कारक - Factor
कारक से तात्पर्य
वाक्य में जितने भी संज्ञा शब्द आते हैं उनका वाक्य की क्रिया के साथ कोई न कोई सम्बन्ध अवश्य होता है। कोई 'संज्ञा' उस क्रिया को 'पूरा करने' का काम करती है, किसी संज्ञा पर उस क्रिया का 'प्रभाव' पड़ता है, कोई संज्ञा उस क्रिया के पूरा होने में 'साधन' बनती है तो कोई संज्ञा उस क्रिया के घटित होने का 'आधार'। एक उदाहरण से इस बात को समझने की कोशिश कीजिए-
'बच्चे ने बोतल से दूध पिया।' इस वाक्य की क्रिया है- 'पीना'। इसको पूरा करने में तीन संज्ञाएँ- 'बच्चा', 'बोतल' तथा 'दूध' अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभा रही हैं।
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पीने का काम करने वाली संज्ञा है- 'बच्चा', पिए जाने वाली वस्तु है- 'दूध' तथा (दूध) पिए जाने का साधन है 'बोतल' कहने का तात्पर्य यही है कि - 1 'पीना' क्रिया के साथ वाक्य की सभी संज्ञाएँ किसी न किसी रूप से जुड़ी हुई हैं या उनका क्रिया के साथ कोई न कोई सम्बन्ध अवश्य है। वाक्य की संज्ञाओं का क्रिया के साथ जो सम्बन्ध होता है, व्याकरण में उसी सम्बन्ध को 'कारक' कहते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि वाक्य की संज्ञाओं और क्रिया के बीच के इस सम्बन्ध को कैसे पहचाना जाए ?
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वास्तव में हर भाषा इस 'सम्बन्ध' को अलग-अलग ढंग से व्यक्त करती है। हिन्दी में इस सम्बन्ध को 'परसर्गो' (ने, से, को, पर आदि चिह्न) के माध्यम से व्यक्त किया जाता है अतः परसर्गों को 'कारकीय चिह्न' भी कहते हैं।
कारक की परिभाषा : 'कारक' वह व्याकरणिक कोटि है जो यह बताती है कि वाक्य की विभिन्न संज्ञाओं का
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