हिन्दी साहित्य और सौन्दर्यशास्त्रीय आलोचना - Hindi Literature and Aesthetic Criticism
हिन्दी साहित्य और सौन्दर्यशास्त्रीय आलोचना - Hindi Literature and Aesthetic Criticism
हिन्दी में कई आलोचकों ने सौन्दर्यशास्त्रीय आलोचना के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के समय में सौन्दर्यशास्त्र का स्वरूप स्थिर और बहुत स्पष्ट नहीं था, इसलिए सौन्दर्य और सौन्दर्यानुभूति की चर्चा करते हुए उन्होंने सौन्दर्यशास्त्र को भाषा का गड़बड़झाला घोषित कर दिया। भारतीय परम्परा के सौन्दर्य-चिन्तन के आधार पर उन्होंने लिखा कि "सौन्दर्य मन के भीतर की वस्तु है, कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो हमारे मन में आते ही थोड़ी देर के लिए हमारी सत्ता पर ऐसा अधिकार कर लेती हैं कि उसका ज्ञान ही हवा हो जाता है और हम उन वस्तुओं की भावना के रूप में परिणत हो जाते हैं। हमारी अन्तरसत्ता की यही तदाकार परिणति सौन्दर्य की अनुभूति है । "
डॉ॰ रामविलास शर्मा ने अपने निबन्ध 'सौन्दर्य की वस्तुगत सत्ता और सामाजिक विकास' में सौन्दर्य के स्वरूप और सौन्दर्यशास्त्र के विषय क्षेत्र पर गहन चिन्तन किया है। उन्होंने सौन्दर्य को प्रकृति, मानव जीवन और ललित कलाओं के आनन्ददायक गुण के रूप में परिभाषित कराते हुए सौन्दर्यशास्त्र और मानव-जीवन का गहरा सम्बन्ध स्वीकार किया है। उन्होंने लिखा है कि " सौन्दर्यशास्त्र का विवेच्य विषय साहित्य तथा अन्य कलाओं के अतिरिक्त प्रकृति और मानव जीवन का सौन्दर्य भी है। सौन्दर्य और उसकी अनुभूति का विवेचन उत्सुकता की शान्ति के लिए ही नहीं है, उसका उद्देश्य हमारी सौन्दर्य चेतना को उत्तरोत्तर विकसित करना,
मानव जीवन और उसके सामाजिक तथा प्राकृतिक परिवेश को और भी सुन्दर बनाना है।" ('आस्था और सौन्दर्य')
डॉ. कुमार विमल ने सौन्दर्यशास्त्र के मुख्य तत्त्वों का विवेचन किया है। उन्होंने 'सौन्दर्यशास्त्र के तत्त्व ' तथा 'छायावाद का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन' शीर्षक कृतियों में सौन्दर्य, कल्पना, बिम्ब, प्रतीक, मिथक आदि को कला के तत्त्व माना है । सौन्दर्यशास्त्रीय आलोचना को मान्यता देने और स्वतन्त्र पहचान प्रदान करने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए उन्होंने लिखा है कि "हमें सौन्दर्यशास्त्र का स्वतन्त्र अस्तित्व गढ़ना होगा अन्यथा सौन्दर्यशास्त्र के स्वरूप को दर्शन, तत्त्ववाद और मनोविज्ञान ग्रास लेगा जिसका किंचित संकेत अब तक इतिहास देता है। मेरी दृष्टि में अब वह समय आ गया है जब सौन्दर्यशास्त्र और आलोचनाशास्त्र के पार्थक्य को मिटा देना चाहिए।"
('कला विवेचन) डॉ. कुमार विमल सौन्दर्यशास्त्र का सम्बन्ध ललित कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौन्दर्य के साथ मानते हैं।
