प्राकृत - Prakrit
मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा का दूसरा युग प्राकृतों का है। मध्यकालीन आर्यभाषा के सभी रूपों को 'प्राकृत' कहते हैं। मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा के प्रथम युग के शिलालेखों की भाषा को भी प्राकृत कहा गया
है।
प्राकृत नामकरण
प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से दी गई है। जैसा कि पिशेल ने लिखा है, कुछ वैयाकरण इसका विश्लेषण 'प्राक् +कृत' अर्थात् 'पहले बनी हुई' करते हैं और इस रूप में इसे संस्कृत से पहले की मानते हैं। नमि साधु सामान्य लोगों में व्याकरण के नियमों आदि से रहित सहज वनन- व्यापार को प्राकृत का आधार मानते हैं -
"सकल जगज्जन्तुनां व्याकरणादिभिरनाहित संस्कार सहजो वचन व्यापारः प्रकृतिः तत्र भवं सैव या प्राकृतम् ।"
ऐसा अनुमान लगता है कि एक भाषा का संस्कार करके उसके रूप को 'संस्कृत' नाम दिया, तो वह भाषा जो असंस्कृत भी और पण्डितों में प्रचलित भाषा के विपरीत जो 'प्रकृत' या सामान्य लोगों में सहज रूप में बोली जाती थी, स्वभावतः 'प्राकृत' के नाम की अधिकारिणी बन बैठी।
प्राकृत की उत्पत्ति वेद और संस्कृतकालीन जनभाषा का विकसित रूप से है। पालि काल की समाप्ति के बाद लोकभाषा का यही रूप था । प्राकृतों में प्राचीनतम रूप शिलालेखी प्राकृतों का है। जिसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
शिलालेखी प्राकृत
प्राचीन प्राकृत में अशोक के शिलालेखों की प्राकृत भी आती हैं अतः इसे 'शिलालेखी प्राकृत' कहते हैं। इसको ही अशोकन प्राकृत, लाट प्राकृत भी कहते है। शिलालेखी प्राकृत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) ध्वनियाँ पालि के समान हैं। पालि में केवल 'स' है। किन्तु शाहबाजगढ़ी और मानसेरा शिलालेखों में श, ष, स तीनों मिलते हैं।
(ii) कुछ शिलालेखों में ग्, ञ नहीं है। क ल है ।
(iii) शिलालेखी प्राकृत में दीर्घाकरण, ह्रस्वीकरण, स्वरभक्ति, वर्णलोप, गुण परिवर्तन, व्यंजन परिवर्तन,
सरलीरण आदि मिलते हैं।
(iv) हलन्त शब्द प्रायः अकारान्त हो गए हैं। कुछ प्राचीन हलन्त शद रूप शेष है। मातरि पितरि
लाजिना, राजो आदि।
(v) क्रियारूप प्रायः पालि के तुल्य हैं। आत्मनेपद नहीं है। कर्मवाच्य, णिच, सन, तुम, त्वा, शतृ आदि प्रत्यय हैं। (vi) तीन लिंग है। द्विवचन नहीं है।
प्राकृत के भेद
इसको 'साहित्यिक प्राकृत' भी कहते है। इस काल में प्राकृत का विकसित साहित्यिक रूप प्राप्त होता है। प्राकृत भाषाओं के विषय में सर्वप्रथम भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में विचार किया है। उनके मतानुसार 7 मुख्य प्राकृत है और 7 गौण (विभाषा) मुख्य प्राकृत हैं मागधी, अवन्तिजा, प्रस्त्या, सूरसेनी (शौरसेनी) अर्द्धमागधी, बाहली, दाक्षिणात्य (महाराष्ट्री ) गौण 7 प्राकृतों के नाम हैं- शाबरी, आभीरी, चाण्डाली, सवरी, द्राविड़ी, उद्रजा, ववेचरी ।
