हिन्दी क्रिया के प्रमुख भेद - Main differences of Hindi verbs

हिन्दी में मुख्य रूप से दो तरह की क्रियाएँ मिलती हैं- 'मूल क्रियाएँ (Basic Verbs) तथा 'व्युत्पन्न क्रियाएँ' (Derivd Verbs)। संरचना की दृष्टि से मूल क्रियाएँ 'सरल क्रियाएँ' (simple verbs) हैं, जैसे खाना, पीना, गाना, बजाना, देना, लेना आदि। 'व्युत्पन्न क्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं जो मूल क्रियाओं में अन्य अंश जोड़कर व्युत्पन्न (derive) की जाती हैं, जैसे- 'चल देना', 'खा लेना', 'सो जाना', 'सुलाना', 'सुलवाना', 'भूख लगना' आदि।


(1) मूल क्रियाएँ (Basic Verbs) -


अंग्रेजी में 'अकर्मक क्रिया' को 'Intrasitive Verb' तथा 'सकर्मक क्रिया' को 'Transitive Verb' कहते हैं। ये दोनों 'बेसिक क्रियाएँ हैं तथा संसार की हर भाषा में पाई जाती हैं। क्रिया के ये दोनों भेद इस आधार पर किए गए हैं कि क्रिया 'कर्म' (Object) की अपेक्षा करती है या नहीं ?

;

वाक्य में 'कर्म' उपस्थित है या नहीं, इस बात से क्रिया की 'अकर्मकता' या 'सकर्मकता' तय नहीं होती। अकर्मक होना या सकर्मक होना क्रिया के गुण हैं। क्रिया के इन गुणों का पता इस बात से नहीं चलता कि वाक्य में 'कर्म' उपस्थित है या नहीं बल्कि क्रिया पर 'क्या' तथा 'किसे' जैसे शब्दों से प्रश्न करने से चलता है। 'क्या' प्रश्न के उत्तर में क्रिया किसी 'वस्तु' या 'निर्जीव संज्ञा' (प्रत्यक्ष कर्म) की अपेक्षा करती है तथा 'किससे / किसे / किसको' आदि प्रश्नों के उत्तर में किसी व्यक्ति' या 'सजीव संज्ञा' (अप्रत्यक्ष कर्म) की अपेक्षा करती है। 'कर्म' (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) की अपेक्षा करने के कारण ही वह 'सकर्मक' कहलाती है तथा जो क्रिया 'कर्म' की अपेक्षा नहीं करती तो वह 'अकर्मक'।


(क) अकर्मक क्रिया (Intransitive verb) -


'अकर्मक क्रिया वह क्रिया है जो वाक्य में 'कर्म' की अपेक्षा नहीं करती', जैसे 'आना' 'जाना', चलना', 'दौड़ना', 'सोना', 'हँसना', 'रोना', 'मुसकुराना' आदि। देखिए निम्नलिखित उदाहरण-

;

(1) बच्चे घर गए।


(ii) तुम क्यों हँस रहे हो ?


(iii) मैं रोज सुबह दौड़ता हूँ।


(iv) वह रात को दस बजे सोती है।


उपर्युक्त समस्त वाक्यों की क्रियाओं पर यदि 'क्या' से प्रश्न किया जाए तो इन क्रियाओं पर प्रश्न ही नहीं


बनता। उदाहरण के लिए हम यह नहीं कह सकते कि 'क्या हँस रहे हो? ऐसी क्रियाएँ 'अकर्मक' कहलाती हैं।


(ख) सकर्मक क्रिया (Transitive Verb) -


जो क्रिया 'कर्म' की अपेक्षा करती है वह 'सकर्मक' होती है, जैसे 'खाना' पीना', 'देखना', 'करना', 'लेना', 'देना' आदि। वाक्य में कर्म उपस्थित हो भी सकता है और नहीं भी। देखिए उदाहरण-

;

(1) नीला खाना बना रही है, तुम कब बनाओगी?


(ii) मैं फिल्म देख रहा हूँ, आओ तुम भी देखो।


(iii) सब लड़कियों ने गीत गाया था। तुमने क्यों नहीं गाया


(iv) मैंने अभी-अभी चाय पी थी, तुम भी पियोगे ?


सकर्मक क्रिया के उपभेद -


सकर्मक क्रिया के दो उपभेद होते हैं एककर्मक तथा द्विकर्मक।


एककर्मक सकर्मक क्रिया-


जो सकर्मक क्रिया केवल एक ही 'कर्म' (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) की ही अपेक्षा करती है, एककर्मक क्रिया


कहलाती है, जैसे-

;

(i) धोबी ने कपड़े धोए।


(क्या धोये ?


