वृत्ति से तात्पर्य - instinct means

'काल' की चर्चा करते समय आपको बताया गया था कि 'काल' और 'पक्ष' के प्रत्यय उन्हीं क्रियाओं में लगते हैं जो प्रारम्भ हो चुकी हैं लेकिन भाषा में वक्ता ऐसे अनेक वाक्यों का प्रयोग करता है जहाँ क्रिया प्रारम्भ ही नहीं हुई होती है। ऐसी क्रिआओं में 'काल' और 'पक्ष' के प्रत्यय नहीं लगेंगे। ऐसे वाक्यों में तो क्रिया के घटित होने के प्रति वक्ता का क्या 'मूड' (Mood) है, यह पता चलता है। 'मूड' को ही हिन्दी में 'वृत्ति' या 'अभिवृत्ति' कहते हैं।


वृत्ति के भेद


'हिन्दी की प्रमुख 'वृत्तियाँ' तथा उनकी सूचना देने वाले चिह्न या प्रत्ययों का विवरण इस प्रकार है-

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(1) आज्ञार्थक वृत्ति-


जिस वृत्ति से आज्ञा, अनुरोध, चेतावनी, प्रार्थना आदि के भावों का पता चलता है वहाँ 'आज्ञार्थक वृत्ति' होती है। इस वृत्ति की सूचना देने वाले प्रत्यय हैं- 'शून्य', 'ओ', 'इए', 'इएगा' तथा 'ना'।


(2) सम्भावनार्थक वृत्ति-


जिस वृत्ति से क्रिया के घटित होने की सम्भावना तथा वक्ता की इच्छा, कामना, अनुरोध चिन्ता आदि का पता चलता है वहाँ 'सम्भावनार्थक वृत्ति' होती है। इस वृत्ति की सूचना देने वाले प्रत्यय हैं- 'ए', 'ऐं', तथा 'ॐ' ।

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(3) सामर्थ्य सूचक वृत्ति-


'सामर्थ्य' का अर्थ होता है 'क्षमता' (capability)। सहायक क्रिया के जिन प्रत्ययों से कार्य करने की सामर्थ्य या क्षमता का पता चलता है वहाँ 'सामर्थ्यसूचक वृत्ति' होती है। इस वृत्ति के सूचक प्रत्यय हैं - 'सक' तथा 'पा'।


'हिन्दी में 'सकना' से सामर्थ्य के अलावा 'अनुमति' और 'सम्भावना' का भाव भी प्रकट होता है।

(4) बाध्यतासूचक वृत्ति-


जिस वृत्ति से कार्य के घटित होने में बाध्यता या मजबूरी का भाव प्रकट होता है वहाँ 'बाध्यतासूचक वृत्ति' होती है।

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इस वृत्ति की सूचना देने वाले चिह्न हैं- 'ना है', 'ना पड़' तथा 'ना चाहिए'। 


(5) इच्छार्थक वृत्ति-


जिन वाक्यों में कर्त्ता द्वारा किसी बात की इच्छा या कामना प्रकट की जाती है वहाँ इच्छार्थक वृत्ति होती हैं। इस वृत्ति का सूचक चिह्न 'चाहना' है। हिन्दी में प्रायः इसका प्रयोग 'कृदन्त' (Verbal Noun) रूपों के साथ होता है, जैसे-


(1) मैं विदेश जाना चाहता हूँ।


(ii) मेरी बहन पत्रकार बनना चाहती है।

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(iii) वह नौकरी करना नहीं चाहता।


(iv) वह भी हमारे साथ आना चाहता था।


(6) संकेतार्थक वृत्ति :


'जिन 'मिश्र वाक्यों' के दोनों उपवाक्य 'यदि... तो' या 'अग... तो' अव्ययों से जुड़े होते हैं तो दोनों उपवाक्यों के बीच कार्य-कारण का सम्बन्ध होता है। इस कार्य कारण के सम्बन्ध को बताने वाली वृत्ति 'संकेतार्थ वृत्ति' कहलाती है। इसके सूचक चिह्न हैं- 'आ', 'ई', 'ए' जो दोनों वाक्यों के क्रिया पदबंध में लगते हैं। देखिए उदाहरण-

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(1) यदि वह झूठ न बोलता तो स्कूल से न निकाला जाता ।


(ii) यदि तुमने कहा होता तो मैं जरूर आता ।


(iii) अगर वह परिश्रम करती तो अवश्य पास हो जाती।


(7) निश्चयार्थ वृत्ति या भविष्यत वृत्ति-


परम्परागत व्याकरण में जिसे 'भविष्यतकाल' कहा जाता था, आधुनिक भाषाविज्ञान उसे 'भविष्यत वृत्ति' या 'निश्चयार्थ वृत्ति' कहता है।

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इसका कारण यह है कि भविष्यतकाल के अन्तर्गत आने वाले वाक्यों में भी क्रिया प्रारम्भ नहीं होती जैसे 'वह शाम को आएगी' या 'आज स्कूल बन्द रहेगा।'


यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि काल और पक्ष का सम्बन्ध उन क्रियाओं के साथ होता है जो प्रारम्भ हो गई हों, हो रही हों या हो चुकी हों। जहाँ क्रिया प्रारम्भ ही नहीं हुई है, उन वाक्यों में तो केवल वक्ता के 'मूड' (mood) या 'वृत्ति' का ही पता चलता है।


परम्परागत व्याकरण के अनुसार भविष्यतकाल के अन्तर्गत आने वाले सभी वाक्यों में वक्ता किसी कथन को कहने में अपने मन की निश्चित भावना को व्यक्त करता है

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जैसे 'मैं बाज़ार जाऊंगा' वाक्य में कर्त्ता के द्वारा - बाजार जाने के प्रति निश्चितता का भाव प्रकट किया गया है परन्तु आधुनिक भाषा विज्ञान के अनुसार काल तो दो ही हैं- 'वर्तमानकाल' तथा 'भूतकाल'। जिसे हम 'भविष्यत्काल' कहते थे, क्रिया प्रारम्भ न होने के कारण उसे 'निश्चयार्थ वृत्ति' या 'भविष्यत वृत्ति' कहना ही अधिक उपयुक्त है। देखिए निश्चयार्थ वृत्ति के अन्य उदाहरण -


(1) सब लोग पिकनिक पर जाएँगे।


(ii) हम लोग खाना नहीं खाएँगे। 


(iii) तुम मुझसे कब मिलोगी?


(iv) आज माताजी खाना नहीं बनाएँगी।