मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाएँ - Medieval Indian Aryan languages
भारत में आर्यभाषा के प्रसार का शीर्षकाल मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा का समय ही है। पाणिनि ने भाषा का संस्कार करके उसे बाँध दिया और इस प्रकार 'क्लासिकल संस्कृत' या लौकिक संस्कृत का एक रूप निश्चित हो गया, किन्तु लोकभाषा अबाधगति से विकसित हाती रही। इस विकास के फलस्वरूप भाषा का जो स्वरूप सामने आया, उसे 'प्राकृत' कहते हैं। मोटे रूप से इसका काल 500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक अर्थात् डेढ़ हजार वर्ष का माना जाता है। कुछ लोग इसका आरम्भ 600 ई.पू. से भी मानते हैं और अन्त 1100 या 1200 ई. में भोलानाथ तिवारी इस पूरे काल (500 ई.पू. से 1000ई. पू. तक) की भाषा को प्राकृत कहते हैं,
किन्तु इस पूरे काल को प्रथम प्राकृत काल, द्वितीय प्राकृत काल और तृतीय प्राकृत काल के रूप में तीन कालों में बाँटा जा - सकता है। इधर, इसी बात का पृष्ठ पोषण करते हुए डॉ. उदयनारायण तिवारी लिखते हैं कि "व्याकरण के नियमों के जकड़ जाने पर संस्कृत का विकास रुक गया, परन्तु बोलचाल की भाषा निरन्तर विकसित होती जा रही थी, समस्त उत्तरापथ आर्यों के प्रसार के साथ प्राचीन आर्यभाषा के रूप में परिवर्तन विवर्तन होता जा रहा था तथा भाषा में कालगत एवं स्थानगत भिन्नताएँ बढ़ती जा रही थी और ईसा पूर्व छठीं शताब्दी तक प्राचीन आर्यभाषा विकास के मध्यस्तर तक पहुँच गई।"
मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं का नामकरण तथा विभाजन
डॉ. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं का नामकरण तथा विभाजन इस प्रकार
किया है -
(1) आदिरूप 700 ई.पू.
(ii) संक्रमणकालीन रूप - 000
(iii) द्वितीय रूप 300 ई.
(iv) परवर्ती रूप 800
डॉ० उदयनारायण तिवारी ने पूरे प्राकृतकाल को निम्नलिखित तीन टुकड़ों में बाँटा है-
(1) प्रथम अवस्था प्राचीन प्राकृत
(ii) द्वितीय अवस्था
नवीन प्राकृत
(iii) तृतीय अवस्था अपभ्रंश
डॉ. भोलानाथ तिवारी इस काल को निम्नलिखित रूप में बाँटते हैं-
(i) प्रथमकाल (आरम्भ से ईसवी सन् के आरम्भ तक)- पालि और शिलालेखी प्राकृत
(ii) दूसरा काल ( ईसवी सन् से लगभग 500 ई. तक) - प्राकृत (इसमें कई प्रकार के प्राकृत हैं)
(iii) तीसरा काल (500 ई. से 1000 ई. तक )
-
अपभ्रंश
किन्तु, डॉ. कैलाशनाथ पाण्डेय के अनुसार उक्त सम्पूर्ण प्राकृत काल का नामकरण तक बँटवारा इस
प्रकार हैं-
(1) आदिकाल (200 ई.पू. 200 ई. तक) पालि युग
-
(ii) मध्यकाल (200 ई.पू. 600 ई. तक) - प्राकृत युग तथा
(iii) उत्तरकाल (600 ई. से 1000 ई. तक) - अपभ्रंश युग
समग्रतः मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है- -
(i) प्राचीन प्राकृत या पालि
500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक (ii) मध्यकालीन प्राकृत
1000 ई.पू. से 100 ई.पू. तक
500 ई.पू. से 1000 ई.पू. त
