आधुनिक भारतीय आर्यभाषा: परिचय - Modern Indian Aryan Language: Introduction
भारतीय आर्यभाषाओं को 'काल' की दृष्टि से तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
(i) प्राचीन भारतीय आर्यभाषा
1500 ई.पू. से 500 ई.पू.)
(ii) मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा: (iii) आधुनिक भारतीय आर्यभाषा
500 ई.पू. से 1000 ई. तक
1000 ई. से आज तक)
वर्तमान भाषाएँ ही आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ हैं। इनका विकास मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं - पालि,
प्राकृत, अपभ्रंश से हुआ है। भारतीय आर्यभाषा क्षेत्र में भाषा परिवर्तन के क्रम में अन्तिम नाम 'अपभ्रंश' का आता है। काल की दृष्टि से एक बात महत्त्वपूर्ण है कि इतिहास में ऐसा कोई बिन्दु विशेष नहीं है, जिसे चिह्नित करते हुए कहा जाए कि यहीं से आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का जन्म हुआ। फिर भी 1000 ई. के आस-पास से इनका उदय माना जाता है। फिर भी देखा जाए तो आचार्य हेमचन्द्र ने 12वीं शताब्दी में अपभ्रंश के व्याकरण की रचना की थी जिससे इस बात का अनुमान किया जा सकता है कि उस समय भी अपभ्रंश में व्यवहार हो रहा था।
अतः इसका काल 10वीं से 16वीं शताब्दी के बीच माना जा सकता है। 16वीं शताब्दी और उसके बाद की रचनाओं को आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की रचनाएँ माना जाता है। क्षेत्र की दृष्टि से आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विस्तार राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचलप्रदेश, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और सम्पूर्ण उत्तर भारत में है। प्रमुख आर्यभाषाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
(1) पश्चिमी पंजाबी (लदा)
यह भाषा पश्चिमी पंजाब में बोली जाती है, जो अभी पाकिस्तान में है। यह पंजाबी के समान ही है। इसे जटकी, उच्चा हिन्दकी आदि नाम भी दिए गए हैं।
वर्तमान में यह मुख्य रूप से फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। इसकी मूल लिपि का नाम 'लंडा' (Landa) है।
(2) सिन्धी
सिन्धी को सिन्ध प्रान्त की भाषा है। यह भी अभी पाकिस्तान में ही है। इसे ब्राचड़ और अपभ्रंश से उत्पन्न माना जाता है। इसकी लिपि फ़ारसी लिपि का ही कुछ परिवर्तित रूप है। इसमें फ़ारसी शब्द भी बहुतायत देखे जा सकते हैं।
(3) मराठी
मराठी मूल रूप से महाराष्ट्र की भाषा है। इसकी कई बोलियाँ हैं। पूना क्षेत्र के आस-पास बोली जाने वाली मराठी को ही मानक मराठी माना गया है,
जो महाराष्ट्र राज्य के राजकाज की भाषा है। मराठी को देवनागरी लिपि में ही लिखा जाता है।
(4) उड़िया
यह उड़ीसा राज्य की भाषा है। इसमें और बांग्ला भाषा में पर्याप्त समानता देखी जा सकती है। आरम्भ में इसे बांग्ला भाषा का ही एक रूप माना जाता था किन्तु अब स्पष्ट हो चुका है कि उड़िया स्वतन्त्र रूप से एक भाषा है। इसमें मराठी, तेलुगु, फ़ारसी और अंग्रेजी भाषाओं के शब्द भी पर्याप्त मात्रा में देखे जा सकते हैं। इसकी लिपि प्राचीन देवनागरी से ही विकसित हुई है।
