हिन्दी भाषा रूप : राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय - Hindi Language Forms: National and International
(क) हिन्दी का राष्ट्रीय रूप 'राष्ट्र' या 'देश' अवधारणामूलक शब्द हैं, जबकि 'प्रदेश' / 'राज्य' एक ठोस भौगोलिक इकाई के रूप में प्रयोग में आता है। ज्ञातव्य है, भारत के संविधान में 'राष्ट्र' अथवा 'देश' जैसी संकल्पना उल्लिखित नहीं हुई है। परन्तु हमारे संविधान में, 'राज्य' अथवा 'प्रदेश' / 'प्रादेशिक' जैसी संकल्पना / अवधारणा का भाग 1 के अनुच्छेद (1) “भारत, अर्थात् इंडिया राज्यों (States) का संघ होगा" एवं संविधान की अनुसूची छठी 2 में 'प्रदेश' / 'प्रादेशिक' (Region / Regional) संज्ञा-पदबंधों (पारिभाषिक शब्दों) जैसी ठोस भौगोलिक इकाई का, स्पष्ट उल्लेख हुआ है। अतः इन्हीं सांवैधानिक तकनीकी सन्दर्भों में कहा जा सकता है कि राष्ट्रगान / राष्ट्रगीत / राष्ट्रध्वज / राष्ट्रीय पक्षी / पशु / पुष्प आदि भाषिक पदबंध,
ठोस भौगोलिक इकाई न होकर एक अवधारणामूलक भाषिक-पदबंध हैं। इन्हीं सन्दर्भों में हमें, हिन्दी के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय भाषिक रूप को समझना होगा-
(1) राजभाषा - भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में, निर्दिष्ट देवनागरी लिपि के प्रयोग के साथ राजभाषा (Official Language) के रूप में अधिकृत किया गया है। जिसका प्रयोग भारत सरकार / सरकारों की राजभाषा नीति, उसके नियमों, अधिनियमों / आदेशों आदि के अनुसार प्रयोजनमूलक भाषा (रूप / प्रयोग) के आधार पर किया जाता है। संक्षेप में यह भाषारूप अधिकतर कर्मवाच्य- वाक्यों में तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली के प्रयोगों पर टिका होता है । इसे विस्तार से प्रयोजनमूलक हिन्दी पाठ्यचर्या के खण्ड-1 की इकाइयों में समझाया गया है।
(ii) अन्य अनुप्रयोगात्मक / व्यावहारिक हिन्दी रूप - इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। भारत के सामाजिक, आर्थिक ( वाणिज्यिक), धार्मिक, शैक्षणिक (साहित्य / विज्ञान-तकनीकी / कला / मीडिया), मनोरंजन, खेल, पर्यटन, राजनैतिक आदि क्षेत्रों / उपक्षेत्रों में प्रयुक्त हिन्दी भाषा रूप / प्रयुक्तियाँ, इसी के अन्तर्गत आएँगे। इसके हर विषयक बिन्दु के अनुसार भाषा शैक्षणिक स्वरूप अलग-अलग होगा। यथा सामाजिक सन्दर्भों में परिस्थिति और सम्बन्धों के आधार पर, आप, तुम, तू, जैसे सर्वनामों, तदनुसार क्रियाओं (आप) बैठ जाइए, (तुम) बैठ जाओ, (तू) बैठ जा एवं मनोभावों के अनुसार टोन (आदरसूचक मृदु या तटस्थ / रूखा अथवा उदासीन / अनादर भाव से भरा तीखा ) का प्रयोग होगा।
उसी प्रकार, पूर्व उल्लखित अन्य व्यावहारिक क्षेत्रों के अनुसार भाषिक रूप अलग-अलग होंगे। अगर सरकारी आँकड़ों पर जाएँ तो पाएँगे कि हमारे देश में लगभग 179 भाषाएँ, 544 बोलियाँ, 1652 मातृभाषाएँ हैं। परन्तु भारत में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या के सन्दर्भ में, हिन्दी का भाषिक व्यावहारिक भौगोलिक क्षेत्र बहुत व्यापक (प्रथम स्थान पर, जनसंख्या का लगभग 70%) है। इस आधार पर, हिन्दी के भाषिक रूपों प्रयोजनमूलक हिन्दी पाठ्यचर्या (खण्ड-1) की इकाइयों में पर्याप्त चर्चा की गई है; साथ ही इसी पाठ के आगे के मुद्दों में, इस पर बात की जाएगी।
(iii) अन्तर्राष्ट्रीय-भाषिक रूप यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की लगभग 6000 भाषाओं / बोलियों में, बोलने और समझने वालों की संख्या के सन्दर्भ में विश्व की तीन सबसे बड़ी भाषाएँ, चीनी / मंदारिन, हिन्दी और अंग्रेजी हैं। भारत सरकार के राजभाषा विभाग और मीडिया के कई प्रकाशनों / माध्यमों में यह तथ्य सामने आया है कि विश्व के लगभग 140 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। इसमें भारतीय / हिन्दी साहित्य, भारतीय संस्कृति एवं सम्पर्क / व्यावहारिक भाषा को जानने / समझने के प्रयोजन से हिन्दी के अध्यापन की राह प्रशस्त हुई है।
इसी दिशा में अब हम, सम्प्रेषण के माध्यमों और विभिन्न विषय क्षेत्रों को ध्यान में रख कर
हिन्दी के अनुप्रयोगात्मक रूपों पर बात करेंगे।
