हिन्दी की विभाषाएँ - हिन्दवी, दक्खिनी हिन्दी, रेख्ता, उर्दू, हिन्दुस्तानी - Languages of Hindi - Hindawi, Deccani Hindi, Rekhta, Urdu, Hindustani
हिन्दवी
आप सुप्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो के नाम और उनकी कविता से अवश्य परिचित होंगे। वे तुर्क थे, लेकिन भारत में आकर पूरी तरह से भारतीय हो गए थे। उन्हें 'हिन्दवी' (हिन्दी) मातृभाषा विरासत में मिली थी। भारतीय होने पर उन्हें गर्व था। वे लिखते भी हैं "तुर्क हिन्दुतानियम मन हिन्दवी गोयम जवाब" अर्थात् मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ हिन्दवी में जबाब देता हूँ। 'नूह सिपेहर' शीर्षक ग्रन्थ सिपेहर में उल्लेख किया है कि अन्य भाषाओं के समान हिन्दुस्तान में प्राचीनकाल से 'हिन्दवी' बोली जाती थी, किन्तु गोरियों और तुर्कों के पश्चात् लोगों ने फ़ारसी भाषा का ज्ञान भी प्राप्त करना शुरू कर दिया था। ख़ुसरो ने इस भाषा को 'हिन्दवी', 'देहलवी' भी कहा है। खुसरो के अलावे दक्खिनी के कवि शरफ ने 'नौसरहार' ( 1503 ई.) में इस भाषा को 'हिन्दवी' कहा है-
नज़्म लिखी सब मौजूँ आन । यो सब 'हिन्दवी' कर आसान।
'हिन्दवी' के साथ 'हिन्दुई' रूप भी मिलता है जिसका स्पष्ट उल्लेख 'कुतुब शतक' (15वीं शती) में मिलता है । 'कुतुब शतक' में जिस भाषा को अपनाया गया है वही दक्षिणी भारत की रियासतों में पहुँचकर है साहित्यिक भाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई है। इसका विकसित रूप ही दक्खिनी बना । 'कुतुब शतक' के सम्पादक डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने स्पष्ट लिखा है- "राउलबेल और दक्खिनी के बीच की जनभाषा कुतुब शतक की भाषा है तथा राउलबेल और कुतुब शतक की जनभाषा की कड़ी गोरखनाथ की बानियाँ हैं।"
(प्रस्तावना, पृष्ठ-5) "हिन्दुई' नाम का सबसे पुराना उल्लेख सुप्रसिद्ध भारतीय फ़ारसी कवि मुहम्मद ऑफी (1228 ई.) में मिलता है। वे मसऊद-ए-उलेमान (मृत्यु 1121 ई.) की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्हें 'हिन्दुई' का भी कवि मानते हैं और कहते हैं कि उनका एक दिवान 'ताज़ी' (अरबी) और फ़ारसी के अलावा हिन्दी में भी था। जैसा कि आपको पहले बताया गया कि इस भाषा का प्रयोग ही 'कुतुब शतक' में मिलता है। 'कुतुब शतक' के वार्तिक तिलक में अन्य भाषाओं के साथ 'हिन्दुई' का नाम भी आया है-
बीबी बिवानां की फ़ारसी हिन्दवी चयारों की हकीकति । तारीफ़ वेद की। कुरान की।
बड़ा भाई ह्युन्दु छोटा भाई मुसलमान ह्युंदई मो पंडित नाम राघो (राखो) सोई नाम ।
- कुतुब शतक और हिन्दुई, डॉ. माताप्रसाद गुप्त, पृ. 25
इस प्रकार हिन्दवी की तीन प्रकार की वर्तनी मिलती है (i) हिन्दुई, (ii) ह्युंदई और (iii) हिन्दवी स्पष्ट है कि 'हिन्दुई' हिन्दी शब्द का पूर्व रूप सिद्ध होता है। हिन्दी साहित्य के अनेक साहित्यकारों ने अमीर खुसरो को हिन्दवी का पहला कवि माना है।
