हिन्दी भाषा - समुदाय का वर्गीकरण - Hindi Language - Classification of Community

एक भाषा का जन समुदाय अपनी भाषा के विविध भेदों एवं रूपों के माध्यम से एक भाषिक इकाई का निर्माण करता है। विविध भाषिक भेदों के बीच अभिव्यक्ति की सम्भावना से भाषिक एकता का निर्माण होता है। एक भाषा के समस्त भाषिक रूप जिस समुदाय में प्रयुक्त होते हैं, उसे उस भाषा का 'भाषा-समुदाय' कहते हैं।


प्रत्येक भाषा क्षेत्र में भाषिक भिन्नताएँ प्राप्त होती हैं, यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भाषा की भिन्नताओं का आधार प्रायः वर्णगत एवं धर्मगत नहीं होता।

एक वर्ण या एक धर्म के व्यक्ति यदि भिन्न भाषा क्षेत्रों में निवास करते हैं तो वे भिन्न भाषाओं का प्रयोग करते हैं। हिन्दू-मुसलमान आदि सभी धर्मावलम्बी तमिलनाडु में तमिल बोलते हैं तथा केरल में मलयालम । इसके विपरीत यदि दो भिन्न वर्णों या दो धर्मों के व्यक्ति एक भाषा क्षेत्र मे रहते हैं तो उनके एक ही भाषा को बोलने की सम्भावनाएँ अधिक होती हैं। हिन्दी भाषाक्षेत्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व आदि सभा वर्णों के व्यक्ति हिन्दी का प्रयोग करते हैं। यह बात अवश्य है कि विशिष्ट स्थितियों में वर्ण या धर्म के आधार पर भाषा में बोलीगत अथवा शैलीगत प्रभेद हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसी भी स्थितियाँ विकसित हो जाती हैं जिनके कारण एक भाषा के दो रूपों को दो भिन्न भाषाएँ समझा जाने लगता है।


आप जानते हैं कि हिन्दी भाषा का भौगोलिक विस्तार काफी छू-छू तक है जिसे मोटे तौर पर तीन क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है - (1) हिन्दी क्षेत्र, (2) अन्य भाषा क्षेत्र और (3) भारतेतर क्षेत्र ।


हिन्दी क्षेत्र


हिन्दी मध्य भारत की सामान्य बातचीत की भाषा है। इसका विकास मध्यकालीन आर्यभाषा अपभ्रंश से हुआ। मध्य भारत के हिन्दीभाषी क्षेत्र को हिन्दी प्रदेश कहते हैं। इस प्रदेश में बोली जाने वाली अनेक स्थानीय बोलियाँ हैं। इन बोलियों के समूह को उपभाषाएँ कहते हैं। इन उपभाषाओं का सामूहिक नाम हिन्दी है।

हालाँकि भाषा और बोली का वर्गीकरण औपनिवेशिक मानसिकता की देन है। जिन्हें बोलियाँ कहा जाता है वो तो हर मायने में हिन्दी से प्राचीन भाषाएँ हैं। लेकिन सामन्ती मानसिकता के विद्वानों ने इन मातृभाषाओं को बोली कहकर उसे हिन्दी की रैयत बना दिया। इस मामले में सभी पंथों के बुद्धिजीवी शामिल रहे हैं। तथाकथित बोलियों से ही हिन्दी समृद्ध हुई है अर्थात् इसमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए है कि बोलियाँ ही हिन्दी की ताकत हैं। बावजूद इसके हम हिन्दी को समझने के लिए कई आधारों पर विभक्त करते हैं।


हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी की मुख्यतः अट्ठारह बोलियाँ बतायी जाती हैं, जिन्हें पाँच बोली वर्गों में इस प्रकार विभक्त करके रखा जा सकता है पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, राजस्थानी हिन्दी, बिहारी हिन्दी और पहाड़ी हिन्दी ।