पाणिनी ने भाषा का संस्कार करके उसे बाँध दिया और क्लासिकल संस्कृत या लौकिक संस्कृत का रूप निश्ति हो गया, किन्तु लोकभाषा अबाध गति से विकसित होती रही। इस विकास के फलस्वरूप भाषा का जो स्वरूप सामने आया उसे 'प्राकृत' कहते हैं। मोटे रूप से इसका काल 500 ई.पू. से 1000 ई. तक अर्थात् डेढ़ हजार वर्षों का माना जाता है। 'प्राकृत' के हेमचन्द्र मार्कण्डेय वासुदेव आदि व्याकरणों ने 'प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भव प्राकृत मुच्यते' आदि रूप में प्राकृत को संस्कृत से निकली माना है, किन्तु ऐसा असम्भव है। मूलतः संस्कृत के काल में जो बोलचाल की भाषा भी वही विकसित होती रही और उसी का विकसित रूप प्राकृत हुआ।
पालि
मध्यकालीन आर्यभाषा के प्रथम युग की महत्त्वपूर्ण भाषा 'पालि' है। इसे 'देशभाषा' भी कहा गया है। इसका काल कुछ लोग 5वीं या 6वीं सदी ई.पू. से पहली ईसवी तक और कुछ लोग दूसरी सदी ई.पू. तक मानते हैं।
पालि: नामकरण
'पालि' शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में अनेक मत प्रस्तुत किये गए हैं। प्रमुख मत इस प्रकार हैं-
(i) आचार्य बुद्धघोष (चतुर्थ शती ई.) और आचार्य धम्मपाल (6वीं शतीई.) ने 'पालि' शब्द का प्रयोग बुद्धवचन या मूल त्रिपिटक के लिये किया है। उससे यह 'पालि' भाषा के लिए आया। (ii) आचार्य विघुशेखर भट्टाचार्य ने 'पक्ति' से पालि की उत्पत्ति इस प्रकार बतायी है- पंक्ति <पंतिपत्ति <पल्लि< पालि ।
(iii) भिक्षु सिद्धार्थ ने 'पाठ' से पालि की उत्पत्ति मानी है।
पाठ<पाळ <पाळि <पालि ।
(iv) भिक्षु जगदीश कश्यप ने परिमाप (बुद्धोपदेश) शब्द से पालि की उत्पत्ति मानी है ।
परिमाम पलिमाम > पालिमाम > पालि ।
(v) डॉ. मैक्स वेलेसन (जर्मन विद्वान) ने पाटलि (पाटलिपुत्र) से पालि की उत्पत्ति मानी है। पाटलि> पाडलि> पालि ।
(vi) पल्लि (गाँव) शब्द से पालि ।
पाल्लि > पालि ।
(vii) प्राकृत शब्द से पालि ।
प्राकृत > पाकट पाउड पाअल पालि ।
(viii) अभिधान पादीपिक (पालिभाषा कोशग्रन्थ) ने 'पा' धातु से 'पालि' शब्द माना है।
पा-पालेति रक्खतीति पालि । अर्थात् जो रक्षा करती है या पालन करती है। (ix) अमरकोश के टीकाकार भानुजी दीक्षित ने 'पाल रक्षणे' से पालि शब्द माना है। पाल् + इ = पालि ।
उक्त मतों की समीक्षा से ज्ञात होता है कि इनमें से कुछ मत केवल बौद्धिक आयाम है। जैसे पंक्ति, पाठ,
प्राकृत, पाटलि आदि।
आचार्य बुद्धघोष और आचार्य धम्मपाल के उल्लेखों से सिद्ध है कि बुद्धवचन या बुद्धोपदेश के लिये पालि शब्द चतुर्थ शती ई. में प्रचलित था। 'पाल्लि' शब्द से 'पालि' सरलता से बन सकता है। परन्तु इसका पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता है।
भिक्षु जगदीश कश्यप का मत अधिक लोकप्रिय है। परिमाय (सं. पर्याय) का बुद्धोपदेश अर्थ में भत्रु शिलालेख में प्रयोग है- धम्मपलियायाति ।
परियाय > पलियाय पालि शब्द बुद्धवचन या मूल त्रिपिटक के लिये प्रयुक्त होने लगा।
पालि की ध्वनियाँ
स्वर
व्यंजन
अ आ इ ई उ ऊ ह्रस्व ए ऐ हस्व ओ औ
क ख ग घ ङ
कण्ठ्य
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ठ ण ळ ठह
तालव्य
तथदधन
य फ ब भ म
दन्त्य
ओष्ठय
यरल व
अन्तस्थ
ऊष्म
स
प्राणध्वनि
अनुस्वार
(इसे पालि में निम्गहीन कहते हैं)
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