दक्खिनी हिन्दी
भारत के दक्षिण में ले जाई गई दिल्ली-हरियाणा की बोली को 'दक्खिनी' अथवा 'दक्कनी' कहलायी । इसका विकास ऐतिहासिक कारणों से 14वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य बहमनी, कुतुबशाही और आदिलशाही जैसे विभिन्न राज्यों में होता रहा जिसके केन्द्र बीजापुर,
गोलकुंडा, गुलबर्गा, बीदर आदि बने। शाही दफ्तरों में इसको सरकारी जबान का दर्जा भी दिया गया। इसकी उत्पत्ति के बारे में उर्दू व दक्कनी के विद्वान् वरिष्ठ भाषाविद् डॉ. मसूद हुसैन खाँ ने इस प्रकार लिखा है "कदीम दक्खिनी को अगर किसी बोली से गहरी निस्बत हो सकती है। तो वह दिल्ली के नवाह की दो बोलियाँ यानी कड़ी बोली और हरियाणा हैं। जिनकी कदामत पर शुबह करना तारीखी नुक्ते-नज़र से सरासर गलत है। हमारे ख्याल से दक्कनी की तमाम खसुसियात नवाहे दिल्ली के पास के इजलाह की बोलियों से की जा सकती है।" दक्खिनी भाषा का मूलाधार चौदहवीं -पन्द्रहवीं की वह खड़ीबोली है।
जो अपने मूल रूप में मेरठ, मुरादाबाद, हरियाणा में बोली जाती थी। दक्षिण और दक्खन एक होते हुए भी भाषापरक अर्थ में 'दक्खनी' या 'दक्कनी' ही प्रयोग में आता है। मुसलमानों के आगमन के बाद में 'दक्खनी' उस भूभाग के लिए प्रयुक्त होने लगा जो किसी समय दक्षिणपथ कहा जाता था। खानदेश और बरार को छोड़कर शेष महाराष्ट्र दक्खिन (Deccan) कहलाने लगा। गोदावरी और कृष्णा के मध्य का प्रदेश दखिन कहलाया। अकबर काल में दक्खिनी सीमाओं में परिवर्तन हुआ। औरंगज़ेब ने छह प्रदेशों को मिलाकर 'दक्खिन' की रचना की- बरार, खानदेश, औरंगाबाद हैदराबाद, मुहम्मदाबाद तथा बीजापुर। 'दक्खिनी' साहित्य की सर्जना महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना आदि में हैदराबाद को केन्द्र मानकर की गई। 'दक्खिनी' हिन्दी साहित्य की ऐसी कड़ी है जिसको अब नकारा नहीं जा सकता। इस प्रदेश के एक कवि वजही ने इस प्रदेश के बारे में लिखा है-
दखन-सा ठार संसार में 1
दखन है नगीना अँगूठी है जग ।
निपज (उपज) फ़ाजिला (निपुण) का है इस ठार में | दखिन मुल्क कहन धन अजब साज है।
अंगूठी कूँ हरमत नगीना है लग ॥
कि सब मुल्क सिर होर दखन ताज है ।
वजही 'मर्सिया' लिखने में निपुण थे। दुःख दारुण से घिरी नारी का चित्र द्रष्टव्य है-
काली न चोरी चिर बंदी बैठी है ज्यों कालिंदी। काले लटों काले भुआँ काले गले में गलसरी ॥
हिन्दी की तरह दक्खिनी का प्रयोग दो अर्थों में होता है (i) दक्षिण निवासी मुसलमान (ii) दक्कनी
जबान ।
हब्सन जोबसन के अनुसार दक्कनी हिन्दुस्तान की ऐसी विचित्र जबान है जिसको मुसलमान बोलता है। इसका पहली बार प्रयोग सन् 1516 में किया गया जिसमें इस भाषा को देश की स्वाभाविक भाषा स्वीकार किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक इसका भाषिक स्वरूप स्थिर हो गया “Deccan, adj. also used as subt. Properly dakshini, dakkhini, damini, coming from the Deccan. Also the very dialect of Hindustani spoken by such people." (Hobson Hobson, 1903, P. 302)