डॉ० नगेन्द्र ने 'भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका' पुस्तक में सौन्दर्यशास्त्र के विभिन्न पक्षों का विवेचन करते हुई भारतीय परम्परा में उपलब्ध सौन्दर्य के स्वरूप पर विचार किया है और निष्कर्ष दिया कि भारतीय सौन्दर्य-दर्शन का मौलिक सम्बन्ध आनन्दवाद के साथ है। उसमें रूपवादी या वस्तुवादी दृष्टि का पूर्ण अभाव नहीं है, फिर भी सौन्दर्य को मूलतः आत्मा की प्रवृत्ति ही माना गया है। सौन्दर्य के अनुभूति पक्ष को महत्त्व देते हुए भी भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में रूप को भी पर्याप्त महत्त्व दिया गया है और उसके विभिन्न उपकरणों का उसमें गहराई से विवेचन हुआ है। डॉ० नगेन्द्र के अनुसार भारतीय सौन्दर्य दर्शन अद्वन्द्व और सामरस्य का दर्शन है।
इस सन्दर्भ में वे कहते हैं - "अभिव्यक्ति के स्तर पर यह सौन्दर्य है और अनुभूति के स्तर पर आनन्द । "
डॉ. निर्मला जैन ने तुलनात्मक सौन्दर्यशास्त्र के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। अपनी पुस्तक 'रस सिद्धान्त और सौन्दर्यशास्त्र' में उन्होंने एक सम्पूर्ण काव्य-सिद्धान्त के रूप में रस-सिद्धान्त का विवेचन किया है। उन्होंने रस-सिद्धान्त और सौन्दर्यशास्त्र की तुलना करते हुए रस-सिद्धान्त के वस्तुनिष्ठ स्वरूप को उभारने की दृष्टि से पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र के वस्तुनिष्ठ सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया है। डॉ० जैन ने भारतीय रस- सिद्धान्त को सौन्दर्यशास्त्र माना है। उनके शब्दों में, "रस सिद्धान्त भारतीय मनीषा द्वारा निर्मित और विकसित सौन्दर्यशास्त्र ही है, जिसमें नाटक के ब्याज से काव्य, संगीत,
नृत्य, चित्र, वास्तु आदि सभी कलाओं से सम्बन्धित आधारभूत तत्त्वों का निरूपण किया गया है किन्तु अन्ततः इसका विकास मुख्य रूप से काव्य के सन्दर्भ में हुआ है।" ('रस सिद्धान्त और सौन्दर्यशास्त्र')
डॉ. रमेश कुंतल मेघ ने मार्क्सवादी दृष्टि से सौन्दर्यशास्त्र से सम्बन्धित विभिन्न प्रश्नों पर विचार किया है। 'अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा', 'साक्षी है सौन्दर्य प्राश्निक', 'मध्यकालीन रसदर्शन और समकालीन सौन्दर्यबोध' तथा 'सौन्दर्य मूल्य और मूल्यांकन जैसी आलोचना पुस्तकों में उन्होंने कला एवं सौन्दर्य-बोध, कलाओं का वर्गीकरण,
कलाकृति का स्वरूप, सृजन-प्रक्रिया, सम्प्रेषण-प्रक्रिया जैसे विभिन्न विषयों पर अपना मौलिक चिन्तन प्रस्तुत किया है। उनका कला-विवेक मार्क्सवाद के आधार पर निर्मित हुआ है इसलिए उनकी आलोचनात्मक दृष्टि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भों में सौन्दर्यबोध तथा कलात्मक सौन्दर्य का विवेचन करती है। उनके अनुसार मनुष्य समस्त कलाओं का आधारभूत संवर्ग होता है। वह प्रकृति और समाज से प्रभावित होता है तथा उसे बदलता भी रहता है। डॉ० रमेश कुंतल मेघ ने भारतीय और पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र की परम्परा पर व्यापक और गहन चिन्तन किया है। सौन्दर्य का तात्त्विक विवेचन करते हुए उन्होंने ऐतिहासिक दृष्टि से सौन्दर्यशास्त्र के बदलते हुए प्रतिमानों पर भी विचार किया है। व्यावहारिक आलोचना में भी उन्होंने सौन्दर्यशास्त्रीय और मार्क्सवादी दृष्टि से हिन्दी-साहित्य का मूल्यांकन किया है। इस सन्दर्भ में तुलसी, मुक्तिबोध और कामायनी की उनकी आलोचना उल्लेखनीय है।
वार्तालाप में शामिल हों