(5) बांग्ला
बांग्ला भाषा के प्रयोग का क्षेत्र का बंगाल है। इसे 'बंगला' / 'बंगला' |
'बांग्ला' भी कहा जाता है। इसके दो मुख्य रूप हैं - पूर्वी और पश्चिमी पूर्वी का केन्द्र 'ढाका' जो अब बांग्लादेश की राजधानी है और पश्चिमी 'का 'कोलकाता' (या कलकत्ता) जो भारत के पश्चिम बंगाल राज्य की राजधानी है। इसकी अपनी लिपि है जिसे प्राचीन देवनागरी से ही विकसित माना जाता है।
(6) बिहारी
भोजपुरी, मैथिली और मगही को जार्ज ग्रियर्सन द्वारा 'बिहारी' नाम दिया गया था। इनकी लिपि देवनागरी ही है। बिहारी के अन्तर्गत आने वाली तीनों बोलियों / भाषाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
(क) भोजपुरी इसका केन्द्र प्राचीन शाहाबाद जिले का भोजपुर गाँव है जो अब बक्सर जिले में आता है।
इसका विस्तार बहुत अधिक है। इसके केन्द्रीय क्षेत्रों में उत्तरप्रदेश के बनारस, मिर्जापुर, आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, देवरिया, गोरखपुर और बस्ती तथा बिहार के बक्सर, आरा, राँची, सारन, चंपारन आदि जिले आते हैं।
(ख) मैथिली यह मुख्य रूप से बिहार में ही बोली जाती है। इसके केन्द्रीय जिलों के अन्तर्गत दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया आदि जिलों के साथ-साथ मुजफ्फरपुर का पूर्वी भाग भी आता है। इसके एक रूप का नाम 'अंगिका' है जो मुंगेर और भागलपुर जिलों में प्रचलित है ।
(ग) मगही - मगही बिहार की एक प्रमुख भाषा है। इसका प्रयोग पटना और गया के साथ-साथ हजारीबाग के भी कुछ जिलों में किया जाता है।
(7) असमिया
यह असम (असमिया प्रदेश) की भाषा है। इसमें और बांग्ला में पर्याप्त समानता देखी जा सकती है। इसकी लिपि भी बांग्ला लिपि का संशोधित परिवर्तित रूप है।
(8) पूर्वी हिन्दी
इसके अन्तर्गत तीन भाषाएँ / बोलियाँ आती हैं अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। इनका संक्षिप्त परिचय
इस प्रकार है-
(क) अवधी - इसके प्रयोग के क्षेत्र में लखनऊ, फैजाबाद, सीतापुर, उन्नाव, रायबरेली, गोंडा, खीरी, सुल्तानपुर, बहराइच, प्रतापगढ़, बाराबंकी आदि जिले आते हैं। इनके अलावा इलाहाबाद, मिर्जापुर, फतेहपुर, कानपुर के कुछ क्षेत्र भी आते हैं। इस भाषा में रचित ग्रन्थों में 'रामचरितमानस' एक कालजयी रचना है।
(ख) बघेली यह अवधी भाषा के दक्षिण भागों रीवा, जबलपुर, दमोह, मांडला तथा बालाघाट आदि में बोली जाती है। कुछ लोगों ने इसे अवधी का ही एक रूप माना है।
(ग) छत्तीसगढ़ी यह वर्तमान 'छत्तीसगढ़' राज्य की भाषा है। इसके प्रयोग के क्षेत्रों में रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, नंदगाँव, खैरगढ़, सरगुजा आदि जिले प्रमुखहैं।
(१) पश्चिमी हिन्दी
पश्चिमी हिन्दी के अन्तर्गत पाँच भाषाएँ / बोलियाँ आती हैं-
(क) ब्रजभाषा - इसका क्षेत्र मथुरा, अलीगढ़, आगरा आदि जिलों में है। हिन्दी साहित्य के मध्यकालीन इतिहास में ब्रजभाषा की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
(ख) खड़ीबोली- इसके मुख्य क्षेत्रों में बिजनौर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून जिले आते हैं। खड़ीबोली ही आज की 'हिन्दी' है।
