प्राकृत भाषाओं की सामान्य विशेषताएँ - General characteristics of Prakrit languages

समेकित रूप में प्राकृत भाषाओं की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-


(1) प्राकृत भी संस्कृत के समान क्लिष्ट योगात्मक भाषा है।


(ii) संस्कृत व्याकरण को सरल बनाया गया है।


(iii) शब्द रूपों और धातु रूपों की संख्या कम होगई। ।


(iv) शब्दों के रूप केवल तीन या चार प्रकार के ही रहे गए


(v) धातु रूप भी प्रायः एक या दो प्रकार से चलने लगे।


(Vi) अस्पष्टता के निवाणा परसों (कारक चिह्नों आदि) की सृष्टि हुई। 


(vii) भाषा संयोगात्मक से वियोगात्मक की ओर अग्रसर हुई।


(viii) शब्द रूप प्रायः अकारान्त के तुल्य चलने लगे और धातु रूप प्रायः भ्वादिगुण के समान होगए।


(ix) चतुर्थी विभक्ति का अभाव हो गया। प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के बहुवचन प्रायः एक हो गए। 


(x) लङ, लिट और लुङ् लकारों का अभाव हो गया।


(xi) द्विवचन का अभाव हो गया।


(xii) आत्मनेपद का भी अभाव हो गया।


(xiii) ध्वनि परिवर्तन मुख्य रूप से हुआ। संयुक्ताक्षरों में प्रायः पर सवर्ण या पूर्व सवर्णहुआ।


(xiv) कुछ प्राचीन ध्वनियों का अभाव हो गया। स्वरों में ऋ, ऋ, लृ, ए, औ व्यंजनों में य श ष । मागधी में यश है, स नहीं है।


(xv) संस्कृत में अप्राप्त दो नये स्वर आ गए ह्रस्व ऍ और ओ । -


(xvi) साधारणतया शब्द के अन्तिम व्यंजन का लोप हो जाता है।


(xvii) ह्रस्व स्वर के बाद दो से अधिक और दीर्घ स्वर के बाद एक से अधिक व्यंजन नहीं रहते ।


(xviii) स्वर सम्बन्धी निम्नलिखित मुख्य परिवर्तन हुए- (क) क्र का अ, इ. या उ हो गया। (ख) ऐ को ए, औ को ओ। (ग) मध्यगत व्यंजन का लोप होने पर पूर्ववर्ती ह्रस्व को दीर्घ स्वर (घ) अनुदान स्वर का लोप । (ङ) सम्प्रसारण होकर यू का इ त् को उ।


(xix) मध्यगत वर्णों में मुख्य अन्तर ये होते हैं- (क) मध्यगत क त प का लोप या उन्हें ग दूब होते हैं,

(ख)


मध्यगत य का सदा लोप होता है, (ग) मध्यगत महाप्राण वर्णों (ख, घ, थ, घ आदि) की 'ह' हो जाता है, (घ) मध्यगत ट को ड और ठ को द होता है, (ङ) प को व होता है, (च) 11 से 18 की संख्याओं में द को र होता है, (छ) श ष स को स, मागधी में श 


(xx ) संयुक्ताक्षरों में मुख्य परिवर्तन ये होते हैं - (क) दो स्पर्श वर्गों में परसवर्ण होता है, (ख) स्पर्श के बाद


अनुनासिक को पूर्वसवर्ण होगा, (ग) ज्ञ को वण, (घ) स्पर्श बाद में होने पर पर लू को परस वर्ण,

(ङ)क्ष को क्ख या च्छ, (च) त्य च्च, ध्य झ, (छ) र को स्पर्श का सवर्ण ।


(xxi) प्रथमा एकवचन विसर्ग (:) मागधी में 'ए' होता है, अन्यत्र 'ओ'।


(xxii) धातुओं के अर्थों में बहुत अन्तर हुआ है।


(xxiii) संगीतात्मक स्वर के स्थान पर बलाघातात्मक स्वर कम (xxiv) तद्भव शब्दों की संख्या अधिक है, तत्सम कम।