सौन्दर्यशास्त्र का स्वरूप और क्षेत्र - nature and scope of aesthetics

 सौन्दर्यशास्त्र का स्वरूप और क्षेत्र - nature and scope of aesthetics


सौन्दर्य को काव्य का अनिवार्य तत्त्व माना जाता है। उसे मानवीय चेतना के विस्तार से जोड़ते हुए संस्कृति को सौन्दर्यबोध के विकसित होने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। डॉ० रामविलास शर्मा के अनुसार प्रकृति, मानव जीवन तथा ललित कलाओं के आनन्ददायक गुण का नाम सौन्दर्य है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में सुन्दर वस्तु से अलग सौन्दर्य नहीं होता। एक शास्त्र के रूप में सौन्दर्यशास्त्र शब्द ज्ञान की उस शाखा के लिए प्रयुक्त होता है जो ऐन्द्रियबोध से प्राप्त सौन्दर्य-भावना के मनोमय आनन्द का विश्लेषण करती है।

इस अर्थ में 'ऐस्थेटिक्स' के पर्याय के रूप में 'सौन्दर्यशास्त्र' का प्रयोग प्रचलित है। कुछ विद्वान इसके स्थान पर 'कलाविज्ञान', कलाशास्त्र' और 'सौन्दर्यबोध शास्त्र' आदि नाम भी प्रस्तावित करते हैं, लेकिन 'सौन्दर्यशास्त्र' एक सर्वमान्य अभिधान है।


बाउमगार्तेन से लेकर क्रोचे तक सौन्दर्यशास्त्र को अलग-अलग अर्थों में परिभाषित किया गाता है। इमैनुएल काण्ट ने सौन्दर्यशास्त्र का सम्बन्ध अभिरुचि - विषयक चिन्तन अथवा निर्णय के साथ माना है।

इसी तरह कभी 'आस्वादन का शास्त्र' और कभी 'सुन्दर का विज्ञान' बता कर भी इसे परिभाषित करने के प्रयास हुए हैं। इन सबके परिणामस्वरूप सौन्दर्यशास्त्र का चिन्तन जटिल हो गया है। कुछ विद्वान आज भी इसे दर्शनशास्त्र की एक शाखा मानते हैं, तो कुछ इसे मनोविज्ञान की शाखा के रूप में देखते हैं। कई इसका सम्बन्ध तत्त्वदर्शन से जोड़ते हैं तो कई इसे काव्यशास्त्र से सम्बद्ध मानते हैं। इन सभी मतान्तरों के बीच सूजन के लैंगर ने इसके स्वरूप और क्षेत्र पर अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक और मौलिक ढंग से विचार किया है।

लैंगर की दृष्टि में सौन्दर्यशास्त्र न आस्वादन का विज्ञान है, न सौन्दर्य का दर्शन। न यह अभिव्यक्ति या अभिव्यंजना का विज्ञान है और न ही ललितकलाओं का दर्शन । उसके अनुसार सौन्दर्यशास्त्र ललितकलाओं के दार्शनिक विकल्पों और समस्याओं का सैद्धान्तिक निरूपण है। कला जगत् की ये दार्शनिक समस्याएँ प्रायः आस्वादन, सौन्दर्य, संवेग, पुनः प्रत्यक्ष आदि से सम्बन्ध हैं। लैंगर ने सौन्दर्यशास्त्र के स्वरूप की चर्चा करते हुए यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि इसका सम्बन्ध अभिव्यक्ति ( एक्स्प्रेशन) से है अथवा प्रभाव (इम्प्रेशन ) से ? स्वयं इसका उत्तर देते हुए उसने कहा कि कलाकार या कला के रचनात्मक पक्ष की दृष्टि से कला का अध्ययन उसकी अभिव्यक्ति का अध्ययन है,

जबकि पाठक, दर्शक या सहृदय अर्थात् भावन की दृष्टि से कला का अध्ययन उसके प्रभाव का अध्ययन है। लैंगर ने कला के भावन पक्ष को महत्त्व देते हुए कला के प्रभाव-पक्ष के विवेचन-विश्लेषण को ही सौन्दर्यशास्त्र का विषय माना है। निष्कर्ष रूप में उसने प्रभाव पक्ष को अधिक महत्त्व दिया और इसी प्रभाव पक्ष के विश्लेषण-विवेचन को सौन्दर्यशास्त्र का प्रमुख क्षेत्र घोषित किया । बाउमगार्तेन ने सौन्दर्यशास्त्र को संवेदनशील ऐन्द्रिय बोध के रूप में परिभाषित किया है। जॉर्ज सांतायना इसका सम्बन्ध मूल्यबोध से मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि "काव्यशास्त्रीय आलोचना में निर्णय की प्रमुखता रहती है जबकि सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन में अवबोधन या प्रत्यक्षीकरण को प्रमुखता दी जाती है।" ('The Sense of Beauty)।


सामान्यतः सौन्दर्यशास्त्र की प्रकृति सैद्धान्तिक होती है। परन्तु विज्ञान की तरह इसके सिद्धान्त पूर्णतः वस्तुनिष्ठ नहीं होते हैं। इसके नियम कलाकृति के आस्वाद से सामने आते हैं। समीक्षक मुख्य रूप से कलाकृति में कला-विशेष से कला - सामान्य की अवधारणाओं की ओर अग्रसर होता है। वह सौन्दर्य का अध्ययन कला-कृति के भीतर से करता है, बाहर से नहीं। उसके बाद अपनी अवधारणाएँ विकसित करता है। इसी सन्दर्भ में वह कला की सृजन प्रक्रिया पर भी विचार करता है। इस प्रकार सौन्दर्यशास्त्र के सिद्धान्त आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ दोनों रूपों में हमारे सामने आते हैं। ये सिद्धान्त सहज विकासशील होते हैं।