लौकिक संस्कृत या संस्कृत - Main features of Vedic Sanskrit

लौकिक संस्कृत के अन्य नाम संस्कृत क्लैसिकल संस्कृत तथा देशभाषा भी है। वैदिक संस्कृत में भाषा के तीन स्वर मिलते हैं - उत्तरी, मध्यदेशीय तथा पूर्वी लौकिक संस्कृत का आधार उत्तरी रूप (बोलचाल को) ही माना जाता है। साहित्य में प्रयुक्त भाषा के रूप में इसका आरम्भ 8वीं सदी ई.पू. साहित्यिक या क्लैसिकल संस्कृत की आधारभाषा का बोलचाल में प्रयोग लगभग 5वीं सदी ई.पू. या कुछ क्षेत्रों में उसके बाद तक होता रहा, किन्तु तब तक उत्तरी भारत के आर्यभाषाभाषियों में कई भौगोलिक बोलियाँ जन्म ले चुकी थी, जो आगे चलकर विभिन्न प्राकृतों, अपभ्रंशों एवं आधुनिक आर्यभाषाओं के जन्म का कारण बनीं। पाणिनी ने 5वीं सदी ई.पू. के आस-पास ही इस भाषा को व्याकरणबद्ध किया।


बोलचाल की भाषा साहित्यिक भाषा के विरूद्ध परम्परागत कम और विकासोन्मुख अधिक होती है। संस्कृत के बोलचाल की भाषा के बहुत से प्रमाण पाणिनी के सूत्रों में हैं।


लौकिक संस्कृत का सबसे प्राचीन एव आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण 500 ई.पू. का है। महाभारत, पुराण, काव्य-नाटक आदि ग्रन्थ 500 ई.पू. से आज तक अविच्छिन्न रूप से अपना गौरव स्थापित किये हुए हैं। यास्क, कात्यायन, पतंजलि आदि के लेखों से सिद्ध है कि ईसा पूर्व तक संस्कृत लोक व्यवहार की भाषा थी।


संस्कृत साहित्य आर्य जाति का प्राण है। संस्कृत में ही समस्त प्राचीन ज्ञान, विज्ञान, कला,

पुराण, काव्य


नाटक आदि है। संस्कृत ने न केवल भरतीय भाषाओं को अनुप्राणित किया है, अपितु विश्व-भाषाओं, मुख्यतया


भारोपीय भाषाओं को भी प्रभावित किया है।


संस्कृत भाषा की ध्वनियाँ


मूलस्वर


अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लृ ए ओ = 11


ऐ (अड़), औ (अनु)


संयुक्त स्वर


व्यंजन


क् ख् ग् घ् ङ् (कण्ठ्य)


स्पर्श


च् छ् ज् झ (तालव्य)


ट् ठ् ड् ढ् ण् (मूर्धन्य )


त् थ् द् ध् न् (दन्त्य) प् फ् ब् भ् म् (ओष्ठ्य)


=25


अन्तस्थ य् ल्व्


अघोष संघर्षी


=4


= 3


घोष उष्म


श् ष् स्


=1


= 1


शुद्ध अनुनासिक अघोष उष्म (विसर्ग)


-


= 1


(अनुस्वार)


=2


कुल 48



वैदिक संस्कृत में 52 ध्वनियाँ थी जिनमें से संस्कृत में 48 ध्वनियाँ रह गई है। वैदिक संस्कृत की 4 ध्वनियाँ लुप्त हो गई ळ, कह, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय ।