हिन्दी के वाक्यों में पदक्रम सम्बन्धी नियम - Gradation rules in Hindi sentences

हिन्दी के वाक्यों में पदक्रम सम्बन्धी नियम इस प्रकार हैं-

(1) वाक्य में पहले 'कर्ता' फिर 'कर्म' और अन्त में 'क्रिया' (सकर्मक) आते हैं, जैसे-


(1) बच्चा खाना खाता है।


(ii) माँ खाना बनाती है।


(iii) वे फिल्म देखने जा रहे हैं।


(2) यदि वाक्य की क्रिया अकर्मक है तो पहले कर्त्ता और फिर क्रिया आते हैं, जैसे-


(i) लड़की दौड़ रही है।

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(ii) बच्चा सो रहा है।


(iii) तुम क्यों हँस रहे हो ?


अप्रत्यक्ष कर्म या गौण कर्म (सम्प्रदान कारक में) प्रायः प्रत्यक्ष कर्म के पहले आता है, जैसे-


(i) माँ ने बच्चों को मिठाई दी।


(ii) पिताजी ने माँ को उपहार दिया।


(4) विस्मयादिबोधक शब्द वाक्य के आरम्भ में आते हैं, जैसे-

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(i) उफ़ ! कितनी गरमी है।


(ii) हाय ! मैं मर गया।


(iii) छिकितनी है?


(5) सम्बन्ध कारक बताने वाले चिह्न (का, के, की) 'सम्बन्धी संज्ञा' से पहले आते हैं, जैसे मीरा का बेटा, - कविता की किताब, शर्माजी के बच्चे, लोगों का घर आदि ।


(6) 'हाँ / ना' उत्तर वाले प्रश्नवाचक वाक्यों में प्रश्नवाचक शब्द 'क्या' वाक्य के पहले आता है तथा अन्य -

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प्रश्नवाचक वाक्यों में प्रश्नवाचक शब्द वाक्य के मध्य में आते हैं, जैसे- -


(1) क्या तुम मेरे घर चलोगी?


(ii) क्या आप मुझे किताब दे सकते हैं ?


(iii) क्या आज बारिश होगी ?


(iv) तुम अब कब आओगे ?



(v) आप कहाँ रहते हैं ?


(vi) वहाँ कौन बैठा है ?

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जब कर्त्ता पर प्रश्न किया जाता है तब प्रश्नवाचक शब्द वाक्य के प्रारम्भ में भी आ सकते हैं, जैसे-


(1) कौन बोला ?


(ii) किसने पुकारा ?


(iii) किससे बात कर रहे थे?


(7) 'क्रियाविशेषण' सदैव क्रिया के पहले आते हैं, जैसे-


(1) वह धीरे-धीरे चल रही है।


(ii) मैं सुबह चार बजे उठा। (iii) बच्चा दौड़कर आया।

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(8) आग्रह या सहमति के लिए 'न' अव्यय का प्रयोग वाक्य के अन्त में होता है, जैसे-


(i) तुम शाम को आओगी न।


(ii) खाना खाओगे न । (iii) कल मिलोगी न।


(१) वाक्य के विभिन्न पदों के बीच तर्क संगति होना ज़रूरी है, जैसे- -


(1) खरगोश को काटकर सब्जी खिलाओ


। (अतर्कसंगत (अशुद्ध))

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(ii) सब्जी काटकर खरगोश को खिलाओ।


(iii) यहाँ शुद्ध गाय का दूध मिलता है।


(तर्कसंगत (शुद्ध))


(अतर्कसंगत (अशुद्ध))


(iv) यहाँ गाय का शुद्ध दूध मिलता है।


(तर्कसंगत (शुद्ध))

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मागधी रूपों से हुआ है। भारत की सामासिक संस्कृति को भाषा और साहित्य दोनों ही धरातलों पर धारण करने वाली हिन्दी का आरम्भ दसवीं शताब्दी के आस-पास हुआ अतः हिन्दी भाषा का इतिहास बहुत पुराना है। इसके प्रारम्भिक रूप को आदिकालीन अपभ्रंश तथा अवहट्ट रचनाओं में देखा जा सकता है। अनेक विद्वान् प्राचीन 'डिंगल' और 'पिंगल' रचनाओं को हिन्दी का ही रूप मानते हैं। आदिकाल में रचित सिद्ध और जैन साहित्य की भाषा हिन्दी के आदिकालीन स्वरूप का परिचय देती है। विदित है कि भारतीय आर्यभाषाओं का उदय अपभ्रंशों से हुआ। हिन्दी के बीज भी अपभ्रंश में ही निहित थे इसलिए भाषिक सन्दर्भ में यह माना गया है कि रूप रचना से लेकर साहित्यिक रूपों तक में अपभ्रंश ने हिन्दी को प्रभावित किया है। ;

भाषा विशेष के अर्थ में अपभ्रंश शब्द का प्रयोग प्रायः छठी शताब्दी के आस-पास मिलता है। ध्यातव्य है कि प्राचीन हिन्दी के अन्तर्गत बौद्ध और सिद्धों की कविताओं की भाषा में पश्चिमी और पूर्वी अपभ्रंश के शब्दों का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है। हिन्दी के प्राचीन रूप को विकसित करने में रासो साहित्य का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। तेरहवीं शताब्दी में विकसित हिन्दी का एक अन्य रूप अमीर खुसरो की रचनाओं में मिलता है। चौदहवीं शताब्दी के आसपास दक्षिण में हिन्दी का एक नवीन रूप दिखाई देता है जिसे 'दक्खिनी हिन्दी' की संज्ञा दी गई है। 'दक्खिनी हिन्दी' खड़ीबोली का वह रूप है जिसमें एक ओर ब्रजभाषा तथा फ़ारसी के शब्दों का बाहुल्य है तो दूसरी ओर दक्षिण भारत की भाषाओं के शब्दों का इस प्रकार मध्यकाल तक आते-आते हिन्दी के स्वरूप में स्थिरता के दर्शन होते हैं तथा वह आत्मनिर्भर होने लगती है ।

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हिन्दी में अब तक जो अपभ्रंश के रूप मिलते थे, वे इस समय तक प्रायः लुप्त हो जाते हैं। हिन्दी की तीन बोलियाँ ब्रज, अवधी और खड़ीबोली अस्तित्व में आती हैं लेकिन साहित्य के क्षेत्र में व्रज तथा अवधी की ही प्रधानता रहती है। खड़ीबोली गद्य का सूत्रपात 1500 ई. के लगभग किसी अज्ञात रचनाकार द्वारा रचित 'कुतुबशतक' पर लिखे वार्तिकाशतक, औरंगजेब के समकालीन स्वामी प्राणनाथ और उनके शिष्यों की रचनाओं में, 1472 ई. में रामप्रसाद निरंजनी के 'भाषा योगवाशिष्ठ' में देखा जा सकता है। इस प्रकार यहाँ से गुजरते हुए हिन्दी भाषा आधुनिककाल में प्रवेश करती है। इस समय वह लगभग पूरी तरह विकसित हो जाती है।