डॉ. सुनीतिकुमार चाटुजर्या ने स्वीकार किया है "पश्चिमी हिन्दी की ओकारान्त बोलियों से एक प्रचलित सार्वदेशिक भाषा का जन्म हुआ, जिस पर आद्य पंजाबी का भी थोड़ा-बहुत प्रभाव पड़ा । सोलहवीं शताब्दी में प्रथम बार दक्कन में इसके एक रूप का साहित्य के लिए उपयोग हुआ जो ब्रजभाषा से मिलकर उत्तरी भारत की भविष्य की साहित्यिक भाषा का प्रारम्भिक स्वरूप बना। इसी सार्वदेशिक भाषा के दक्कनी रूप का दक्षिण में गोलकुंडा आदि स्थानों में मुसलमानों ने भी सर्वप्रथम इसे फ़ारसी लिपि में लिखकर इसका काव्य के लिए व्यवहार किया।"
(आर्यभाषा और हिन्दी, पृ. 217) दक्खिन में पन्द्रहवीं शताब्दी में इसका फैलना प्रारम्भ हो गया था। जब उत्तर भारत में फ़ारसी का प्रभुत्व बना रहा तो दक्षिण में 'दक्कनी' का हिन्दी ने जो कदम दक्खिन में जमाए उन्हें फ़ारसी हिला न सकी। सुप्रसिद्ध इतिहासकार फ़रिश्ता ने लिखा है कि "बहमनी राज्य के दफ्तरों में हिन्दी जबान प्रचलित थी और सल्तनत ने उसे सरकारी ज़बान का पद दे रखा था। बहमनी राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद हिन्दी का यह पद उत्तराधिकार में रियासतों ने कायम रखा।" (बाबूराम सक्सेना, दक्खनी हिन्दी, पृ. 33-34) दक्कनी का एक और रूप दक्षिण में मैसूर तथा केरल में भी विकसित हो गया। तलश्शेरी के कासिम खाँ के एक तील्लना गीत की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
बजे नक्कारे दनी के सारे
धुंध चनाघन घनघनाना
तबल पै थापा पड़े पिपड़धक
गिडघन गिड़घन गिड़घनना
अब रमझम रमझम निन्दनिया से
हुमझुम हो जाय होशियारा
डॉ. जी. गोपीनाथन ने अपने शोध ग्रन्थ में केरल की दक्कनी पर भी चर्चा की है।
दक्षिण के ही अन्य विद्वान् डॉ. एन. पी. कुट्टन ने दक्कनी के ग्रन्थों का आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि "बोलचाल की दक्खिनी गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के अतिरिक्त तमिलनाडु तथा केरल में भी सुनी जाती है।
इस पर क्षेत्रीय भाषाओं का भी प्रभाव पड़ा है। इसलिए क्षेत्रीय आधार पर भेद-उपभेद है... उसने (खड़ीबोली ) गुजराती तथा मराठी के कई तत्त्वों को कालान्तर में आत्मसात किया। इन तत्त्वों को उसने इस ढंग से आत्मसात किया कि वे दक्खिनी के निजी गुण बन गए। लेकिन दक्खनी ने जब अपने सीमा का विस्तार किया तब उस पर तेलुगु, तमिल, मलयालम का भी प्रभाव पड़ा। दक्खिनी हिन्दी के प्रारम्भिक ग्रन्थों में तत्सम तथा अर्द्ध-तत्सम शब्दों की ओर झुकाव स्पष्ट देखा जा सकता है,
