भाषा के रूप में हिन्दी - Hindi as a language
आरम्भ में 'हिन्दी', 'हिन्दवी' या 'हिन्दुस्तानी' किसी एक भाषा का नाम नहीं था । इसके अन्तर्गत मध्यदेश की लगभग सभी भाषाएँ विशेषकर दिल्ली और इसके आसपास की भाषाएँ अवधी और ब्रजभाषा सम्मिलित थीं। आधुनिककाल में जब 'हिन्दी' भाषा को परिभाषित किया जाने लगा तो भाषावैज्ञानिकों और साहित्यकारों ने एक दूसरे से किंचित् भिन्न दृष्टिकोण अपनाया । उदाहरणार्थ ग्रियर्सन सुनितिकुमार चाटुर्ज्या, धीरेन्द्र वर्मा, उदयनारायण तिवारी आदि भाषाशास्त्रियों के अनुसार प्राचीन मध्यदेश की मुख्य बोलियों के समूह को 'हिन्दी' के नाम से पुकारा जाता है। जार्ज ग्रियर्सन ने अपने लिहाज से हिन्दी का एक क्षेत्र निर्धारित कर उसे दो वर्गों में विभाजित किया है।
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पूरब के क्षेत्र को उन्होंने पूर्वी हिन्दी क्षेत्र और पश्चिम के क्षेत्र को पश्चिमी हिन्दी क्षेत्र कहा है। पूर्वी हिन्दी क्षेत्रों में उन्होंने अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी मात्र तीन बोलियों को जगह दी, जबकि पश्चिमी हिन्दी उपभाषा के अन्तर्गत खड़ीबोली, बाँगरू, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली एवं निमाड़ी को शामिल किया । इस तरह ग्रियर्सन ने बिहारी, राजस्थानी एवं पहाड़ी क्षेत्र हिन्दी क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं माना और न ही इन क्षेत्रों की बोलियों को हिन्दी क्षेत्र की बोलियों के रूप में स्वीकार किया। परवर्ती भाषावैज्ञानिकों ने ग्रियर्सन के इस वर्गीकरण और सीमा निर्धारण की आलोचना की। राजस्थानी, बिहारी और पहाड़ी भाषाओं को शब्द भण्डार और व्याकरणिक संरचना की दृष्टि से हिन्दी परिवार या हिन्दी की उपभाषा वर्ग में रखा जा सकता है।
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