शैलीविज्ञान का इतिहास - history of stylistics

शैलीविज्ञान का विकास बीसवीं सदी में हुआ। शैलीविज्ञान का उद्भव संरचनावाद के उद्भव से अधिक विविधतापूर्ण रहा है। शैलीविज्ञान का अर्थ किसी सैद्धान्तिकी के स्थान पर अध्ययन के एक क्षेत्र का संकेत करता है। सॉस्सुर का 'द्विविभाजन', ब्लूम्सफील्ड का 'वर्गीकरण' और चोम्स्की का 'रूपान्तरण' आदि अनेक प्रविधियों का प्रयोग साहित्यिक रचना के विश्लेषण के लिए किया जाता है। यूरोप का भाषाशास्त्रीय शैलीविज्ञान लियो स्पिट्ज़र और एरिक ऑवेर्बाख के कार्यों में विकसित हुआ है। अमेरिकी शैलीविज्ञान एक प्रकार से अलग-अलग शैलियों का संकलन है, जिसमें सैम्युअल आर. लेविन, सीमूर चैटमैन, माइकल रिफ़ातेर और आन बानफ़ील्ड का योगदान है।

इस धारा पर याकॉब्सन के भाषाविज्ञान का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। ब्रिटेन के शैलीविज्ञान में माइकल हैलिडे के संरचनात्मक व्याकरण और प्रकार्यवाद का प्रभाव बहुत गहरा है। उसके 'लिंग्विस्टिक फंक्शन' की इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। स्पीच एक्ट थियरी (वाक्-क्रिया या वाग्व्यापार सिद्धान्त) जैसे भाषा विज्ञान पर आधारिक दार्शनिक चिन्तन में भी साहित्यिक रचनाओं के विश्लेषण के सूत्र दिए गए हैं। साहित्यिक रचना के किसी भी भाषिक तत्त्व (जैसे वाक्य विन्यास, स्वर, स्वनिम, शब्दावली आदि) का अध्ययन शैलीविज्ञान के अन्तर्गत आता है। छन्दशास्त्र एक ऐसा क्षेत्र है जो शैलीविज्ञान और भाषाविज्ञान की सन्धिरेखा पर स्थित है।


चार्ल्स बैली ने अपनी पुस्तक 'त्रेते द स्तिलिस्तिक फ़ॉन्से' (1909) में सॉस्सुर के भाषाविज्ञान की कड़ी के रूप में शैलीविज्ञान का प्रस्ताव किया। बैली के अनुसार सॉस्सुर का भाषाविज्ञान व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों की पूरी व्याख्या नहीं कर सकता । बैली का प्रस्ताव प्राग लिंग्विस्टिक स्कूल के उद्देश्य से मिलता है। रूसी रूपवाद की अवधारणाओं का विकास करते हुए प्राग स्कूल ने 'फोरग्राउंडिंग' की अवधारणा का निर्माण किया जिसके अन्तर्गत यह माना जाता है कि काव्य-भाषा साधारण भाषा से अलग पृष्ठभूमि की भाषा होती है, समान्तरता या विचलन के माध्यम से यह पृष्ठभूमि की भाषा स्थिर नहीं होती है और साहित्यिक और गैर-साहित्यिक भाषा के सम्बन्ध बदलती रहती है।


रीति और शैली


संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रति आग्रह के कारण हिन्दी में कुछ विद्वान 'शैली' के लिए 'रीति' शब्द के प्रयोग को अधिक उचित मानते हैं। पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने शैलीविज्ञान के स्थान पर रीतिविज्ञान नाम का प्रस्ताव किया है। 'रीति' शब्द संस्कृत काव्यशास्त्र से सम्बद्ध है, जबकि 'शैली' पाश्चात्य साहित्य-चिन्तन में अंग्रेज़ी के 'स्टाइल' शब्द का हिन्दी अनुवाद है। 'रीति' 'गमन विधि' या 'रचना विधि' का वाचक शब्द है। 'रीति' शब्द के प्रयोग में वस्तुनिष्ठता का अर्थ अन्तर्निहित है। इसमें काव्य की विषयवस्तु के अनुकूल भाषा सम्बन्धी सर्जनात्मक वैशिष्ट्य का बोध होता है भारतीय वाक्य में 'रीति' शब्द का प्रयोग कवि की साहित्यिक अभिव्यक्ति की विशेषताओं का निर्देश करने के सन्दर्भ में भी हुआ है।

काव्य के भाव अथवा रस को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से अनुकूल शब्दों और भाषागत उपकरणों का प्रयोग 'रीति' का वस्तुनिष्ठ स्वरूप है।


'रीति सम्प्रदाय' के आचार्य वामन ने 'रीतिरात्मा काव्यस्य' कहकर 'रीति' शब्द काव्य की आत्मा तथा शब्द और अर्थ को उसका शरीर बताया है। उसके अनुसार विशिष्ट पद-रचना ही रीति है। हिन्दी में जिस काव्य में सभी काव्यगत उपकरणों का एक रूपवादी पद्धति से पूर्वनिर्धारित मानदण्डों के रूप में प्रयोग होता है उसे रीति काव्य और जिस युग में ऐसा काव्य अधिक रचा गया उसे रीति-काल कहा जाता है। 'रीति' और 'शैली' में शब्दों में समानता और निकट सम्बन्ध है। फिर भी अर्थ और प्रयोग की व्यापकता की दृष्टि से आधुनिक शैलीविज्ञान में प्रयुक्त 'स्टाइल' के हिन्दी रूपान्तरण के रूप में 'शैली' अधिक सटीक और अर्थपूर्ण शब्द है । 'शैली' शब्द साहित्यिक रचना के सन्दर्भ में शाब्दिक और वाक्य संघटना के साथ-साथ रचना विशेष की सम्पूर्ण रूपात्मक विशेषताओं के व्यापक अर्थ को सूचित करता है। अतः 'शैलीविज्ञान' (Stylistics) के अनुसार साहित्यिक आलोचना में अंग्रेज़ी के 'स्टाइल' शब्द के अर्थ में 'शैली' शब्द का प्रयोग ही उचित है।