प्रगतिवादी आलोचना के मुख्य सरोकार - Main concerns of progressive criticism

प्रगतिवादी आलोचना के अनुसार साहित्य का कार्य सामाजिक परिवर्तन के प्रति विश्वास पैदा करना है। यह मार्क्सवादी साहित्य-दृष्टि की क्रान्तिकारी भूमिका है। साहित्य गतिशील सामाजिक यथार्थ का कलात्मक चित्रण करते हुए समाज के अन्तर्विरोधों और सामाजिक सम्बन्धों की व्याख्या करता है। इस प्रकार वह समाज की परिवर्तनकारी शक्तियों के कार्यों को गति और दिशा देता है तथा संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करता है।


डॉ. रामविलास शर्मा साहित्य की प्रगतिशीलता के प्रश्न को समाज पर साहित्य के अच्छे और बुरे प्रभाव के प्रश्न के रूप में देखते हैं। उन्होंने लिखा है कि "प्रगतिशील साहित्य से मतलब उस साहित्य से है जो समाज को आगे बढ़ाता है,

मनुष्य के विकास में सहायक होता है।" ('मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य') लेकिन क्या प्रगतिशील होने से ही साहित्य श्रेष्ठ हो जाता है ? डॉ. शर्मा का उत्तर है कि "प्रगतिशील साहित्य तभी प्रगतिशील है जब वह साहित्य भी है। यदि वह मर्मस्पर्शी नहीं है, पढ़ने वाले पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता है, तो सिर्फ नारा लगाने से या प्रचार की बात करने से वह श्रेष्ठ साहित्य क्या, साधारण साहित्य भी नहीं हो सकता ।" (वही) प्रगतिशील साहित्य अश्लीलता, निराशावाद, कुण्ठित मानसिकता, अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता और व्यक्तिवाद का विरोधी है। वह मानव मात्र की समानता और शोषण मुक्त समाज का निर्माण करने वाला साहित्य है।


डॉ. नामवर सिंह का विचार है कि "प्रगतिशील साहित्य कोई स्थिर मतवाद नहीं है, बल्कि यह एक निरन्तर विकासशील साहित्य-धारा है, जिसके लेखकों का विश्वास है कि प्रगतिशील साहित्य लेखक की स्वयंभू अन्तःप्रेरणा से उद्भूत नहीं होता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के क्रम से वह भी परिवर्तित और विकसित होता रहता है और उसके सिद्धान्त उत्तरोत्तर स्पष्ट तथा अधिक पूर्ण होते चलते हैं।" ('आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ)


परम्परा का मूल्यांकन


प्रगतिशील लेखक संघ के आरम्भिक दिनों में कुछ आलोचक पुराने का विरोध और नये का समर्थन करने को मार्क्सवाद मानकर साहित्य का मूल्यांकन करने लगे थे।

छायावाद और पूर्ववर्ती साहित्य की आलोचना करते हुए स्वयं शिवदान सिंह चौहान ने 1937 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध निबन्ध 'भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता' में लिखा था कि "इस छायावाद की धारा ने हिन्दी के साहित्य को जितना धक्का पहुँचाया है उतना शायद ही हिन्दू महासभा या मुस्लिम लीग ने पहुँचाया हो।" (यद्यपि बाद में उन्होंने अपने इस लेख को उस समय की मार्क्सवादी साहित्यालोचना की मतवादी संकीर्णताओं से प्रभावित माना है ।) प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणापत्र (1938) में भी समस्त प्राचीन साहित्य को नकारात्मक दृष्टि से देखा गया और विचार प्रकट किया गया कि "वह रूप और विषयवस्तु की दृष्टि से निस्तेज हो गया है और उसने जड़वाद तथा निर्जीव और रुग्ण विचारधारा अपना ली है।"

लेकिन उस दौर में भी एक धारा के आलोचक संस्कृति का द्वन्द्वात्मक मूल्यांकन करते हुए उसके जीवन्त और मृत तत्त्वों में अन्तर करने को बहुत महत्त्व दे रहे थे। जनसंस्कृति के निर्माण में परम्परा के जीवन्त तत्त्वों के योगदान को स्वीकार करते हुए परम्परा के महत्त्व को रेखांकित किया जा रहा था। यह प्रगतिवाद की मुख्यधारा थी और डॉ॰ रामविलास शर्मा इसके मुख्य प्रवक्ता थे। उनका विचार था कि जैसे सामाजिक जीवन में कोई नयी व्यवस्था पुरानी व्यवस्था से एकदम अलग होकर नहीं आ सकती, वैसे ही साहित्य में भी उसके विकास क्रम को पूरी तरह से भंग करके शून्य में नया साहित्य नहीं लिखा जा सकता। उन्होंने लिखा है कि " जो महत्त्व ऐतिहासिक भौतिकवाद के लिए इतिहास का है,

वही आलोचना के लिए साहित्य की परम्परा का है। इतिहास के ज्ञान से ही ऐतिहासिक भौतिकवाद का विकास होता है, साहित्य की परम्परा के ज्ञान से ही प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है । ऐतिहासिक भौतिकवाद के ज्ञान से समाज में व्यापक परिवर्तन किए जा सकते हैं और नयी समाज- व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। प्रगतिशील आलोचना के ज्ञान से साहित्य की धारा मोड़ी जा सकती है। और नये प्रगतिशील साहित्य का निर्माण किया जा सकता है।" ('परम्परा का मूल्यांकन)


