मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र - marxist aesthetics
मार्क्सवाद के अनुसार मनुष्य अन्य जीवों से श्रेष्ठ जीव है क्योंकि अन्य जीव अपनी आवश्यकताओं और भावों के अनुरूप ही उत्पादन करते हैं जबकि मनुष्य अन्य जीवों के भावों और आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन करने की क्षमता और इच्छा रखता है। मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियाँ उसके ज्ञान की संवाहक होती हैं और इस ज्ञान के समेकित आधारों पर हमारी चेतना का निर्माण होता है। मार्क्स के अनुसार मनुष्य की सारभूत शक्तियों के रूप में मानव को तृप्त करने में सक्षम पाँच ज्ञानेन्द्रियों सहित मानसिक और व्यावहारिक सभी ज्ञानेन्द्रियाँ या तो विकसित की जाती हैं अथवा उत्पन्न की जाती हैं।
मनुष्य के कलात्मक-सृजन की योग्यता मनुष्य समाज के दीर्घकालीन विकास के फलस्वरूप उपलब्ध हुई हैं और मनुष्य के परिश्रम की उपज हैं। एंगल्स ने अपनी रचना 'प्रकृति की द्वन्द्वात्मकता' में विचार प्रकट किया है कि "मनुष्य के हाथ ने वह उच्च कौशल हासिल कर लिया है, जिसके कारण राफ़ायल जैसी चित्रकारी, थोर्वाल्ट्सेन जैसी मूर्तिकारी और पागानीनी जैसा संगीत पैदा हो सके।" इस प्रकार मार्क्स और एंगल्स ने मनुष्य की सौन्दर्यानुभूति को मनुष्य का सामाजिक रूप से अर्जित गुण माना है, जन्मजात गुण नहीं।
मार्क्सवाद में सौन्दर्यात्मक क्रिया-कलाप और परिघटनाओं को समाजैतिहासिक प्रक्रियाओं के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। यह ऐसी व्यापक सभ्यतामूलक गतिविधि है जिसके द्वारा 'मनुष्य' (होमो सैपीयन्स) अपने विकास के साथ-साथ अपनी अन्तर्जात क्षमताओं को पहचानता है। कला कृतियाँ मनुष्य की अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ अन्तर्निर्भरता के आधार पर घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई होती हैं। यह अन्तर्निर्भरता एक ओर समाज की वर्तमान संरचना पर तथा दूसरी ओर वर्तमान और भविष्य पर पड़ने वाले भूतकालीन सौन्दर्य- रूपों के प्रभाव पर आधारित होती है। कलाओं के सौन्दर्यात्मक पहलुओं में परिवर्तन विचारधारा में परिवर्तन के कारण होता है।
विचारधाराओं का निर्धारण ऐतिहासिक रूप से वर्ग विभक्त समाजों के विकास और अन्तर्विरोधों के स्वरूप के आधार पर होता है। अतः मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र को मानव इतिहास के विकास के अन्तर्गत ही समझा जा सकता है।
कला और यथार्थ के सम्बन्ध में मार्क्सवाद की मुख्य मान्यता यह है कि कला के वास्तविक स्वरूप और उसकी भूमिका को समग्र सामाजिक संरचना और सामाजिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में ही पूरी तरह से विश्लेषित किया जा सकता है । कलात्मक सौन्दर्य के सृजन में मनुष्य के श्रम की ऐतिहासिक भूमिका है। मनुष्य की सृजन क्षमता और विश्व के सौन्दर्य को देखने-परखने की उसकी योग्यता मानव समाज के सुदीर्घ विकास का फल और मानक- श्रम की अनुपम उपलब्धि है।
मार्क्सवादी साहित्य-चिन्तन
मार्क्सवाद के प्रणेताओं मार्क्स और एंगल्स ने कला और साहित्य पर विशेष रूप से नहीं लिखा है। लेकिन उन्होंने मानव जीवन के लिए अनिवार्य प्रश्नों के उत्तर खोजने के क्रम में जो अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं, उनमें वह पर्याप्त सामग्री है जो एक सुगठित कला एवं साहित्य चिन्तन का आधार प्रस्तुत करती है। परवर्ती विचारकों ने इसी आधार पर मार्क्सवादी कला एवं साहित्य दृष्टि का विकास किया है। यद्यपि इनकी व्याख्याएँ समकालीन वैचारिक चिन्तन से प्रभावित हैं और इनमें मार्क्स-एंगल्स के मूल विचारों के विकास के साथ-साथ उनकी उपेक्षा भी दृष्टिगोचर होती है।
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