कारक भेद-प्रभेद: परम्परागत आधार पर - Factor Discrimination: On Traditional Basis

संस्कृत वैयाकरणों ने कारकों के छह भेद किए थे कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान तथा अधिकरण। इन सभी कारकों को भाषा में व्यक्त करने के लिए तीनों वचनों में विभक्तियों के प्रत्यय लगते थे जिससे सभी कारकों में संज्ञाओं के अलग-अलग रूप सामने आते थे, जैसे 'पुस्तक' शब्द के 'पुस्तकम्', 'पुस्तके', 'पुस्तकानि' जैसे विभिन्न रूप। संस्कृत में दो संज्ञाओं के बीच के सम्बन्ध को दिखाने के लिए तथा वक्ता द्वारा किसी संज्ञा को सम्बोधित करने के लिए भी उस संज्ञा शब्द में विभक्ति प्रत्यय लगते थे और इनके भी तीनों वचनों में भिन्न रूप मिलते थे।

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अतः आगे चलकर संस्कृत के कुछ वैयाकरणों ने सम्बन्ध तथा सम्बोधनों को भी कारकों की सूची में जोड़ दिया और आगे आने वाले लोग कारकों की संख्या छह के स्थान पर आठ मानने लगे।


वस्तुतः 'सम्बन्ध' और 'सम्बोधन' को कारक इसलिए नहीं माना जाना चाहिए था क्योंकि 'सम्बन्ध' के अन्तर्गत दो संज्ञाओं का परस्पर सम्बन्ध दिखाया जाता है तथा 'सम्बोधन' में वक्ता द्वारा किसी व्यक्ति को सम्बोधित किया जाता है जबकि 'कारक' का अर्थ था वाक्य की संज्ञाओं का क्रिया के साथ सम्बन्ध ।

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यही परम्परा हिन्दी में भी चली आई और हिन्दी में आठ कारकों का उल्लेख किया जाने लगा। ऐसी स्थिति के लिए कुछ लोगों ने 'कारक' की परिभाषा में ही संशोधन कर दिया और कारक की नयी परिभाषा इस प्रकार दे डाली - "वाक्य में आने वाली संज्ञाओं का परस्पर तथा क्रिया के साथ जो सम्बन्ध है, उसे कारक कहते हैं।" वास्तव में 'सम्बन्ध' और सम्बोधन' को कारक नहीं माना जाना चाहिए जैसा ऊपर स्पष्ट किया गया था, कारकों (संज्ञा-क्रिया सम्बन्ध) को संस्कृत में विभक्ति चिह्नों या रूपसाधक प्रत्ययों द्वारा व्यक्त किया जाता है तो हिन्दी में परसर्गों द्वारा ।

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संस्कृत में प्रत्येक कारक के लिए तीनों वचनों में में विभक्तिचिह्न निर्धारित थे। उसी का अनुसरण करते हुए हिन्दी के बहुत से व्याकरण-लेखकों ने हिन्दी में भी प्रत्येक करक के लिए कुछ कारकीय चिह्न या परसर्ग निर्धारित कर दिए


परन्तु हिन्दी में कुछ कारकों जैसे कर्त्ता, कर्म आदि के लिए केवल एक-दो चिह्न (परसर्ग) मात्र निर्धारित करने से इन कारकों के क्रिया के साथ सम्बन्ध स्पष्ट नहीं किए जा सकते। इन सम्बन्धों को स्पष्ट करने के लिए अन्य कारकीय चिह्नों या परसर्गों को निर्दिष्ट किये जाने की आवश्यकता है। कारकों के भेद-प्रभेद के प्रसंग में अलग-अलग कारकों के सभी कारकीय चिह्नों को स्पष्ट किया जाएगा।