( क्या नहीं किया ?


?


उत्तर- कपड़े (प्रत्यक्ष कर्म))


उत्तर काम (प्रत्यक्ष कर्म))


(ii) नौकर ने आज काम नहीं किया ?


(ii) द्विकर्मक सकर्मक क्रिया-


वाक्य को पूरा करने के लिए कुछ सकर्मक क्रियाएँ दो-दो कर्मों की अपेक्षा करती हैं। एक 'प्रत्यक्ष कर्म' जिसका पता क्रिया पर 'क्या' शब्द से प्रश्न करने पर चलता है तथा दूसरा 'अप्रत्यक्ष कर्म' जिसका पता क्रिया पर 'किस / किसे' शब्दों से प्रश्न करने पर लगता है, जैसे 'माँ बच्चे को मिठाई दे रही है।'

;

इस वाक्य में 'मिठाई' प्रत्यक्ष कर्म है तथा 'बच्चा' अप्रत्यक्ष कर्म। यहाँ 'देना' क्रिया 'दो कर्मों' की अपेक्षा करने के कारण 'द्विकर्मक है। इस तरह ध्यान रखिए 'देना' लेना', 'बेचना', 'खरीदना' आदि 'द्विकर्मक क्रिया' हैं जो वाक्य को पूरा करने के लिए दो-दो कर्मों की अपेक्षा करती हैं। देखिए अन्य उदाहरण-


(i) मालिक ने नौकर को तनख्वाह दी।


( क्या दी ?


उत्तर - तनख्वाह (प्रत्यक्ष कर्म))


(किसे ? उत्तर - नौकर को (अप्रत्यक्ष कर्म))


(ii) मैंने अपनी किताबें प्रवीण को बेच दी।


( क्या बेच दी ? उत्तर किताबें (प्रत्यक्ष कर्म))


(किसे ?

;

उत्तर - प्रवीण को (अप्रत्यक्ष कर्म))


(2) व्युत्पन्न क्रियाएँ (Derived Verbs) :


इस वर्ग में वे सभी क्रियाएँ आती हैं जो मूल क्रियाओं से व्युत्पन्न (derive) की गई हैं। इस वर्ग की प्रमुख क्रियाएँ इस प्रकार हैं- संयुक्त क्रिया सामासिक क्रिया, मिश्र क्रिया, प्रेरणार्थक क्रिया तथा व्युत्पन्न अकर्मक क्रिया । इनके अतिरिक्त एक क्रिया और है जिसका हिन्दी में विकास संस्कृत के प्रभाव से हुआ है, इसका नाम है- 'नामिक क्रिया'।


1. संयुक्त क्रिया (Compound Verb) -


जैसा कि नाम से स्पष्ट है 'संयुक्त क्रिया की रचना दो मूल क्रियाओं (अकर्मक / सकर्मक) के संयोग से होती है, जैसे- 'आ जाना', 'कर लेना', 'सो जाना', 'देख लेना', 'भेज देना', 'उठ जाना', 'धो देना', 'बुला 'लेना', 'मार डालना' आदि।

;

संयुक्त क्रिया की पहली क्रिया ही क्रिया के मुख्य अर्थ को बताती है जबकि दूसरी क्रिया अपना अर्थ पूरी तरह से छोड़ देती है, जैसे 'आ जाना' क्रिया का मोटा-मोटा अर्थ 'आना' है, इसी तरह से 'कर लेना' का मोटा-मोटा अर्थ 'करना' है जिसका पता पहली क्रिया 'आ' तथा 'कर' से लग रहा है। दूसरी क्रियाएँ 'जाना' तथा 'लेना' अपना अर्थ पूरी तरह छोड़ चुकी हैं क्योंकि 'आ जाना' का अर्थ यह नहीं है कि कोई पहले आया और फिर चला गया। संयुक्त क्रिया की पहली क्रिया को 'प्रधान क्रिया' (Main Verb) कहा जाता है। संयुक्त क्रिया की दूसरी क्रिया अपना अर्थ तो छोड़ देती है पर पहली क्रिया के अर्थ में रंग भरने का काम करती है जिससे एक ही 'प्रधान क्रिया' से बनी संयुक्त क्रियाओं के अर्थ में सूक्ष्म अन्तर आ जाता है, जैसे-


(1) मेहमान आ गए।


(आना + जाना)


