हिन्दी साहित्य और शैलीवैज्ञानिक आलोचना - Hindi Literature and Stylistic Criticism

हिन्दी में शैलीवैज्ञानिक आलोचना प्रवृत्ति की शुरूआत डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव की पुस्तक 'शैलीविज्ञान और आलोचना की नयी भूमिका' (1972) के प्रकाशन के साथ हुई। इस पुस्तक में डॉ. श्रीवास्तव ने घोषणा की कि "शैलीविज्ञान साहित्यिक आलोचना का सिद्धान्त भी है और प्रणाली भी।" उन्होंने शैलीविज्ञान को 'अभिव्यक्ति-पद्धति' के आधार पर साहित्य के अध्ययन विश्लेषण की वैज्ञानिक पद्धति निरूपित किया । उन्होंने केदारनाथ सिंह की कविता 'अनागत' का शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया।


हिन्दी में शैलीवैज्ञानिक आलोचना को व्यवस्थित रूप प्रदान करने के उद्देश्य से 24 और 25 नवंबर, 1972 को केंद्रीय हिन्दी संस्थान,

आगरा में प्रथम अखिल भारतीय शैलीवैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में शैलीविज्ञान के सिद्धान्त और साहित्यिक विश्लेषण में इस पद्धति के उपयोग की सम्भावनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई। बाद में इस संगोष्ठी में पढ़े गए पत्रों को संकलित कर 'शैली और शैलीविज्ञान' (1976) शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया। पण्डित विद्यानिवास मिश्र की पुस्तक 'रीतिविज्ञान' (1973) में शैलीविज्ञान के सैद्धान्तिक विवेचन के साथ-साथ रीति और शैली के अन्तर को स्पष्ट करते हुए शैलीवैज्ञानिक आलोचना-पद्धति के लिए 'रीतिविज्ञान' का नाम प्रस्तावित किया गया।

आठवें दशक में ही डॉ. कृष्ण कुमार ने शैलीवैज्ञानिक आलोचक के रूप में शैली पर व्यापक विवेचन प्रस्तुत किया। 'शैलीविज्ञान की रूपरेखा' (1974), 'गद्य संरचना : शैलीवैज्ञानिक विवेचन' (1975), 'शैलीविज्ञान और भारतीय काव्यशास्त्र' (1976) तथा 'शैलीवैज्ञानिक आलोचना के प्रतिदर्श' (1978) जैसी पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने शैलीविज्ञान के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और जैनेन्द्र आदि के उपन्यासों की भाषा का विश्लेषण भी किया। डॉ० नगेन्द्र की पुस्तक 'शैली विज्ञान' (1976) में पाश्चात्य शैलीविज्ञान को साहित्यिक शैली के अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पद्धति माना ।


डॉ॰ भोलानाथ तिवारी ने शैली को भाषिक अभिव्यक्ति का विशिष्ट ढंग मानते हुए 'शैलीविज्ञान' (1977) पुस्तक लिखकर इस आलोचना-पद्धति का विवेचन किया तथा नागार्जुन की एक कविता, कमलेश्वर की एक कहानी और डॉ० नगेन्द्र की गद्य शैली का शैलीवैज्ञानिक पद्धति से विश्लेषण किया। अपनी दूसरी पुस्तक 'व्यावहारिक शैलीविज्ञान' में डॉ. तिवारी ने शैलीवैज्ञानिक विवेचन को भाषा के आधार पर की गई साहित्य की सौन्दर्यमूलक व्याख्या बताते हुए उसके स्वरूप समझाने का प्रयास किया। डॉ. सुरेश कुमार हिन्दी में शैलीविज्ञान के एक अन्य व्याख्याता बनकर उपस्थित हुए।

उनकी 'शैलीविज्ञान' (1977) और 'शैलीविज्ञान और प्रेमचंद की भाषा' (1978) शीर्षक पुस्तकों में शैलीविज्ञान का सैद्धान्तिक और व्यावहारिक स्वरूप हिन्दी जगत् के सामने आया । उनकी पुस्तक 'शैलीविज्ञान और प्रेमचंद की भाषा' पी-एच. डी. की उपाधि के लिए सन् 1968 में आगरा विश्वविद्यालय से स्वीकृत शोधप्रबन्ध का परिशोधित रूप है। यह भारतीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी में पी-एच. डी. की उपाधि के लिए स्वीकृत शैलीविज्ञान सम्बन्धी प्रथम शोधप्रबन्ध है। डॉ. राघव प्रकाश ने 'शैलीविज्ञान और पाश्चात्य एवं भारतीय साहित्यशास्त्र' तथा 'पाश्चात्य और भारतीय शैलीविज्ञान' नामक पुस्तकों में भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया।


हिन्दी में शैलीविज्ञान को एक समीक्षा-प्रवृत्ति के रूप में स्थापित करने के लिए डॉ. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु' लम्बे समय से सक्रिय हैं। उन्होंने शैलीविज्ञान के पठन-पाठन से लेकर उसके स्वरूप को स्थिर करने की दृष्टि से योजनाबद्ध रूप से पुस्तकें लिखकर इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी पुस्तकें- 'शैलीविज्ञान का इतिहास' (1983), 'शैलीविज्ञान प्रतिमान और विश्लेषण' (1984), 'शैलीविज्ञान प्रकार और प्रतिमान' (1987) तथा 'शैलीविज्ञान और भारतीय काव्यशास्त्र' हिन्दी में शैलीविज्ञान के विवेचन-विश्लेषण की महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं । इसी क्रम में डॉ. कृष्ण कुमार गोस्वामी की पुस्तक 'शैलीविज्ञान और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की भाषा' (1996) भी उल्लेखनीय है।


