदात्तीकरण के विभिन्न रूप मानता है।
कला हमारे यौन आवेगों का उदात्तीकृत रूप है। उसके अनुसार कला के निर्माण में कलाकार का ध्यान यौन उद्देश्यों से हटकर अन्य सामाजिक दृष्टि से मूल्यवान् उद्देश्यों की ओर चला जाता है। लेकिन संस्कृति से मनुष्य कासम्बन्ध और उससे प्राप्त सन्तुष्टि यौन सन्तुष्टि से उच्चतर होती है। मनोविश्लेषण मनुष्य के सांस्कृतिक सम्बन्धों की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। इस प्रकार कला को फैंटेसी या रम्यकल्पना बताकर उसके क्षेत्र, उद्देश्य और आधार को संकुचित कर दिया गया है जिससे कला निष्प्रयोजन और आधारहीन काल्पनिकता मात्र बन जाती है।
मनोविश्लेषण में कलात्मक बिम्बों और प्रतीकों को मानसिक व्याधियों से जोड़कर देखा जाता है। इनके आधार पर कलाकार की मनोग्रन्थियों और कुण्ठाओं की व्याख्या की जाती है।
कला में बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग कलात्मक उत्कर्ष के लिए होता है, जिसमें कलाकार का कला-कौशल प्रकट होता है। मनोग्रन्थियों और कुण्ठाओं के आधार पर उत्कृष्ट कला का सृजन नहीं हो सकता । मनोविश्लेषण की यह मान्यता कलाकार को मनस्तापी मानने के समान ही निराधार है। युंग ने 'अन्तर्मुखी' और 'बहिर्मुखी' दो प्रकार के व्यक्तित्व माने हैं। अन्तर्मुखी व्यक्ति भावुक, एकान्तप्रिय, शर्मीले और व्यावहारिक जीवन में अकुशल होते हैं। इनकी कला में स्वच्छन्दता होती है। बहिर्मुखी व्यक्ति व्यवहार कुशल, सक्रिय और लोकप्रिय होते हैं और कला में आभिजात्य का प्रदर्शन करते हैं। यह अवधारणा बहुत सामान्य है जिसे बिना किसी सैद्धान्तिक आधार के जनजीवन में पहले से मान्यता प्राप्त है।
मनोविश्लेषणवाद के अनुसार मनुष्य की समस्त क्रियाएँ उसके अवचेतन से संचालित होती हैं। और प्रत्यक्षतः उन पर व्यक्ति का कोई नियन्त्रण नहीं है। यह विचार मनुष्य को आचरण की कोई स्वतन्त्रता नहीं देता है। स्वतन्त्रता के अभाव में वह सभी तरह के नैतिक-अनैतिक उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाता है। व्यावहारिक जीवन में यह अवधारणा अनर्थकारी सिद्ध हो सकती है। कलाकार अपनी रचना का नैतिकता उत्तरदायित्व नहीं छोड़ सकता । नैतिक उत्तरदायित्व मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता सुनिश्चित करता है। इसलिए मनोविश्लेषणवाद एक प्रकार का नियतत्ववाद है और साहित्य के क्षेत्र में कोई सुनिश्चित दृष्टि प्रदान नहीं करता है।
मनोविश्लेषणवादी आलोचना में रचना की विषयवस्तु के उत्कर्ष - अपकर्ष तथा उसकी सफलता- असफलता के सम्बन्ध में निर्णय करने की दृष्टि से उपयोगी उपागम नहीं है। उसका ध्यान मानसिक रूप में घटित होने वाली क्रियाओं पर रहता है, उसकी कलात्मक सम्भावनाओं को वह नहीं देख पाती है। यह पद्धति कलात्मक प्रतिभा की प्रकृति की व्याख्या करने तथा कलात्मक शिल्पविधान के सम्बन्ध में कुछ भी बता पाने में असमर्थ है।
कलात्मक रूप की प्रक्रिया सम्बन्धी पक्ष तो मनोविज्ञान का विषय हो सकता है, लेकिन जो पक्ष उसकी प्रकृति का निर्माण करता है अर्थात् यह बताता है कि कला अपने आप में क्या है, मनोविज्ञान का विषय नहीं हो सकता। मनोविश्लेषणवाद यह भी नहीं बता सकता कि एक कलाकृति के रूप में किसी कृति का मूल्य क्या है और उसके मूल्य के निर्धारण का आधार क्या है? इतना ही नहीं, किसी साहित्यिक कृति के मूल्य का निर्धारण उसकी सम्प्रेषण-क्षमता और कलात्मक सौन्दर्य के आधार पर भी होता है। मनोविश्लेषणवाद इस सौन्दर्य के उद्घाटन की दृष्टि से सर्वथा अनुपयुक्त है, क्योंकि साहित्य के इन तत्त्वों की ओर वह कोई ध्यान नहीं देता है ।
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