भारतीय सौन्दर्यशास्त्र - Indian aesthetics
भारतीय साहित्य में सौन्दर्यशास्त्र एक नया शब्द है। डॉ० नगेन्द्र ने 'भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका में लिखा है कि "वर्तमान युग से पूर्व भारतीय वाङ्मय में न तो इस शब्द का प्रयोग मिलता है, और न इस नाम के किसी शास्त्र का उल्लेख ही।" हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग 'ऐस्थेटिक्स' शब्द के पर्याय रूप में हुआ है। उन्होंने सौन्दर्यशास्त्र को संवेदना का विषय मानते हुए प्रकृति और कला को उसके दो प्रमुख आधार माना है। इन दोनों का सौन्दर्य ही सौन्दर्यशास्त्र का विषय है। डॉ० नगेन्द्र सौन्दर्यशास्त्र को कला-समीक्षा मानने के स्थान पर उसे कला के मौलिक सिद्धान्तों की संहिता मानते हैं।
पाश्चात्य विद्वानों द्वारा दी गई सौन्दर्यशास्त्र सम्बन्धी परिभाषाओं का विश्लेषण करते हुए उन्होंने लिखा है कि "सौन्दर्यशास्त्र ललित कलाओं के रूप में अभिव्यक्त सौन्दर्य से सम्बद्ध मौलिक प्रश्नों के तात्त्विक विवेचन और उसके परिणामी सिद्धान्तों की संहिता का नाम है।" ("भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका)
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में जीवन के अन्य मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में ही सौन्दर्य पर विचार किया जाता है। विशुद्ध भारतीय दृष्टि से सौन्दर्यशास्त्र के तीन प्रमुख पक्ष हैं भावन, विभावन और अनुभावन । कलाकार जब - बहिर्जगत् का साक्षात्कार करता है तो उसके हृदय में यही बहिर्जगत् प्रेरणा बनकर सृजन के आवेग को जन्म देता है।
यह पूरी प्रक्रिया उसका भावन पक्ष है। दूसरे चरण में कलाकार अपने मानस में रचना की संरचना की पूरी तैयारी करता है। वह अभिव्यंजना के सारे माध्यमों से रचना का पूरा प्रारूप अपने मानस में बना लेता है, यह उसका विभावन पक्ष है। उसके बाद आती है अभिव्यक्ति जिसमें सहृदय प्रवेश करता है अर्थात् पूरी रचना-वस्तु का वह सहृदय पुनर्भावन करता है। यहीं सौन्दर्य-समीक्षा का जन्म होता है, जिसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध अनुभावन पक्ष से है।
भारतीय काव्यशास्त्र में सौन्दर्य के स्वरूप पर अलग-अलग विचार प्रकट किए गए हैं। रस-सिद्धान्त में सौन्दर्य की सत्ता नितान्त रागात्मक मानी गई है
लेकिन ध्वनि-सिद्धान्त सौन्दर्य में रागतत्त्व की एकान्तिक अनिवार्यता को स्वीकार नहीं करता है। अलंकार और रीति सिद्धान्तों में सौन्दर्य को वस्तुगत या शब्दार्थगत माना जाता है। वक्रोक्ति सिद्धान्त के प्रणेता कुन्तक सौन्दर्य के लिए वक्रता शब्द का प्रयोग करते हैं। कुन्तक के अनुसार सौन्दर्य उभयनिष्ठ है । उसमें प्रमाता और प्रमेय का अभेदमय योग रहता है। भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का मूलाधार काव्यशास्त्र है, दर्शन नहीं। सौन्दर्य के आस्वाद और स्वरूप का व्यवस्थित विवेचन काव्यशास्त्र के अन्तर्गत ही हुआ है । भारतीय रस-सिद्धान्त में प्रीति या आनन्द तत्त्व और अलंकार सिद्धान्त में विस्मय तत्त्व का शास्त्रीय विकास हुआ है। प्रसिद्ध सौन्दर्यशास्त्री डॉ. दासगुप्ता के अनुसार भारतीय काव्यशास्त्र में पारिभाषिक अर्थ में, सौन्दर्य की सही धारणा का वाचक शब्द रमणीयता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी काव्य के प्रसंग में सुन्दर की अपेक्षा रमणीय शब्द को ही अधिक सार्थक माना है।
हिन्दी कवियों में विद्यापति ने सौन्दर्य को 'रूप' के अर्थ में ग्रहण किया है। विद्यापति के अनुसार रूप अनिर्वचनीय, नित्य और सर्वथा नवीन होता है। विद्यापति ने रूप-सौन्दर्य की जो दृष्टि-परम्परा प्रारम्भ की थी, रीतिकालीन कवियों ने उसी का अनुसरण और विकास किया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सौन्दर्य को शिव से अभिन्न माना है। छायावाद काल में कवियों की सौन्दर्य दृष्टि में सार्थक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। जयशंकर प्रसाद ने सौन्दर्य को चेतना के उज्ज्वल पक्ष के वरदान के रूप में ग्रहण किया है।
भारत में कई अन्य विद्वानों ने भी सौन्दर्यशास्त्र की परिभाषा और क्षेत्र के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट किए हैं। के. एस. रामास्वामी शास्त्री के अनुसार सौन्दर्यशास्त्र कला में व्यक्त सौन्दर्य का विज्ञान है। डॉ. के. सी. पाण्डेय ने हीगेल और क्रोचे की मान्यताओं का समन्वय करते हुए इसे ललित कलाओं का विज्ञान और दर्शन माना है।
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