सौन्दर्यशास्त्र का उद्भव और विकास - Origin and development of aesthetics
पाश्चात्य चिन्तन में एक दार्शनिक अनुशासन के रूप में सौन्दर्यशास्त्र की अवधारणा का विकास 18वीं शताब्दी में हुआ जब कला कृतियों का हस्त शिल्प से अलग अध्ययन करने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। हिन्दी में सौन्दर्यशास्त्रीय आलोचना अंग्रेज़ी के 'ऐस्थेटिक्स' (Aesthetics) के सिद्धान्तों के आधार पर विकसित हुई है। दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में 'ऐस्थेटिक्स' पाश्चात्य चिन्तन की एक पुरानी शाखा है। इसके अन्तर्गत सौन्दर्य के सर्जन तथा उसके कलात्मक रूप और आस्वाद का अध्ययन किया जाता है। 'ऐस्थेटिक्स' शब्द मूल रूप से ग्रीक भाषा का शब्द ( Aisthetikos) है,
जो कालान्तर में 'ऐस्थेसिस' बना, जिसका अर्थ होता है ऐन्द्रिय सुख की चेतना आगे चलकर यही 'ऐस्थेसिस' शब्द 'ऐस्थेटिक' बन गया। बहुत लम्बे समय तक पाश्चात्य चिन्तन में 'ऐस्थेटिक' शब्द ही प्रचलित रहा। सन् 1735 में जर्मन दार्शनिक लेक्जांदर बाउमगार्तेन (1714-1762) ने 'ऐस्थेटिक' शब्द का आधुनिक अर्थ में प्रयोग किया और उसे लोकप्रिय बनाया। आगे चलकर 'ऐस्थेटिक' शब्द कुछ बदलकर 'ऐस्थेटिक्स' हो गया, जो आज तक चल रहा है। बाउमगार्तेन को सौन्दर्यशास्त्र का जनक माना जाता है। अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'एस्थेटिका' ( 1750 ) में उसने सौन्दर्यशास्त्र के सिद्धान्त प्रस्तुत किए और इसे संवेदनशील पेन्द्रियबोध के शास्त्र के रूप में स्थापित किया। कई विद्वान आज भी इस शास्त्र को ऐन्द्रिय संवेदना का शास्त्र मानते हैं।
डेविड हम ने 'ऑफ द स्टैंडर्ड ऑफ टेस्ट' लिखकर सौन्दर्यशास्त्र सम्बन्धी विवेचना को एक नया मोड़ दिया। लेकिन आधुनिक यूरोपीय सौन्दर्य-विमर्श की वास्तविक शुरूआत इमैनुएल कांट की रचना 'क्रिटीक ऑफ 'जजमेंट' ( 1790) के प्रकाशन के साथ हुई। कांट ने एक ओर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यांकन की कसौटियों को सार्वजनिक बनाने पर जोर दिया और दूसरी ओर किसी भी प्रकार के सार्वभौम सौन्दर्यशास्त्र की सम्भावना से इन्कार किया । इस विरोधाभास के बावजूद कांट का ऐतिहासिक योगदान यह है कि उसने कला और सौन्दर्य की विवेचना के लिए इन्द्रियबोध और तर्कबुद्धि, सारवस्तु और रूप अनुभूति और अभिव्यक्ति, स्वतन्त्रता और आवश्यकता जैसे सौन्दर्य-विवेचन के अनिवार्य द्विविभाजनों को स्थापित किया ।
उसका दूसरा महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि उसने ऐन्द्रिक अनुभव और सौन्दर्यगत अनुभव के मध्य अन्तर स्थापित किया। कांट द्वारा तैयार की गई आधारभूमि पर ही बाद में जर्मन दार्शनिकों ने सौन्दर्यशास्त्र का वृहत्तर ढाँचा खड़ा किया।
ललितकलाओं के दर्शन के रूप में जर्मन दार्शनिक हीगेल ने 'ऐस्थेटिक्स' को प्रतिष्ठित किया, जिसके • अन्तर्गत सभी ललित कलाओं का अध्ययन किया जाने लगा। हीगेल से पहले सौन्दर्यशास्त्र को संवेग या ऐन्द्रिय अनुभूतियों का शास्त्र माना जाता था। हीगेल ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'द फ़िलॉसफ़ि ऑफ फाइन आर्ट' की भूमिका में सौन्दर्यशास्त्र को सौन्दर्य के सभी क्षेत्रों से सम्बन्धित माना है,
लेकिन उसने कहा कि इसका सही अर्थ कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौन्दर्य से है। अतः सौन्दर्यशास्त्र ललित कलाओं का दर्शन है। लम्बे अन्तराल के बाद क्रोचे ने सौन्दर्यशास्त्र को 'द साइन्स ऑफ एक्स्प्रेशन' के रूप में परिभाषित किया। क्रोचे के अनुसार सौन्दर्यशास्त्र का विषय मनुष्य की कल्पना, पुनः प्रत्यक्ष और अभिव्यक्ति से सम्बद्ध है। दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में एक स्वतन्त्र और स्वतः पूर्ण चिन्तन पद्धति के रूप में सौन्दर्यशास्त्र को स्थापित करने का श्रेय क्रोचे को ही है।
सौन्दर्यशास्त्रीय चिन्तन की जर्मन परम्परा बीसवीं सदी में भी जारी रही। मार्टिन हैडेगर ने अपने निबन्ध 'दि ऑरिजिन ऑफ द वर्क ऑफ आर्ट' (1936) में कहा कि कला कृति को इस जगत् में स्थित वस्तु के रूप में देखना आधुनिकता की एक मूलभूत लाक्षणिक त्रुटि थी।
उसके अनुसार कला हमारे लिए नये जगत् के द्वार खोलती है। कला के रूप में सत्य अपने आप में घटता ही नहीं है, बल्कि हमारे अपने अनुभव के दायरे में वस्तुओं के अस्तित्व का उद्घाटन भी करता है। अंग्रेज़ सौन्दर्यशास्त्री एडवर्ड बुलो बीसवीं सदी के आरम्भ में सौन्दर्यशास्त्र के सम्बन्ध में यह प्रश्न कर चुके थे कि कहीं कला और सौन्दर्यशास्त्र की परिभाषाएँ कलाकार की सृजन क्षमताओं का क्षय तो नहीं कर रही हैं। बुलो के व्याख्यान 1957 में प्रकाशित हुए और साठ के दशक में अमेरिकी कलाकार बार्नेट न्यूमैन ने घोषणा कर दी कि कला के लिए सौन्दर्यशास्त्र का वही उपयोग है जो पक्षियों के लिए पक्षीशास्त्र का है। अर्थात् कलाकार सौन्दर्यशास्त्र के सिद्धान्तों से परिचित न हो यही अच्छा है।
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