प्रभाववादी आलोचना - impressionistic criticism

किसी रचना को पढ़ने से हमारे मन पर उसका कोई न कोई प्रभाव अवश्य पड़ता है। हमें वह रचना अच्छी या बुरी कुछ भी लग सकती है। सामान्य पाठक इस प्रभाव के अनुसार उस कृति के बारे में अपनी धारणा बनाता है। लेकिन जब साहित्य का आलोचक इस प्रभाव को कृति के मूल्यांकन आधार बना लेता है और उसको मुख्य प्रतिमान मानकर उसके बारे में मूल्य-निर्णय देता है, तब तुलनात्मक आलोचना का जन्म होता है। प्रभाववादी आलोचना एक प्रकार की व्यक्तिवादी आलोचना पद्धति है।


प्रभाववाद और प्रभाववादी आलोचना का इतिहास


प्रभाववाद का उदय चित्रकला के क्षेत्र में उन्नीसवीं सदी से उत्तरार्द्ध में फ्रांस में हुआ था। 'प्रभाववाद' पदबंध का पहली बार प्रयोग एक पत्रकार द्वारा उपहासस्वरूप किया गया था। कलात्मक सन्दर्भ में 'प्रभाववाद' शब्द 1874 में पेरिस में प्रदर्शित क्लॉद मोने के Impression: Soliel Leoant शीर्षक चित्र से लिया गया है। इसमें उगते हुए सूर्य के प्रभाव को दिखाया गया था। प्रभाववादी चित्रकार प्रकाश के क्षणभंगुर प्रभाव के चित्रण को विशेष महत्त्व देते थे और उस अस्थिर प्रभाव को व्यक्तिनिष्ठ दृष्टि से चित्रित करते थे ।

चित्रकला के क्षेत्र में प्रभाववाद का मुख्य लक्ष्य आम प्रभाव एवं रूप के उभार के माध्यम से रूप रंग और शैली का चित्रण करना था। प्रभाववाद एक ऐसा दृष्टिकोण है जो किसी दृश्य या चित्र को अंशों में न देखकर उसकी सम्पूर्णता में देखता है। विज्ञान के प्रभाव ने चित्रकारों को नयी दिशा दिखाई और इन कलाकारों ने अपनी प्रचलित परम्परा से हटकर अपनी रंग योजना को नया रूप प्रदान किया। प्रकाश किरणों के वैज्ञानिक अध्ययन का चित्रकला के क्षेत्र में भरपूर उपयोग किया गया।


बीसवीं सदी के आरम्भ में प्रभाववाद चित्रकला से संगीत में आया, फिर कविता और साहित्य में । यहाँ से एक आलोचना पद्धति के रूप में प्रभाववाद का विकास साहित्य और अन्य कलाओं के क्षेत्र में हुआ।

प्रभाववादी आलोचना वैयक्तिक प्रतिक्रिया और वैयक्तिक संवेनदनशीलता पर आधारित और केन्द्रित है। विश्व साहित्य में जेम्स जॉयस, मार्सल प्रस्त, डॉरोथी रिचर्डसन और वर्जीनिया वूल्फ़ की रचनाओं में प्रभाववाद के पर्याप्त उदाहरण उपलब्ध हैं। पाश्चात्य आलोचक वॉल्टर पेटर ने अपने ग्रन्थ 'Essays from the Guardian' में अंग्रेज़ी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की कविताओं के विवेचन में प्रभाववादी आलोचना का सफल निर्वाह किया है।


वॉल्टर पेटर के अनुसार आलोचना में किसी वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने का पहला उपाय व्यक्ति के स्वयं के वास्तविक प्रभाव को जानना, उसे अन्य चीजों से अलग करके देखना और उसे अलग अनुभव करना है तथा उसे इस मूल प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करना है कि 'मेरे अपने लिए उस कृति का क्या अर्थ है ?'