पर मध्यकाल में यह भाषा फ़ारसीकरण की ओर धीरे-धीरे झुकती- सी दिखाई देती है।" (भारतीय भाषाओं का दक्खिनी पर प्रभाव अध्ययन और अनुशीलन, पृ. 224) इस भाषा को कुछ अन्य नामों से भी जाना जाता है गोसाधि भाषा, तुलुक भाषा ( मुसलमानों की भाषा), पट्टानी भाषा (पठानों की भाषा), हिन्दी भाका, हिन्दवी, गुजरी, रेख्ता, भाका आदि।
रेख़्ता
रेख्ता हिन्दी की वह शैली है जिसमें अरबी-फारसी के शब्दों का मिश्रण हो । रेख्ता उर्दू का पर्यायवाची नहीं है । रेख़्ता की व्युत्पति के सम्बन्ध में विद्वानों में काफी मतभेद है। कुछ मतों को आप जान लीजिए-रेख्ता शब्द फ़ारसी के रेखतन मस्दर से बना है, जिसका अर्थ है- रचना,
बनाना, डालना, मिलाना, तोडना, छिड़कना इत्यादि । संस्कृत की 'रिच' धातु तथा फ़ारसी का 'रख्तन' मस्दर मूलतः एक है। 'रिच' का अर्थ गिराना, अलगाना आदि होता है। लैटिन, ग्रीक आदि में यह धातु है। 'रेख्ता' का फ़ारसी में अर्थ गिरा हुआ या गिराकर बनाया हुआ ढेर आदि है। भारत में 'रेख्ता' शब्द का प्रयोग पहले छन्द और संगीत के क्षेत्र में हुआ है। इन दोनों ही क्षेत्रों में इसमें 'मिलने' या 'मिश्रण' का भाव है। फ़ारसी और भारतीय पद्धति को मिलकर बनाया गया है। साथ ही ऐसे छन्दों को भी रेख्ता कहा गया है, जिनमें कुछ अंश फ़ारसी का तथा कुछ अंशहिन्दी का हो।
रेख्ता मुख्तलिफ़ जबानों के अल्फ़ाज़ से (विभिन्न भाषाओं के शब्दों से) भाषा को रेख्ता- पुष्ट या अलंकृत किया गया हो,
जैसे ईट की दीवार को चुने या सीमेंट के प्लास्टर से पायदारी और हमवारी मजबूती और सजावट के लियर रेख्ता करते हैं। (आबेहयात)
रेख़्ता को बमानी गिरे हुए यानी जो ज़बान अपनी असलियत से गिर जाए भी कहा गया है। (मुंशी दुर्गाप्रसाद) विभिन्न अँगरेज़ विद्वानों ने भी रेख्ता को परिभाषित करने की कोशिश की है The Hindustani Language (being mixed one) is called Dekhta. (a) Hindustani verse written in the tones and idioms of women with peculiar sentiments and characteristics. (फैलन)
'हिन्दी रेख्ता' का प्रयोग विशेष महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार हिन्दुस्तानी आज हिन्दी और उर्दू के बीच की
चीज समझी जाती है,
उसी प्रकार उस समय रेख्ता बीच की भाषा समझी जाती थी। रेख्ता उर्दू नहीं, चाहे व्यवहार में उर्दू का साथ देती रहे । फोर्ट विलियम कॉलेज के मुंशियों को सलाह दी गई कि वे ठेठ हिन्दुस्तानी, खड़ीबोली, "हिन्दी रेख्ता में लिखना शुरू करें। इसी से साहबों का काम चलेगा।" साहब (जान गिलक्राइस्ट) ने लल्लूलाल से कहा कि ब्रजभाषा में कोई अच्छी कहानी हो, उसे रेख्ते की बोली में कहो। मीर का मशहूर शेर है -
मज़बूत कैसे कैसे कहे रेख़्ते वाले,
समझा न कोई मेरी जबाँ इस दियार में
ग़ालिब का प्रसिद्ध शेर है -
रेखते के तुम ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था।
उर्दू