आधुनिककाल और स्वतन्त्रता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद यह भाषा भारत की सर्वाधिक व्यापक भाषा और भारत की राजभाषा बन चुकी है। इसके दो रूप हैं - हिन्दी और उर्दू दोनों में शब्दावली (संस्कृतनिष्ठ या अरबी / फ़ारसी केन्द्रित ) और लिपि (देवनागरी या फ़ारसी) का अन्तर है।
(ग) बाँगरू - यह दिल्ली, रोहतक, करनाल, हिसार, पटियाला और नाभा जिलों में बोली जाती है। इसे हरियाणवी भी कहते हैं। यह एक प्रकार की खड़ीबोली ही है। राजस्थानी तथा पंजाबी का इस पर प्रभाव देखा जा सकता है।
(घ) कन्नौजी इस भाषा के प्रयोग का क्षेत्र अवधी और ब्रजभाषा के बीच में है। इसके बोले जाने वाले क्षेत्रों में मुख्य तो फर्रुखाबाद जिला है, किन्तु इसके अलावा पीलीभीत शाहजहाँपुर, इटावा और कानपुर जिलों में भी इसका प्रयोग देखा जा सकता है। कुछ विद्वानों ने कन्नौजी को ब्रजभाषा की बोली ही माना है।
(ङ) बुंदेली इस भाषा के प्रयोग के मुख्य क्षेत्रों में झाँसी, हमीरपुर, जालौन, ग्वालियर, भोपाल, सागर, ओरक्षा और नरसिंहपुर जिले आते हैं। इनके अलावा इनके आस-पास के कुछ जिलों, जैसे पन्ना, दतिया, दामोह आदि में भी इसका प्रसार देखा जा सकता है। इसमें भी ब्रजभाषा से पर्याप्त समानता देखी जा सकती है।
(10) पंजाबी
पंजाबी पंजाब की भाषा है। वर्तमान में इसका कुछ क्षेत्र पाकिस्तान में है। इस भाषा पर 'दरद' भाषा का कुछ प्रभाव देखा जा सकता है। इसकी लिपि गुरुमुखी है।
(11) गुजराती
गुजरात राज्य की भाषा का नाम 'गुजराती' है। इस भाषा की पश्चिमी हिन्दी और राजस्थानी से समानता देखी जा सकती है। इसकी लिपि देवनागरी का जी कुछ परिवर्तित रूप है।
(12) भीली
इस भाषा का प्रयोग गुजरात और मध्यप्रदेश की सीमा पर देखा जा सकता है । इस पर गुजराती और राजस्थानी का पर्याप्त प्रभाव दिखाई पड़ता है।
(13)
एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम, MAHD 010
खानदेशी
इस भाषा का प्रयोग महाराष्ट्र के उत्तरी क्षेत्र में देखा जा सकता है। इसका क्षेत्र भीली और मराठी के बीच का है। इसकी एक प्रमुख बोली 'अहिरानी' है।
(14) राजस्थानी
राजस्थान की भाषा का नाम राजस्थानी है। इसकी चार बोलियाँ प्राप्त होती हैं मेवाती, मारवाड़ी, मालवी और जयपुरी। इनमें मेवाती का प्रयोग उत्तरी राजस्थान में, मारवाड़ी का प्रयोग पश्चिमी राजस्थान में, मालवी का प्रयोग मालवा क्षेत्र (राजस्थान का दक्षिण पूर्व भाग) और जयपुरी का प्रयोग राजस्थान के पूर्वी भाग में किया जाता है।
(15)
पहाड़ी
इस भाषा के भी तीन रूप प्राप्त होते हैं पूर्वी पहाड़ी या नेपाली, मध्य पहाड़ी, पश्चिमी पहाड़ी । पूर्वी पहाड़ी या नेपाली का प्रयोग नेपाल में किया जाता है। इसे गोरखाली या खसगुड़ा भी कहा गया है। मध्य पहाड़ी की दो शाखाएँ हैं - कुमायूँनी और गढ़वाली । कुमायूँनी नैनीताल और अल्मोड़ा में प्रयोग की जाती हैं जबकि गढ़वाली गढ़वाल और मसूरी में प्रयोग की जाती है। पश्चिमी पहाड़ी का क्षेत्र शिमला के निकटवर्ती भाग हैं।
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