संज्ञा शब्दों का लिंग निर्धारण - gender of nouns

अतः ध्यान रखिए भाषा में अभिव्यक्ति देता है व्यक्ति और स्वीकृति देता है समाज किसी प्रयोग को जब एक बार समाज स्वीकार कर लेता है तब व्यक्ति उसमें अन्तर नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए हिन्दी में 'माला' तथा 'ताला' दोनों आकारान्त संज्ञा शब्द इनमें से किसी प्रयोक्ता ने 'ताला' शब्द का पहली बार प्रयोग पुल्लिंग में तथा 'माला' शब्द का स्त्रीलिंग में कर दिया और सारे समाज ने उसे स्वीकार कर लिया तो 'ताला' पुल्लिंगतथा 'माला' स्त्रीलिंग शब्द बन गया।


चूँकि संस्कृत में तीन लिंग थे अतः वहाँ लिंग सम्बन्धी नियम अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित थे परन्तु हिन्दी में दो लिंग रह जाने के कारण हिन्दी की लिंग व्यवस्था अव्यवस्थित हो गई। नियम उतने स्पष्ट न रह गए। उनमें लचरता आ गई।

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यही कारण है कि हिन्दी को द्वितीय भाषा के रूप में सीखने वाले छात्रों की अभिव्यक्ति में लिंग सम्बन्धी अशुद्धियाँ इसलिए दिखाई देती हैं क्योंकि उन्हें संज्ञा शब्दों के सही लिंग का ज्ञान नहीं होता। उदाहरण के लिए यदि किसी शिक्षार्थी को 'रोटी' और 'चावल' शब्दों के सही लिंग का बोध नहीं है तो वह इस प्रकार की त्रुटियाँ कर सकता है-


(i) बच्चे ने आज चावल नहीं खाई।


(ii) माँ ने आज रोटी नहीं बनाया।


द्वितीय भाषाभाषी शिक्षार्थी हिन्दी में लिंग सम्बन्धी त्रुटियाँ न करें इसके लिए यह ज़रूरी है कि उन्हें नया संज्ञा शब्द सिखाते समय ही उस शब्द के लिंग का भी ज्ञान करा दिया जाना चाहिए।