उर्दू भाषा हिन्द आर्यभाषा है। उर्दू भाषा हिन्दुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप मानी जाती है। उर्दू में संस्कृत के तत्सम शब्द न्यून हैं और अरबी-फारसी और संस्कृत से तद्भव शब्द अधिक हैं। ये मुख्यतः दक्षिण एशिया में बोली जाती है। यह भारत की शासकीय भाषाओं में से एक है तथा पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा भी है। इस के अतिरिक्त भारत के राज्य तेलंगाना, दिल्ली, बिहार और उत्तरप्रदेश की अतिरिक्त शासकीय भाषा है।
राजकाज में फ़ारसी भाषा का प्रयोग जब कम हो गया तो हिन्दवी का फ़ारसीयुक्त रूप 'ज़बाने उर्दू-ए- मुअल्ला' - शाही खेमे या दरबार की भाषा एक तरह से बादशाही भाषा बनी। जिसका अट्ठारहवीं सदी में फ़ौज- शासन में प्रयोग किया जाने लगा। यह समय मुग़ल साम्राज्य का अन्तिम समय कहा जा सकता है। मुहम्मद बाकर 'आगह' (1743–1805 ई.) की रचनाओं में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मिलता है । उनके अनुसार इस भाषा ( भाका) उर्दू का प्रारम्भ मुहम्मद शाह रंगीले के शासनकाल में हुआ। उन्होंने 'उर्दू की भाषा' और 'दक्खिनी ज़बान' में इस प्रकार भेद किया "और इन सब रिसालों में शायरी नहीं किया हूँ,
बल्कि साफ़ और सादा कहा हूँ - और उर्दू के भाके में नहीं कहा क्या वास्ते कि रहने वाले यहाँ के (दक्षिणी) इस भाके से वाकिफ नहीं है। ऐ भाई यह रिसाले दक्खिनी ज़बान में है।" उर्दू की उत्पत्ति के बारे में चन्द्रबली पाण्डेय ने शाह अब्दुल कादिर के विचार उदधृत किये हैं। शाहजी ने कुरान शरीफ का अनुवाद किया और उसकी भाषा के सम्बन्ध में लिखा था - "अब कई बातें मालूम रखिए। अव्वल यह कि तरजुमा लफ़ज़बलफ़ज़ ज़रूर नहीं, क्योंकि तरकीब हिन्दी तरकीब अरबी से बहुत बईद है दूसरे यह कि रेख्ता नहीं बोली बल्कि हिन्दी मुतारफ्ता अनाम को बेतकल्लुफ दरियाफ्त हो ।” पाण्डेयजी के अनुसार शाह साहब ने 'रेख्ता' और 'हिन्दी मुतारफ' में भेद किया है।
मौलाना अब्दुल हक के अनुसार "हिन्दी मुतारफ से वही ज़बान मुराद है जिसे आजकल हिन्दुस्तानी से तबीर किया जाता है।" इसी को डॉ. बेली ने उर्दू कहा है। उर्दूतुर्की शब्द है। जिसका अर्थ है- लश्कर (छावनी)। शुरू में मुगल और तुर्क छावनी में ही रहते थे। उनका दरबार तथा रनवास सब लश्कर में ही होता है। बागोबहार के लेखक मीर उम्मन ने इस सम्बन्ध में लिखा है- "हकीकत उर्दू की जबान को बुजुर्गों के मुँह से यूँ सुनी है कि दिल्ली शहर हिन्दुओं के नज़दीक चौजुगी है उन्हीं के राजा, परजा, कदीम से वहाँ रहते थे और अपनी भाखा बोलते थे।
... लश्कर का बाजार शहर में दाखिल हुआ। इस वास्ते शहर का बाजार उर्दू कहलाया... इक्कठे होने से आपस में लेन-देन, सौदा सुल्फ, सवाल जबाब करते-करते एक ज़बान उर्दू की मुक़र्रर हुई। ... और वहाँ के शहर को उर्दू मुअल्ला खिताब दिया ।" (बागोबहार, भूमिका) शम्शुलउल्लेमा मुहमद हसन ने भी लिखा है कि "उर्दू का दरख्त अगरचे संस्कृत और भाषा की ज़मीन में उगा, मगर फ़ारसी की हवा में सरसब्ज़ हुआ है।" सय्यद इंशा अल्लाह ने साफ़ साफ़ लिखा है कि "लाहौर, मुल्तान, आगरा, इलाहाबाद की वह प्रतिष्ठा नहीं है जो शाहजहानाबाद या दिल्ली की है जहाँ उर्दू का जन्म हुआ।" उर्दूतो धीरे-धीरे आती है जिसको दरिया साहब ने साफ़-साफ़ कह दिया-