समाजशास्त्रीय आलोचना


रचना के प्रति आलोचक का दृष्टिकोण साहित्य को समझने के उसके आधारों पर निर्भर होता है। साहित्य को पूर्णतः स्वायत्त मान लेने पर साहित्य की आन्तरिक विशेषताओं का उद्घाटन ही उसका लक्ष्य हो जाता है। यहाँ समाज की चर्चा अधिक से अधिक पृष्ठभूमि के रूप में की जाती है, रचना पर उसके प्रभाव और रचना की सामाजिक भूमिका पर विचार नहीं किया जाता है। मनोवैज्ञानिक आलोचना में भी साहित्य को एक विशिष्ट वैयक्तिक तथ्य ही माना जाता है और रचनाकार की विशिष्ट मनोवैज्ञानिक स्थितियाँ ही विवेचन का आधार होती हैं।


जिस प्रकार मनोवैज्ञानिक आलोचना में लेखक की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखा जाता है और पाठ- केन्द्रित आलोचना में रचना के आन्तरिक तत्त्वों का विवेचन किया जाता है, उसी प्रकार लेखक की सामाजिक पृष्ठभूमि और उसके लेखन पर सामाजिक कारकों के प्रभाव का अध्ययन भी साहित्य के विवेचन-मूल्यांकन की एक सामान्य प्रवृत्ति है । यहाँ समाजशास्त्रीय चिन्तन कृति के मूल्यांकन में महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसी को 'साहित्य का समाजशास्त्र' या 'समाजशास्त्रीय आलोचना' कहते हैं।


साहित्य और समाज


साहित्य का मुख्य विषय और क्षेत्र मनुष्य का जीवन और उसका सामाजिक परिवेश होता है।

साहित्यिक रचनाओं में रचनाकारों की मानसिक स्थितियों और सामाजिक व्यवहार दोनों की अभिव्यक्ति होती है। रचना की अन्तर्वस्तु और पात्रों के चयन से लेकर उसकी भाषा-शैली आदि के माध्यम से रचनाकार का सामाजिक व्यवहार ही अभिव्यक्त होता है। इसी प्रकार समाजशास्त्र भी समाज में मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करता है। सामाजिक संस्थाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन समाजशास्त्र का प्रमुख क्षेत्र है । मनुष्य जीवन के सन्दर्भ में सामाजिक प्रगति और सामाजिक गतिशीलता की व्याख्या समाजशास्त्रीय चिन्तन का उद्देश्य है।


साहित्य-सृजन में किसी न किसी रूप में समाज की भूमिका को बहुत पहले से स्वीकार किया गया है।

परम्परा से साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। साहित्यिक रचनाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक विषयों का समावेश अवश्य ही रहता है। साहित्य के आन्तरिक तत्त्वों के अतिरिक्त उसके सृजन की बाह्य परिस्थितियों का भी उसकी अन्तर्वस्तु और रूप को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। केवल आन्तरिक तत्त्वों के आधार पर किसी रचना का सम्यक् मूल्यांकननहीं किया जा सकता।


एक ओर जहाँ साहित्य की विषयवस्तु सामाजिक जीवन के किसी न किसी पहलू को अभिव्यक्त करती है,

वहीं दूसरी ओर रचनाकार के रचनात्मक व्यक्तित्व के निर्माण में भी सामाजिक परिस्थितियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती हैं। इतना ही नहीं, पाठक द्वारा रचना का अर्थ-ग्रहण एवं माँग तथा उस रचना की स्वीकृति- अस्वीकृति भी सामाजिक परिस्थितियों से निर्धारित होती है। अत: यह कहा जा सकता है कि साहित्य और समाज का परस्पर द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध होता है। सामाजिक तथ्य साहित्य को प्रभावित करते हैं, साथ ही कई सामाजिक तथ्य ऐसे भी होते हैं जो साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त होकर ही हमारे विचार और सामाजिक व्यवहार का विषय बनते हैं।


समाज और साहित्य के पारस्परिक सम्बन्ध के अध्ययन और विश्लेषण की दो मुख्य पद्धतियाँ देखी जाती हैं। एक पद्धति में समाज को समझने के लिए साहित्य को उपयोगी माध्यम माना जाता है। दूसरी पद्धति में साहित्य को समझने के लिए समाजशास्त्रीय दृष्टि को महत्त्व दिया जाता है। इन दोनों ही पद्धतियों में साहित्य का मूल्यांकन उसकी गुणवत्ता के आधार पर नहीं किया जाता है। इससे सामान्य, निकृष्ट या उत्तम साहित्य की पहचान और अन्तर स्पष्ट नहीं होता है, लोकप्रिय साहित्य और महान् साहित्य का महत्त्व एक समान मान लिया जाता है।

इन दोनों पद्धतियों से भिन्न आलोचकों का एक वर्ग साहित्य के कला-पक्ष को महत्त्वपूर्ण मानते हुए साहित्य-सृजन में समाज की भूमिका की खोज करते हैं। वे यह जानने का प्रयास करते हैं कि रचना समाज से किस रूप में और कितनी गहराई से सम्बन्धित है। रचना के रूप और अन्तर्वस्तु को समाज की परिस्थितियों और विचारधारा ने कितना प्रभावित किया है।


साहित्य के समाजशास्त्र का मुख्य उद्देश्य समाज के साथ साहित्य के सम्बन्ध की व्याख्या करना है। साहित्यिक प्रक्रिया सम्पूर्ण सामाजिक प्रक्रिया से जुड़ी हुई होती है। साहित्य-सृजन एक सामाजिक कार्य है। यह कार्य लेखक के रूप में एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है। इसलिए साहित्य और समाज के सम्बन्ध को समझने के लिए समाज के साथ लेखक के सम्बन्ध के स्वरूप को समझना आवश्यक है।