भाषा परिवार और आर्यभाषा परिवार - Language family and Aryan language family

विश्व में भाषाओं की संख्या 3000 से 5000 तक मानी जाती है। भाषावैज्ञानिकों द्वारा इन भाषाओं उनकी रूपरचना और अर्थ में साम्य- य-वैषम्य के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। विश्व की भाषाओं का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया गया है आकृतिमूलक तथा पारिवारिक आकृतिमूलक वर्गीकरण मूल रूप से रूप - रचना के आधार पर किया जाने वाला वर्गीकरण है। इसी कारण इसे रूपात्मक या रचनात्मक वर्गीकरण भी कहा गया है। इसमें वर्गीकरण के लिए भाषाओं के बीच 'शब्द / पद रचना' और 'वाक्य रचना' में 'समानता' और 'असमानता' देखी जाती है।

जिन भाषाओं में समानता होती है उन्हें एक वर्ग में रखा जाता है और इस प्रकार से धीरे-धीरे भिन्न-भिन्न दृष्टियों से समान भाषाओं को अलग-अलग वर्गों में वर्गीकृत कर दिया जाता है। इसके दो मूल भेद - 'अयोगात्मक' और 'योगात्मक' हैं। बाद में 'योगात्मक' के कई उपभेद बनते हैं।


जो वर्गीकरण 'रचना' और 'अर्थ' दोनों को ध्यान में रखकर किया जाता है वह 'पारिवारिक वर्गीकरण' कहलाता है। जिस प्रकार से माना गया है कि मानवों की उत्पत्ति एक ही स्थान पर (अफ्रीका) में हुई और फिर वे विश्व के अन्य क्षेत्रों में फैल गए,

उसी प्रकार भाषा के सम्बन्ध में साक्ष्य मिले हैं सभी भाषाएँ किसी आदिभाषा से विकसित हुई हैं और समय तथा परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होकर नयी-नयी भाषाएँ बन गई हैं। इसके लिए हजारों मील की दूरी पर स्थित भाषाओं में पाई जाने वाली समानता सबसे बड़ा प्रमाण है। इस दिशा में चिन्तन का आरम्भ 1786 ई. में सर विलियम जोंस द्वारा दिए गए उस भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषाओं में पर्याप्त समानताएँ हैं। इससे तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा अध्ययन की शुरुआत हुई और भाषाओं के पारिवारिक वर्गीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके लिए ध्वनि, पद-रचना, वाक्य-रचना, अर्थ, शब्द भण्डार आदि सभी भाषायी पक्षों को आधार बनाया गया।


भाषावैज्ञानिकों ने समय के साथ विश्व की विभिन्न भाषाओं को अनेक भाषा परिवारों में वर्गीकृत किया। भाषा परिवारों की संख्या 12 से लेकर 100 तक देखी जा सकती हैं। इन भाषा परिवारों में 18 से 20 परिवारों को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है। भारत में निम्नलिखित भाषा परिवारों की भाषाएँ पाई जाती हैं-


(1) भारोपीय भाषा परिवार, जैसे हिन्दी, मराठी, राजस्थानी आदि।


(ii) द्राविड़ परिवार, जैसे तमिल, तेलुगु, मलयालम आदि ।


(iii) दक्षिण-पूर्व एशियाई (आस्ट्रो एशियाटिक) परिवार, जैसे- मुंडा, संथाली आदि ।


(iv) चीनी-तिब्बती परिवार, जैसे- आसामी, मणिपुरी, गारो आदि।


इन सभी में भारोपीय भाषा परिवार सबसे विस्तृत है तथा इसके बोलने वालों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। इसकी कई उपशाखाएँ भी हैं, जैसे भारत-ईरानी, बाल्तो-स्लाविक, आरमीनी, अलबानी, इटैलिक, ग्रीक, जर्मनिक, केल्टिक, तोखारी और हित्ती। इनमें से 'भारत-ईरानी भाषा परिवार' का भारतीय पक्ष 'भारतीय आर्यभाषा परिवार' के नाम से प्रसिद्ध है।