पाश्चात्य चिन्तन की संवेदनावादी धारा के अनुसार किसी रचना को पढ़कर हमारे मन में जो स्वाभाविक प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है उसे 'अन्तःप्रज्ञात्मक प्रतिक्रिया' (Intuitive Response) कहा जाता है। इसी से प्रभाववादी आलोचना का विकास हुआ है। विलियम हैज़लिट्ट ने अपने निबन्ध ' On Genius and Common Sense' (1824) में प्रभाववादी आलोचना के बारे में लिखा है कि इसमें आप अनुभूति के आधार पर निर्णय लेते हैं, न कि तर्क के आधार पर आप अपने मन पर पड़ने वाली कई बातों से प्रभावित होते हैं, भले ही आप उनका विश्लेषण करने या उनकी कई बारीकियों को समझने और उन्हें स्पष्ट करने में सक्षम नहीं होते हो एम. एच. एब्रम्स के शब्दों में, अपनी पराकाष्ठा में यह आलोचना अनातोल फ्रांस के मुहावरे में "महान् कलाकृतियों के बीच एक संवेदनशील आत्मा का साहसकर्म" बन जाती है।


प्रभाववादी आलोचना : अर्थ और स्वरूप


प्रभाववादी आलोचना में आलोचक कृति के अपने मन पर पड़ने वाले प्रभाव को आकर्षक भाषा और शैली में प्रस्तुत कर देता है। स्वयं आलोचक एक पाठक के रूप में कृति विशेष का जो प्रभाव ग्रहण करता है, उसी प्रभाव की अपेक्षा वह अन्य पाठकों से भी करता है। इसमें व्यक्तिगत रुचि और पसंद स्पष्ट रूप में व्यक्त होती है। प्रभाववादी आलोचना रचना या उसके किसी अंश की अनुभूत विशेषताओं का वर्णन करती है तथा उन प्रतिक्रियाओं को अभिव्यक्त करती है जो रचना के प्रभाव से उत्पन्न हुई हैं। इसे आत्मप्रधान,

प्रभावाभिव्यंजक या प्रभाववादी आलोचना भी कहा जाता है। प्रभाववादी आलोचना में स्वच्छन्द व्यक्तिवाद और आत्मचेतना की प्रधानता होती है। यह कृति के वास्तविक गुणों के स्थान पर आलोचक के मनोभावों और अनुभूतियों पर आधारित होती है। इसमें रचना के अर्थ और भाव को स्पष्ट करने या समझने-समझाने की आवश्यकता नहीं समझी जाती है। प्रभाववादी आलोचक के अनुसार यदि वह अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त कर रहा है तो इतना पर्याप्त है। उस अनुभूति के पैदा होने का कारण जानने के लिए रचना का विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं है।


इस प्रकार प्रभाववादी आलोचना एक प्रकार की व्यक्तिनिष्ठ आलोचना पद्धति है, जिसके अन्तर्गत रचना विशेष के अध्ययन से आलोचक के मन पर पड़े प्रभाव को ही उसके मूल्यांकन का प्रमुख आधार माना जाता है। इसमें आलोचक की अपनी प्रतिक्रिया ही महत्त्वपूर्ण होती है, कोई अन्य मानदण्ड वह स्वीकार नहीं करता है । इसलिए इसमें एकपक्षीय दृष्टिकोण प्रधान हो जाता है, जिससे कृति की समग्र आलोचना सामने नहीं आ पाती है। यद्यपि यह एक स्वाभाविक पद्धति जान पड़ती है, लेकिन इसमें आलोचक के व्यक्तिगत प्रभाव को ही निर्णायक माने जाने के कारण रचना के सम्यक् और तटस्थ मूल्यांकन की सम्भावना कम हो जाती है।

इसलिए कई विद्वान इस पद्धति को अच्छी आलोचना पद्धति नहीं मानते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है कि "प्रभावाभिव्यंजक समीक्षा कोई ठीक ठिकाने की वस्तु नहीं। न ज्ञान के क्षेत्र में उसका कोई मूल्य है न भाव के क्षेत्र में उसे समीक्षा या आलोचना कहना ही व्यर्थ है। किसी कवि की आलोचना कोई इसीलिए पढ़ने बैठता है कि उस कवि के लक्ष्य को, उसके भाव को ठीक-ठीक हृदयंगम करने में सहारा मिले, इसलिए नहीं कि आलोचना की भावभंगी और सजीले पदविन्यास द्वारा अपना मनोरंजन करे।" इस प्रकार की आलोचना में चूँकि लेखक अपनी अनुभूति को ही प्रकट करता है इसलिए वह अपनी भाषा को आकर्षक बनाने का प्रयास भी करता है। शुक्ल जी लिखते हैं- "इस ढंग की समीक्षाओं में प्रायः भाषा विचार में बाधक बनकर आ खड़ी होती है।