नहीं खेल है दाग़ चारों से कह दो कि आती है उर्दू जबाँ आते आते।
यही कारण है कि ईशा साहब ने साफ़ कह दिया कि "उसको ही मुस्तनद और सही उर्दू आयेगी जो कुलीन-नजीब होगा, जिसके माँ-बाप दिल्ली के निवासी हों।" यह बात चुने हुए आदमियों के सम्बन्ध में ही है, स्वयं ईशा भी ठीक उर्दू के स्थान पर कड़ी बोली हिन्दी की ओर झुक गए क्योंकि रची हुई ताज़ा ज़बान को ठीक से नहीं पचा सके। बाद में दिल्ली में जो उर्दू-ए-मुअल्ला यानी उर्दू भाषा थी, वही लखनऊ में पहुँचकर 'उर्दू' बन गई। वहीं दिल्ली में मीर साहब ने जामा मस्जिद के आस-पास की भाषा को काफी महत्त्व दिया। बोलने के हिसाब से उर्दू-ए-मुअल्ला के स्थान पर मात्र उर्दू रह गई। कहा जाता है कि भाषा के अर्थ में उर्दूका प्रयोग मुशहफ़ी ने किया, जिनकी मृत्यु सन् 1824 ई. में हुई।
ख़ुदा रक्खे ज़बाँ हमने सुनी है मीर वो मिरज़ा की, कहें किस मुंह से हम ये 'मुसहफ़ी' उर्दू हमारी है ।
इससे पता चलता है कि मीर साहब जिस भाषा में लिखते थे वही उर्दू कहलाई, जिसका उल्लेख सय्यद सुलेमान नदवी ने किया है- "चुनांच लफ्ज़ 'उर्दू' ज़बान के मानी में, देहली के अलावा किसी सूबा की जबान पर इतलाक़ नहीं पाया है। मीर तकी मीर सनद में जब उसका नाम पहली दफ़ा आया तो देहली की जबान के लिए आया है। मगर फिर भी वह इस्तेलाह के तौर पर नहीं, बल्कि लुगत के तौर पर आया है, यानी मीर ने 'उर्दू ज़बान' नहीं कहा, बल्कि 'उर्दू की ज़बान' कहा है।" (द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ) इससे स्पष्ट होता है कि मूल में उर्दू शाही दरबार तक सीमित रही पर बाद में चलकर वह जनसाधारण की आम बोलचाल की भाषा हो गई और हिन्दी की शैली के रूप में स्वीकृत होते हुए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित हुई।
हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तानी भाषा हिन्दी और उर्दू का एकीकृत रूप है । ये हिन्दी और उर्दू दोनों के बोलचाल की भाषा है। इसमें संस्कृत के तत्सम शब्द और अरबी-फ़ारसी के उधार लिये गए शब्द, दोनों कम होते हैं। यही हिन्दी और उर्दू का वह रूप है जो भारत की जनता रोज़मर्रा के जीवन में उपयोग करती है और हिन्दी सिनेमा इसी पर आधारित है। ये हिन्द यूरोपीय भाषा परिवार की हिन्द आर्य शाखा में आती है ये देवनागरी या फारसी अरबी, किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है। प्रारम्भ में हिन्दी-उर्दू दोनों एक ही थीं, बाद को जब व्याकरण, पिसल, लिपि और शैली भेद आदि के कारण दो भिन्न दिशाओं में पड़कर यह एक दूसरे से बिलकुल पृथक् होने लगीं, तो सर्वसाधारण के सुभीते और शिक्षा के विचार से इनका विरोध मिटाकर इन्हें एक करने के लिए भाषा की इन दोनों शाखाओं का संयुक्त नाम हिन्दुस्तानी रखा गया।