(ii) मेहमान आ टपके ।

;

(iii) मेहमान आ धमके।


(आना + टपकना)


(आना + धमकना)


(iv) मेरे घर मेहमान आ मरे ।


( आना + मरना )


वाक्य- (i) से वाक्य (iv) तक के सभी वाक्यों में 'संयुक्त क्रिया का प्रयोग हुआ है तथा सभी संयुक्त क्रियाओं की प्रधान क्रिया 'आना' है और सभी का मोटा-मोटा अर्थ 'आना' ही है। अंग्रेजी में इन सबका अनुवाद होगा - 'The guest came.' क्योंकि अंग्रेजी में 'संयुक्त क्रिया नहीं होती । पर हिन्दी भाषा-भाषी जानता है कि इन सभी संयुक्तक्रियाओं के अर्थ में थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। 'आ गए' में पहुँच जाने की निश्चितता का भाव है, 'आ टपके' में 'अचानक आ जाने का भाव है', 'आ धमके' में 'होस्ट' का मेहमानों के प्रति 'अनिच्छा का भाव है' तथा 'आ मरे' में होस्ट की अनिच्छा का क्लाइमेक्स पर होने का भाव है।

;

प्रश्न उठता है कि प्रधान 'क्रिया 'आना' तो सभी संयुक्त क्रियाओं में समान अर्थ दे रही है तब अर्थ के ये सूक्ष्म अन्तर कहाँ से आए ? वस्तुतः संयुक्त क्रिया की दूसरी क्रिया ही पहली क्रिया के अर्थ में रंग भरकर अर्थ के ये अन्तर ला रही है। 'रंग भरने के लिए' संस्कृत में एक शब्द हैं- 'रंजन करना'। चूँकि संयुक्त क्रिया की दूसरी क्रिया पहली 'प्रधान क्रिया' के अर्थ में 'रंजन करने' का कार्य करती है अतः इसे 'रंजक क्रिया' कहा जाता है। इस प्रकार संयुक्त क्रिया में दो अंश होते हैं- प्रधान क्रिया तथा रंजक क्रिया देखिए संयुक्त क्रिया के प्रयोग के अन्य उदाहरण-


(i) गाड़ी चल दी।


(i) (क) गाड़ी चल निकली।


(i) (ख) गाड़ी चल पड़ी।

;

(i) (ग) गाड़ी चल गई।


(ii) नौकर काम कर गया।


(ii) (क) नौकर ने काम कर दिया।


(ii) (ख) नौकर ने काम कर लिया।


(iii) वह हँस निकली।


(iii) (क) वह हँस पड़ी।


(iii) (ख) वह हँस दी।


2. सामासिक क्रिया (Contractional Verb) -


जैसा कि नाम से स्पष्ट है 'सामासिक क्रिया' की रचना भी दो मूल क्रियाओं के योग से होती है तथा दोनों क्रियाएँ समास (द्वन्द्व समास) के आधार पर मिलती हैं,

;

जैसे चलना-फिरना, आना-जाना, उठना-बैठना, देखना- भालना, लेना-देना, करना कराना, देखना-दिखाना, सोना-सुलाना आदि। संयुक्त क्रिया से भिन्न यहाँ दोनों क्रियाएँ अपना-अपना अर्थ बनाये रखती हैं, जैसे 'वह पढ़-लिख सकती है' वाक्य की सामासिक क्रिया का अर्थ है कि वह पढ़ भी सकती है और लिख भी सकती है। देखिए अन्य उदाहरण-


(1) अब वह उठ बैठ सकती है।


(ii) चल-फिर नहीं सकता।


(iii) खा-पी लिया, अब यहाँ से खिसको


(अर्थात् उठ भी सकती है तथा बैठ भी सकती है)।

;

( न चल सकता है और न फिर सकता है)


(खा भी लिया और पी भी लिया)


(iv) वह मेरे यहाँ नहीं आती-जाती । (न आती है और न जाती है)


3. मिश्र क्रिया (Complex Verb) -


'मिश्र क्रिया' की रचना मूल क्रिया में 'संज्ञा', 'सर्वनाम, विशेषण' या क्रियाविशेषण जोड़कर की जाती है । अर्थात् 'मिश्र क्रिया' का पहला अंश संज्ञा सर्वनाम, विशेषण या क्रियाविशेषण होता है तथा दूसरा अंश 'मूल 'क्रिया' (अकर्मक या सकर्मक), जैसे-


