आधुनिक भारतीय आर्यभाषा : विशेषताएँ - Modern Indian Aryan Language: Characteristics

आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास 'अपभ्रंश से हुआ है। अपभ्रंश को कुछ विद्वानों द्वारा तृतीय प्राकृत भी कहा गया है। इस काल की प्रमुख भाषाएँ पैशाची, शौरसेनी, महाराष्ट्री और मागधी रही हैं। भाषा निरन्तर परिवर्तनशील रही है। अतः इन भाषाओं में हुए कुछ व्यापक परिवर्तनों ने आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं को जन्म दिया। इस प्रकार विकसित नयी भाषाओं की कुछ प्रमुख विशेषताओं को निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं -


(1) भारतीय आर्यभाषाएँ योगात्मकता से अयोगात्मकता की ओर उन्मुख रही हैं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ बहुत अधिक अयोगात्मक हो गई हैं। अर्थात् इनमें प्रकृति और प्रत्यय का बहुत अधिक संयोग न होकर अपेक्षाकृत अलग-अलग प्रयोग होने लगा। विभक्तियों की जगह हिन्दी में परसर्गों का प्रयोग इसका अच्छा उदाहरण है।


(2) आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के विकास में ध्वन्यात्मक परिवर्तन भी पर्याप्त हुआ है। उदाहरण के लिए स्वरों के मात्रा काल में परिवर्तन हुए हैं। पंजाबी में शब्दों के आरम्भ में 'अ' का प्रयोग बढ़ा है। 'ऐ' तथा 'औ' स्वरों का प्रयोग अवहट्ट से आरम्भ हुआ है जो पहले प्राकृत तथा अपभ्रंश में नहीं थे।


(3) इसी प्रकार कुछ ध्वनियों का उच्चारण लुप्त भी हो गया है। इस दृष्टि से 'ष' उल्लेख्य है। अब प्रायः इसका वास्तविक उच्चारण नहीं किया जाता, बल्कि 'श' या 'स' के समतुल्य उच्चारण होता है। 'क्ष' का उच्चारण भी परिवर्तित होकर 'क्छ' हो गया है।



(4) कुछ ध्वनियों का उच्चारण विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न हो गया है, जैसे 'ऋ' का उच्चारण हिन्दी


में 'रि' तथा मराठी में 'रु' होता है। इसी प्रकार 'ज्ञ' का उच्चारण 'ग्य' तथा 'हाँ' के रूप में होता है, जबकि इसका उच्चारण 'ज्य' है जो बहुत कम ही जगहों पर उच्चरित किया जाता है।


(5) क्र, ख, ग, ज़ और फ़ अरबी / फ़ारसी ध्वनियों का भी समावेश हो गया है। इसी प्रकार आधुनिककाल में अंग्रेजी के प्रभाव अंग्रेजी स्वर 'ऑ' का प्रचलन भी हो गया है। शिक्षित लोगों द्वारा इन ध्वनियों का प्रयोग सम्बन्धित आगत शब्दों में किया जाता है।


(6) अधिकांश आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में दो ही लिंग हैं। केवल मराठी और गुजराती में तीन लिंग हैं। वचन की संख्या भी सभी वर्तमान आर्यभाषाओं में दो ही है।


(7) शब्दों की आन्तरिक संरचना में परिवर्तन की दृष्टि से देखा जाए तो द्वित्व व्यंजन (एक साथ एक ही व्यंजन का दो बार प्रयोग) होने पर उनमें से एक का लोप और पूर्व के व्यंजन पर क्षतिपूर्ति हेतु दीर्घ स्वर का प्रयोग प्राप्त होता है, जैसे-


कर्म



कम्म


निद्रा →


णिद्दा


नींद


अद्य


अज्ज →


आज


(8) वाक्य स्तर पर बलात्मक स्वाराघात में भी पहले की तुलना में कमी आई है। अतः आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास में ध्वनि, शब्द और वाक्य पर प्रयोग और व्यवहार में अनेक परिवर्तन हुए हैं। भारतीय आर्यभाषाओं का क्षेत्र विस्तार बहुत अधिक है। अलग-अलग भाषाओं के प्रयोग के समाज और समुदाय भी भिन्न रहे हैं। इस कारण ये परिवर्तन भी सभी क्षेत्रों में समान रूप से दिखाई नहीं देते। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम गति से परिवर्तन हुआ है तो पूर्वी भागों में परिवर्तन की गति अधिक है। इसी प्रकार मध्य क्षेत्रों में आधुनिक और प्राचीन दोनों रूप प्रयोग में बने रहे।