मनोविश्लेषणवादी आलोचना की प्रमुख मान्यताएँ - Major Assumptions of Psychoanalytic Criticism
मनोवैज्ञानिक या मनोविश्लेषणवादी आलोचना में साहित्यिक रचना को प्राथमिक रूप से लेखक के व्यक्तित्व, उसकी मानसिक अवस्था, भावनाओं और कामनाओं की अभिव्यक्ति माना जाता है। आलोचकों का विश्वास है कि मनोविश्लेषण की अवधारणाओं के आधार पर हम रचना के सम्बन्ध में अपनी समझ बढ़ा सकते हैं। रचना के पात्रों के व्यवहार के आधार पर रचना के पात्रों की मानसिक संरचना के साथ-साथ लेखक की मानसिक संरचना को भी पहचाना जा सकता है। इस पद्धति में लेखक की मानसिक संरचना और उसकी विशेषताओं को साहित्यिक रचना से जोड़कर रचना का विवेचन किया जाता है। साहित्यिक कृति के विश्लेषण के लिए लेखक के व्यक्तित्व को सन्दर्भ के रूप में देखा जाता है।
लेखक के व्यक्तित्व का निर्धारण करने के लिए उसकी साहित्यिक रचनाओं से सन्दर्भ लिए जाते हैं। रचना के पाठ को भी लेखक की विशिष्ट वैयक्तिकता अथवा चेतना से साक्षात्कार का माध्यम माना जाता है। इस आलोचना पद्धति में किसी रचना को सही ढंग से समझने और उसका अर्थ ग्रहण करने के लिए उसके लेखक या उसके पात्रों के मनोविज्ञान का अन्वेषण किया जाता है। उदाहरणार्थ, मनोवैज्ञानिक आलोचना के अनुसार 'कफन' (प्रेमचंद) कहानी में घीसू और माधव शराब के नशे में अपनी उन दमित आकांक्षाओं को प्रकट करते हैं जिनकी पूर्ति अपनी सामाजिक प्रस्थिति के कारण वे उम्र भर नहीं कर पाए थे ।
साहित्य सिद्धान्त के रूप में मनोविश्लेषणवाद के अन्तर्गत साहित्यकार के अन्तर्मन के द्वन्द्व का अध्ययन किया जाता है। मनोविश्लेषण में समस्त कलाओं के मूल में दमित और अतृप्त कामनाएँ मानी जाती हैं। अवचेतन में स्थित ये अतृप्त कामनाएँ कला या साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं। इसलिए किसी भी कलाकृति का मूल्यांकन और विश्लेषण कलाकार के अन्तर्मन की दशाओं के सन्दर्भ में ही उचित है। कला मनुष्य के अवचेतन में स्थित कामनाओं की मुक्त अभिव्यक्ति का माध्यम प्रदान करती है, जबकि सामाजिक निषेध और नैतिक व्यवस्थाएँ उन्हें दबाती हैं। चेतन और अवचेतन मन में निरन्तर चलने वाले इस द्वन्द्व के अन्तर्गत अवचेतन की कामनाओं का चेतन मन द्वारा उदात्तीकरण होता है। उदात्तीकरण से कुण्ठाएँ टू हो जाती हैं और व्यक्ति निर्द्वन्द्व भाव से रचनात्मक व्यवहार में अनुरत हो जाता है।
उदात्तीकरण की इस प्रक्रिया में मानव जाति के सांस्कृतिक मूल्यों का सृजन होता हैं। अतः कला और साहित्य उदात्तीकृत मानवीय क्रियाकलाप हैं।
मनोविश्लेषण के अनुसार अवचेतन मन की दमित इच्छाएँ फैंटेसी या रम्यकल्पना के रूप में अभिव्यक्त होती हैं। कलाएँ कल्पना के आधार पर मनुष्य को यथार्थ जीवन के संकटों और कठिनाइयों से निजात दिलाने का उपक्रम हैं। फ्रायड ने मात्र कामशक्ति को ही नहीं, बल्कि 'लिबिडो' (कामशक्ति) सहित इदम् में निहित 'इरोस' और ‘थेनेटोस’ मूल-प्रवृत्तियों को जीवन के हर क्षेत्र की नियामक शक्तियाँ माना है। ये प्रवृत्तियाँ ही मनुष्य के रचनात्मक क्रियाकलापों तथा कला और साहित्य-सृजन का आधार होती हैं। फ्रायड ने कवियों और दार्शनिकों को अचेतन के अनुसंधाता माना है।
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