(i) संज्ञा + क्रिया (ii) सर्वनाम + क्रिया


= भूख लगना, प्यास लगना, नींद आना, स्मरण करना, रिश्वत लेना, दान देना = अपना लगना, पराया लगना


(iii) विशेषण + क्रिया

;

(iv) क्रियाविशेषण + क्रिया


= अच्छा लगना, बुरा लगना, प्यारा लगना, सुन्दर लगना / दिखाना, गर्म करना / लगना आदि ।


= भीतर करना, बाहर करना, अंदर करना आदि।


4. प्रेरणार्थक क्रिया (Causative Verb) -


प्रेरणार्थक क्रिया' वह क्रिया है जिसमें एक से अधिक 'कार्यकलाप (Actions) होते हैं। इसको समझने के लिए 'उड़ाना' क्रिया के निम्नलिखित दो प्रयोग देखिए-


(i) बच्चा पतंग उड़ाता है।


(ii) बच्चा चिड़िया उड़ाता है।


वाक्य- (i) की 'उड़ाना' क्रिया 'सकर्मक क्रिया' है, क्योंकि 'पतंग' उसका 'प्रत्यक्ष कर्म' है परन्तु वाक्य - (ii) में 'चिड़िया' कर्म नहीं है।

;

हम जानते हैं कि बच्चा पतंग को तो धागे में बाँधकर उड़ा रहा है पर दूसरे वाक्य का अर्थ है कि बच्चा कुछ ऐसा कर रहा है (शोर मचाना, पत्थर मारना आदि) जिससे चिड़िया स्वयं उड़ रही है। इसे दूसरे शब्दों में इस तरह कह सकते हैं कि बच्चा चिड़िया को उड़ने के लिए प्रेरित कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप चिड़िया स्वयं उड़ रही है।


वास्तव में वाक्य (ii) दो वाक्यों से मिलकर बना है- 'बच्चा चिड़िया को उड़ने के लिए प्रेरित कर रहा है' तथा 'चिड़िया उड़ रही है।


अतः प्रेरणार्थक क्रिया वह क्रिया होती है जिसमें एक से अधिक 'एक्शन' समाहित रहते हैं तथा प्रेरणार्थक क्रिया वाले वाक्यों में पहले कोई एक संज्ञा दूसरी संज्ञा को प्रेरित करती है तब दूसरी संज्ञा उस कार्य को स्वयं सम्पन्न करती है।

;

हिन्दी में दो तरह की प्रेरणार्थक क्रियाएँ मिलती हैं 'प्रथम प्रेरणार्थक' तथा 'द्वितीय प्रेरणार्थक' 'मूल क्रिया के मध्य में 'आ' प्रत्यय जोड़कर 'प्रथम प्रेरणार्थक' तथा 'वा' जोड़कर 'द्वितीय प्रेरणार्थक' क्रिया बनाई जाती हैं, जैसे- 'चलना' क्रिया से 'चलाना' प्रथम प्रेरणार्थक है तथा 'चलवाना' द्वितीय प्रेरणार्थक देखिए दोनों के अन्य उदाहरण -


प्रथम प्रेरणार्थक


द्वितीय प्रेरणार्थक


(1) माँ बच्चे को चलाती है।


(i) (क) माँ नौकर से बच्चे को चलवाती है।


(ii) (iii) मैंने मोहन को फिल्म दिखाई।

;

मीरा बच्चे को खाना खिलाती है।


(ii) (क) मीरा आया से बच्चे को खाना खिलवाती है। (iii) (क) मैंने रमेश से मोहन को फिल्म दिखलवाई।


5. व्युत्पन्न अकर्मक क्रिया (Derived Intransitive verb) -


जिस तरह अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं से प्रेरणार्थक क्रियाएँ व्युत्पन्न की जाती हैं उसी तरह सकर्मक क्रियाओं से 'व्युत्पन्न अकर्मक क्रियाएँ भी व्युत्पन्न की जाती हैं, जैसे चलाना=> चलना, उड़ाना उड़ना, काटना => काटना आदि। रूप रचना के स्तर पर व्युत्पन्न अकर्मक तथा अकर्मक क्रियाएँ समान होती हैं किन्तु प्रयोग के स्तर पर दोनों के प्रकार्य भिन्न हो जाते हैं। अकर्मक क्रिया वाले वाक्यों में जहाँ लौकिक कर्त्ता विद्यमान रहता है वहीं, व्युत्पन्न अकर्मक क्रिया वाले वाक्यों में लौकिक कर्ता का लोप कर दिया जाता है। दोनों के अन्तर को समझने के लिए निम्नलिखित वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिए-