डॉ० रामविलास शर्मा के अनुसार “किसी भी युग में कोई भी वर्ग एकदम नये सिरे से साहित्य या संस्कृति की रचना नहीं करता। वह मनुष्य की तब तक की संचित ज्ञानराशि से लाभ उठाकर अपने दृष्टिकोण से उसका मूल्यांकन करके और उसके स्वस्थ तत्त्वों के आधार पर ही नये साहित्य, नयी संस्कृति का निर्माण करता है।" वस्तुतः प्रगतिवादी आलोचना इतिहासबोध के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से परम्परा का सही अर्थ ग्रहण करती है और परम्परा के सम्बन्ध में प्रचलित भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करती है। परम्परा के निष्प्राण तत्त्वों को छोड़कर तथा उसके प्राणवान तत्त्वों को अपनाकर ही प्रगतिशील आलोचना आगे बढ़ी है। आगे चलकर अन्य प्रगतिवादी आलोचकों ने परम्परा के महत्त्व को समझा और उसके मूल्यवान् तत्त्वों के विकास पर बल दिया।

शिवदान सिंह चौहान ने लिखा कि "हर नया साहित्य आन्दोलन अपनी पूर्ववर्ती परम्परा से विद्रोह करता है, किन्तु साथ ही उस परम्परा की श्रेष्ठ और मूल्यवान् उपलब्धियों का अपने अंदर समाहार करके उसका विस्तार करता है।"


मार्क्सवाद परम्परा के प्रति आँख बंद करके केवल श्रद्धाभाव से उसे देखने के नज़रिये के स्थान पर विवेकसम्मत आलोचनात्मक दृष्टि से उसका विश्लेषण करने को आवश्यक मानता है। परम्परा के सकारात्मक पक्षों का विकास और नकारात्मक पक्षों का त्याग ही प्रगति है। परम्परा के प्रगतिशील तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उसमें इतिहास का नया रूप खोज निकालना तथा उसे राष्ट्रीय स्वत्व और स्वाभिमान से जोड़ना प्रगतिशील आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण कार्य रहा है।

उसने परम्परा को स्वाधीनता और प्रगति की प्रेरणा देने वाली शक्ति के रूप में नयी परिभाषा और पहचान दी। इससे सामन्तविरोधी और साम्राज्यविरोधी संघर्ष की एकजुटता कायम करने की दिशा में सहायता मिली। डॉ० रामविलास शर्मा के आलोचनात्मक संघर्ष में प्रगतिवादी आलोचना के इन सरोकारों को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।


सामाजिक जीवन और साहित्य


मार्क्सवाद के अनुसार सामाजिक परिस्थितियाँ मनुष्य की चेतना का निर्धारण करती हैं और कला और साहित्य सम्बन्धी चेतना मनुष्य की व्यापक चेतना का ही रूप है।

इसलिए प्रत्येक युग में कलाकार अपने सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि साहित्य की सामाजिक व्याख्या और भौतिक जगत् का विवेचन करना आलोचना का आवश्यक कार्य हैं, क्योंकि मनुष्य की चेतना का विकास उसके सामाजिक अस्तित्व से ही होता है। उनके अनुसार साहित्य-विवेक मूलतः जीवन-विवेक है और कलाकृति भोगे हुए जीवन की विधायक पुनर्रचना होती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी चेतना के आधार पर सामाजिक जीवन का आभ्यन्तरीकरण करता है और इस प्रक्रिया में ही उसकी जीवन-दृष्टि का विकास होता है।


प्रगतिवादी आलोचना के अनुसार साहित्य सामाजिक जीवन का अंग होता है इसलिए उसका इतिहास और स्वरूप सामाजिक इतिहास और समाज से एकदम अलग नहीं हो सकता।

साहित्य एक सामाजिक निर्मिति है।


इसलिए उसका मूल्यांकन भी सामाजिक सोद्देश्यता और उपयोगिता के आधार पर किया जाना आवश्यक है। लेखक एक सामाजिक व्यक्ति होता है। वह सामाजिक शक्तियों के प्रकार्यों के अन्तर्गत ही साहित्य-सृजन करता है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में उपलब्ध सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति ही किसी न किसी रूप में उसकी रचनाओं में होती है। सामाजिक यथार्थ से एकदम विपरीत और अलग स्थितियों और तथ्यों का चित्रण रचना को अविश्वसनीय और सामाजिक दृष्टि से अनुपयोगी बना देता है।

डॉ० रामविलास शर्मा के शब्दों में "साहित्य की विकासमान, परिवर्तनशील विषयवस्तु रचनाकार का मनमाना व्यापार न होकर समाज का आधार पाकर सार्थक दिखाई देती है।"


समाज और साहित्य में परस्पर सापेक्षता का सम्बन्ध होता है। जहाँ साहित्य सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है वहीं वह समाज को भी प्रभावित और परिवर्तित करता है। रचनाकार समसामयिक सामाजिक यथार्थ और सामाजिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में अपनी रचनात्मक स्वतन्त्रता का उपयोग कर सकता है। वह तभी स्वतन्त्र रह सकता है जब वह सामाजिक परिवेश से स्वयं को सम्बद्ध रखे तथा लेखन के माध्यम से सामाजिक प्रगति में योगदान दे।