लेखक का ध्यान शब्दों की तड़क-भड़क, उनकी आकर्षक योजना, अपनी उक्ति के चमत्कार आदि में उलझा रहता है जिनके बीच स्वच्छन्द विचार के लिए जगह ही नहीं मिलती।" (हिन्दी साहित्य का इतिहास) पाश्चात्य आलोचक टी. एस. एलियट ने भी इस पद्धति की आलोचना की है। उनके अनुसार यह पद्धति केवल उन लोगों को ही आकर्षित करती है जो अपनी कमज़ोर दृष्टि और आलस्य के कारण मूल कलाकृति का सामना करने से बचना चाहते हैं। एलियट के शब्दों में "आलोचना मूल संवेदना का विकास है, निकृष्ट आलोचना मात्र भावाभिव्यक्ति। "


हिन्दी साहित्य और प्रभाववादी आलोचना


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी आलोचना में प्रभाववादी आलोचना को बंगाल से आया हुआ प्रभाव माना है । उन्होंने लिखा है कि "बात यह है कि इधर अभिव्यंजना का वैचित्र्य लेकर 'छायावाद' चला, उधर प्रभावाभिव्यंजक समीक्षा (Impressionist Criticism) का फैशन बंगाल होता हुआ आ धमाका।" (हिन्दी साहित्य का इतिहास) अतः एक विशिष्ट गद्य शैली के रूप में प्रभाववादी आलोचना छायावाद के साथ-साथ हिन्दी में विकसित हुई है और इसका छायावाद से गहरा सम्बन्ध है। इसलिए इस आलोचना पद्धति को कुछ आलोचक छायावादी आलोचना भी कहते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आलोचक पर रचना के सहज प्रभाव से इस आलोचना का जन्म होता है, इसलिए यह एक स्वतन्त्र आलोचना-पद्धति है। लेकिन व्यक्तिनिष्ठ आत्माभिव्यक्ति ही इसका मुख्य आधार है इसलिए इसे वैज्ञानिक पद्धति नहीं कहा जा सकता।


हिन्दी में इस आलोचना का आरम्भ पद्मसिंह शर्मा से माना जाता है। उन्होंने 'बिहारी सतसई' की आलोचना में इस पद्धति का परिचय दिया था। पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी की आलोचना में इस पद्धति को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने इसमें व्याख्यात्मक आलोचना का मेल कर उसे अधिक सार्थक और तर्कपूर्ण आलोचना पद्धति बनाने का प्रयास किया है। प्रभाववादी आलोचना के सम्बन्ध में द्विवेदी जी की मान्यता थी कि इस आलोचना द्वारा आलोचना में भी अनुभूति का परिचय मिलता है और अनुभूति के लिए रसज्ञता के साथ-साथ रसार्द्रता की आवश्यकता भी होती है। उनके अनुसार यह पद्धति काव्य के हृदय पक्ष को महत्त्व देती है ।

प्रगतिशील आलोचक भगवतशरण उपाध्याय ने गुरुभक्त सिंह 'भक्त' की रचना 'नूरजहाँ' की आलोचना में प्रभाववादी आलोचना का प्रयोग किया है। उन्होंने लिखा है कि "नूरजहाँ के अध्ययन का मेरे ऊपर बड़ा मार्मिक प्रभाव पड़ा। फलतः कुछ अनुकूल अन्तर्ग्रन्थियाँ खुल पड़ी। मैं एक बात को स्पष्टतया कह देना चाहता हूँ कि प्रस्तुत प्रयास समालोचक का नहीं प्रत्युत सहानुभावी और समानधर्मा का है। मैं प्रभाववादी हूँ। जब अनुकूल प्रभाव का स्पर्श होता है, प्रभाववादी चुप नहीं बैठ सकता। " हिन्दी में प्रभाववादी आलोचना का सर्वाधिक प्रयोग छायावादी कवियों की भावना के प्रभाव को प्रकट करने में हुआ है। इस पद्धति के आलोचकों में पद्मसिंह शर्मा, कृष्णबिहारी मिश्र, शान्तिप्रिय द्विवेदी, भगवतशरण उपाध्याय आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं । मनोविश्लेषणवादी आलोचना और अन्य व्यक्तिवादी आलोचना पद्धतियों से प्रभाववादी आलोचना का बहुत गहरा सम्बन्ध है।