संज्ञा शब्दों का परस्पर परिवर्तन - interchange of noun words

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग


कुछ व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग जातिवाचक संज्ञाओं के रूप में भी हो सकता है। जैसे जब हम किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के नाम का प्रयोग उसके गुण बताने के लिए करते हैं तब वे शब्द जातिवाचक संज्ञा की तरह प्रयुक्त होने लगते हैं, जैसे- भीष्म पितामह 'दृढ़ प्रतिज्ञा' के लिए मशहूर हैं। पर यदि हम कहते हैं कि 'हमीद तो भीष्म पितामह है, उसे अपने रास्ते से कोई नहीं हटा सकता' तो यहाँ हमीद स्वयं भीष्म पितामह नहीं है, बल्कि 'दृढ़-प्रतिज्ञ' है। ऐसी स्थिति में इस वाक्य का 'भीष्म पितामह' शब्द प्रकार्य के आधार पर जातिवाचक संज्ञा माना जाएगा। देखिए अन्य उदाहरण-


(1) हमारे देश को जयचन्दों ने ही लूटा है। 


(ii) भाई ! मुझ सूरदास की मदद करो।


(iii) मैं तो 'एकलव्य' हूँ गुरु के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।


यहाँ 'जयचन्द' धोखेबाज़ के लिए, 'सूरदास' नेत्रहीन के लिए तथा 'एकलव्य' गुरु-भक्ति के लिए प्रयुक्त हुए हैं अतः सभी जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुए हैं।


2. जातिवाचक संज्ञा का व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग


कुछ जातिवाचक संज्ञा शब्द किसी व्यक्ति विशेष के लिए प्रयुक्त होकर अपने अर्थ में 'रूद्र' हो जाते हैं,

जैसे 'महात्माजी' शब्द है तो जातिवाचक संज्ञा पर यदि कोई कहता है कि 'महात्माजी के बलिदान के कारण ही भारत स्वतन्त्र हुआ।' तो यहाँ 'महात्माजी' शब्द जाति का बोध न कराकर 'महात्मा गाँधी' (व्यक्ति) का बोध करा रहा है। अन्य उदाहरण देखिए-


(क) नेताजी ने कहा था, 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा' । (ख) आज़ादी के बाद सरदार देश के उप-प्रधानमंत्री बने ।


(नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ) (सरदार = सरदार पटेल)


3. भाववाचक संज्ञा का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग


'भाववाचक संज्ञा' शब्दों का प्रयोग हमेशा एकवचन में होता है किन्तु यदि इनका प्रयोग बहुवचन में किया जाए तो वे 'जातिवाचक संज्ञा' का प्रकार्य करने के कारण 'जातिवाचक संज्ञा' बन जाते हैं।