हिन्दी-उर्दू का भण्डार दोनों जातियों के परिश्रम का फल है। अपनी-अपनी जगह भाषा की इन दोनों शाखाओं का विशेष महत्त्व है। दोनों ही ने अपने-अपने तौर पर यथेष्ट उन्नति की है। दोनों ही के साहित्य भण्डार में बहुमूल्य रत्न संचित हो गए हैं और हो रहे है। हिन्दी वाले उर्दू साहित्य से बहुत कुछ सीख सकते हैं। इसी तरह उर्दू वाले हिन्दी के खजाने से फायदा उठा सकते हैं। यदि दोनों पक्ष एक दूसरे के निकट पहुँच जाएँ और भेद बुद्धि को छोड़कर भाई-भाई की तरह आपस में मिल जाएँ तो वह गलतफहमियाँ अपने आप ही दूर हो जाएँ, जो एक से दूसरे को टू किए हुए हैं। ऐसा होना कोई मुश्किल बात नहीं है। सिर्फ मजबूत इरादे और हिम्मत की ज़रूरत है, पक्षपात और हठधर्मी को छोड़ने की आवश्यकता है। बिना एकता के भाषा और जाति का कल्याण नहीं।
गाँधीजी ने कहा था कि हमारी भाषा का नाम हिन्दुस्तानी होना चाहिए, उन्होंने हिन्दुस्तानी नाम को पसंद किया तो किया लेकिन उनकी हिन्दुस्तानी की परिभाषा अपनी अलग थी। उनकी हिन्दुस्तानी 'हिन्दी-उर्दू से भिन्न, इन दोनों के बीच सरल शैली थी जिसमें प्रचलित शब्दों का ग्रहण होगा, देशी और विदेशी शब्दों का भेद नहीं किया जायेगा । जबकि हिन्दुस्तानी हिन्दी की सामान्य बोलचाल की सामान्य भाषा शैली है जिसे उर्दू का भी पर्यायवाची माना जा सकता है और हिन्दी का भी जिसको उत्तर भारत में हिन्दू व मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी अथवा फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है।
हिन्दुस्तानी का स्वरूप और सीमा इतना सरल नहीं है फिर भी यह जरूर कहा जाना चाहिए कि हिन्दुस्तानी गली बाजार, मोहल्ले
, सिनेमा की भाषा है उसमें वह औपचारिकता ज़रूरी नहीं है,
जो साहित्य, प्रशासन व शिक्षा के क्षेत्र में होती है। वह लोगों की दिन-प्रतिदिन की अनुभूतियों, अनुभवों और आवश्यकताओं को प्रतिबिम्बित करती है । रोजमर्रा के जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों को व्यक्त करती है। ऐसी अभिव्यक्ति के लिए तकनीकी पारिभाषिक शब्दों की नहीं, मुहावरों और लोकोक्तियों की आवश्यकता होती है। भारत भर में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और पूर्वी छोर से पश्चिमी छोर तक हिन्दुस्तानी को जानने-समझने वाले उसके माध्यम से व्यापार करने वाले करोड़ों लोग फैले हुए हैं। रेल बस में सफर करने वाले सामान्य भारतीय चाहे वे किसी भी प्रान्त के हों, उनकी भाषा मातृभाषा चाहे जो हो, आपस में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह हिन्दुस्तानी है । अनेक साहित्यकारों ने भी हिन्दुस्तानी के स्वरूप को सुरक्षित रखा है। प्रेमचंद उनमें अग्रणी हैं।
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