;

अकर्मक क्रिया वाले वाक्य


व्युत्पन्न अकर्मक क्रिया वाले वाक्य


(i) लड़की चल रही है।


(i) (क) मशीन चल रही है।


(ii) चिड़िया उड़ रही है।


(ii) (क) पतंग उड़ रही है।


इन उदाहरणों में वाक्य - (i) तथा वाक्य (ii) में प्रयुक्त क्रियाएँ अकर्मक हैं किन्तु वाक्य- (i) (क) तथा वाक्य (ii) (क) की क्रियाएँ देखने में तो अकर्मक क्रियाओं के समान हैं पर ये अकर्मक नहीं है क्योंकि 'मशीन' और 'पतंग' इनके 'लौकिक कर्त्ता' नहीं हो सकते। हम जानते हैं कि मशीन स्वयं नहीं चल सकती और पतंग स्वयं नहीं उड़ सकती।

;

वस्तुतः 'मशीन' और 'पतंग' संज्ञाएँ 'चलाना' तथा 'उड़ाना' क्रिया की 'कर्म' हैं, जैसे-


(1) लड़की मशीन चला रही है।


(ii) लड़का पतंग उड़ा रहा है।


वस्तुतः वाक्य (i) (क) तथा (ii) (क) में लौकिक कर्त्ता का लोप कर दिया गया है तथा 'मशीन' और 'पतंग' व्याकरणिक कर्त्ता का प्रकार्य कर रहे हैं क्योंकि क्रिया उन्हीं के अनुसार बदल रही है। इन वाक्यों की 'चलना' तथा 'उड़ना' क्रियाएँ 'व्युत्पन्न अकर्मक' क्रिया के उदाहरण हैं। व्युत्पन्न अकर्मक क्रियाओं के अन्य उदाहरण देखिए-


1) हवा चल रही है।


(ii) बारिश हो रही है।

;

(iii) गिलास टूट गया। (iv) दरवाज़ा खुल गया ।


6. नामिक क्रिया-


हिन्दी में नामिक क्रिया का विकास संस्कृत के प्रभाव से हुआ है। संस्कृत के वैयाकरणों ने 'संज्ञा', 'सर्वनाम' तथा 'विशेषणों' तीनों को 'नाम' कहा था। आधुनिक भाषा विज्ञान भी इसी बात को मानता है कि भाषा के आन्तरिक धरातल पर संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण तीनों एक ही हैं। संस्कृत में 'नाम' अर्थात् संज्ञा, सर्वनाम विशेषण में प्रत्यय जोड़कर अनेक क्रिया शब्द बनाए जाते थे तथा ऐसी क्रियाओं को 'नामिक क्रिया' कहा जाता था। 'नाम' को ही इन क्रियाओं की 'धातु' माना जाता था (नाम धातु)। यह परम्परा हिन्दी में भी आ गई पर कम हो गई क्योंकि हिन्दी प्रत्यय प्रधान भाषा नहीं है। हिन्दी में कुछ गिनी-चुनी 'नामिक क्रियाएँ' ही मिलती हैं।

;

देखिए कुछ उदाहरण ललचाना, गपियाना, झुठलाना, शरमाना, टकराना (संज्ञा + प्रत्यय से), अपनाना (सर्वनाम - + प्रत्यय से) तथा गरमाना, लँगड़ाना, सठियाना (विशेषण + प्रत्यय से ) ।


3.3.05.4. अनुकरणात्मक क्रिया


हिन्दी में कुछ क्रियाएँ ऐसी धातुओं से बनती हैं जिनकी रचना अनुकरणात्मक शब्दों की भाँति अनुकरण के आधार पर होती है तथा ये द्वित्व रूप में प्रयुक्त होती हैं, जैसे सन सन सनसनाना, भन भन भनभनाना, - थर-थर => थरथराना, चीं-चीं => चिचियाना, खट-खट खटखटाना, हिन हिन हिनहिनाना, भिन-भिन=> भिनभिनाना, थप थप => थपथपाना, बड़-बड़ => बड़बड़ना, लप लप लपलपाना आदि देखिए इन क्रियाओं के कुछ प्रयोग - -


(i) चिड़ियाँ क्यों चिचिया रही हैं ?


(ii) युद्ध में घोड़े हिनहिना रहे थे।


(iii) खाने पर मखियाँ भिनभिना रही थीं।


(iv) वह हमेशा बड़बड़ाता रहता है।