माध्यम तथा विषयगत हिन्दी प्रयोग
हरेक भाषा-रूप (पारम्परिक-मौखिक / मुद्रित, आकृति / रंग, आगिक, वास्तु, गायन-वादन- नृत्य आदि) को, अपने निहित सन्देश को सम्प्रेषित करने के लिए किसी न किसी माध्यम (मानवीय-यान्त्रिक जैसे, मुद्रित-लेखन ( पुस्तकें पत्र-पत्रिकाएँ आदि), दृश्य (चित्र, मूक आंगिक क्रियाएँ आदि), श्रव्य (वक्तव्य, गायन / वादन-संगीत, रेडियो आदि), दृश्य-श्रव्य (नृत्य, सिनेमा, टी.वी., कंप्यूटर आदि) और मंतव्य / विषयवस्तु का सहारा लेना पड़ता है । इसी आधार पर, इनमें प्रयुक्त भाषा रूप, सम्प्रेषण-शैली आदि भी देशकाल और अन्य घटकों के अनुसार बदलते हैं।
इन्हीं मानकों / सिद्धान्तों के आधार पर, हिन्दी के भाषागत प्रयोग अपना भाषिक विधान रचते हैं। और उसी आधार पर उनके प्रयोजनी भाषा के अध्ययन-अध्यापन की राह खुलती है। निश्चित रूप से हिन्दी के इन प्रयोगी रूपों को सीखने / सिखाने के लिए विशेष कौशलों (Skills) की आवश्यकता होती है। इनकी, आगे चल कर यथास्थान चर्चा की जाएगी।
सरल / क्लिष्ट हिन्दी-रूप
कोई भी भाषा सरल या क्लिष्ट नहीं होती। भाषा या तो सम्प्रेषणीय (Communicative / आसानी से समझ में आने वाली / परिचित) या अ-सम्प्रेषणीय (Non-Communicative / आसानी से न समझ में आने वाली / अपरिचित) होती है। जाहिर है, सम्प्रेषणीय भाषा श्रोता / पाठक को सरल और अ-सम्प्रेषणीय कठिन लगेगी।
सामान्य विषय-वस्तु के लिए, सम्प्रेषणीय भाषा में उन शब्दों पदबंधों का प्रयोग किया जाता है, जिनकी लक्षित श्रोता / पाठक के बीच अधिक आवृत्ति (Frequency) रहती है। कथित आवृत्तियों का निर्धारण देश- काल की परिस्थितियों के अनुसार (आधार पर) होता है, तदनुसार, भाषाई प्रयोग सामने आते हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी रूप की बात करने पर हमें ध्यान में रखना होगा कि एक तरफ जहाँ, हिन्दी सामासिक भारतीय / वैश्विक समाज की सम्पर्क भाषा है,
वहीं दूसरी ओर यह साहित्य / कला / विज्ञान / उद्योग आदि विषयों के सन्दर्भों में विशेष उद्देश्य / प्रयोजनमूलकता को लेकर एक तकनीकी भाषा भी है। अतः विषयवस्तु के आधार पर अगर हम उस हिन्दी भाषा रूप का प्रयोग करते हैं जिसकी आवृत्ति लक्षित पाठक / प्रयोक्ता वर्ग में अधिक है तो, सरल सम्प्रेषणीय हिन्दी भाषा का मकसद पूरा हो जाता है। जैसे, किसी से मिलने पर हम पूछ सकते हैं .... आप कैसे हैं ?, (कहिए) क्या हाल (चाल) हैं ?, सब ठीक चल रहा है ?, कुशल मंगल... ?, कुशल क्षेम ... ?, सब खैरियत ... ?, कहिए, कैसे मिज़ाज हैं ?,
Hallo, Hi... OK... ?, आदि। हम समझ सकते हैं कि लखनऊ अंचल में, > सब खैरियत ( है ) ... ?, कहिए, कैसे मिज़ाज हैं ?, (कहिए) क्या हाल (चाल) हैं ? का प्रयोग अधिक मिल सकता है। वहीं, वाराणसी / इलाहबाद में > कुशल मंगल... ?, कुशल क्षेम ... ?, आप कैसे हैं? या महानगरों मुंबई आदि में हेलो / हाइ जैसे पदबंधों / वाक्यांशों का प्रयोग सहजता से मिल सकता है। यहाँ ऐसा हो सकता है कि वाराणसी / इलाहबाद की हिन्दी मुंबईकरों को क्लिष्ट लगे, और मुंबई की हिन्दी > "मैं तो आखा मुंबई घूमा" (आखा पूरा) या "काइ कू खाली-पीली बोम मारता है ?" (क्यों बेकार में चिल्ला / गुस्सा / नाराज़ हो रहे हो... ?)", वाराणसी / इलाहबादियों को गँवारू (Funny) लगे।
उसी प्रकार हैदराबादी हिन्दी या कल्कत्तिया हिन्दी अपने-अपने अंचलों में एक बढ़िया सम्प्रेषणीय भाषा का काम कर रही है।
ठीक इसी प्रकार, हिन्दी के राजभाषाई रूप या साठ-सत्तर के दशकों तक प्रयुक्त आकाशवाणी- हिन्दी समाचारों की भाषाई क्लिष्टता को लेकर काफी आलोचना होती रही। भारत सरकार ने इसे सरल बनाने के लिए परिपत्र भी जारी किए। अब चूंकि, अपने विस्तृत प्रयोग क्षेत्र के कारण हिन्दी, मीडिया, खेल, पर्यटन, वाणिज्य (बैंकिंग / बीमा / विपणन), राजनीति आदि में एक भाषाई उद्योग का रूप ले चुकी है, अतः इसके सरल / प्रयोजनमूलक सम्प्रेषणीय रूप पर ज्यादा बल दिया जा रहा है।
आइए, अब इसी दिशा में हिन्दी के अध्ययन / अध्यापन को लेकर विचार किया जाए।
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