प्राकृत-व्याकरण के सबसे प्राचीन वैयाकरण वररुचि ने चार प्राकृत मानी हैं शौरसेनी, महाराष्ट्री - मागधी, पैशाची मागधी के दो रूप हो गए हैं मागधी और अर्द्धमागधी इस प्रकार पाँच प्राकृत हैं। मुख्य - प्राकृतों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
शौरसेनी प्राकृत
इसका क्षेत्र शूरसेन (मथुरा के आस-पास ) का प्रदेश था। इसका विकास पालिकालीन स्थानीय भाषा से हुआ। यह मध्यप्रदेश की भाषा थी। नाटकों में सर्वाधिक प्रयोग इसी का हुआ है स्रियों आदि का वार्तालाप शौरसेनी प्राकृत में ही होता था। केवल पद्य के लिए महाराष्ट्री थी। शौरसनी से ही वर्तमान हिन्दी का विकास हुआ है। राजशेखर-कृत कर्पूरमंजरी का समस्त पद्य भाग शौरसेनी प्राकृत में है। भास, कालिदास आदि के नाटकों में गद्य शौरसेनी में ही है। इसका प्राचीनतम रूप अश्वघोष के नाटकों में मिलता है। यह निम्न एवं मध्यम कोटि के पात्रों तथा स्त्रियों की भाषा थी। इसमें सरलता, सरसता, श्रवण-सुखदता अधिक थी, अतः अधिक लोकप्रिय हुई।
शौरसेनी प्राकृत : प्रमुख विशेषताएँ
शौरसेनी प्राकृत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) प्रथमा एकवचन में कारक चिह्न ओ पुत्रः > पुत्तो।
(ii) दो स्वरों के मध्यगत संस्कृत के त को द और थ को ध। पृच्छति > पुच्छति, शतसद, अथ अघ, कथं कथ ।
(iii) मध्यगत क, व को क्रमश गछ होते हैं। नामकः पाउग्र, अतिथि अदिधि, कृतकिद, द प्रायः शेष रहता है। जलद > जलदो।
(iv) मध्यगत महाप्राण ख, ध, थ, ध, फ, भ को ह हो जाता है। मुख> मुह मेघ > मेह, वधू> वहू अभिनव > अहिणव ।
(v) न कोण हो जाता है।
नीन> णाध, भगिनी > वहिणी ।
(vi) मध्यगत प को व होता है। दीप दीव, अपि > अवि ।
(vii) क्ष को क्ख, .... को झ, इक्षु, इवषु, मञ्झ ।
(viii) आत्मनेपद प्राय समाप्त हो गया। परस्मैपद ही है।
(ix) लिट्, लङ, लुङ, विधिलिङ प्रायः समाप्त हो गए।
(x) द्विवचन का अभाव हो गया।
महाराष्ट्री प्राकृत
महाराष्ट्री प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है। इससे ही मराठी भाषा का विकास हुआ है।
प्राकृतों में सबसे अधिक साहित्य महाराष्ट्री में है। संस्कृत नाटकों में प्राकृत में प रचना महाराष्ट्री में ही है। महाराष्ट्री प्राकृत के प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं - राजा हाल- कृत 'गाहा सतसई' (गाथा सप्तशती), प्रवरसेन कृत 'रावण वहो' (सेतुबन्ध), वाक्पति-कृत 'गडवहो' (गौडवधः ), जयवल्लम- कृत 'वग्जालग्ग', हेमचन्द्राचार्य कृत' 'कुमारपालचरित' ये सभी काव्य ग्रन्थ हैं। कर्पूरमंजरी के पद्य महाराष्ट्री में है। भरतमुनि ने दाक्षिणात्य प्राकृत से महाराष्ट्री का ही निर्देश किया है। दण्डी ने 'काव्यादर्श' में महाराष्ट्री को सर्वश्रेष्ठ प्राकृत माना है। "महाराष्ट्राश्रयां भाषां प्रकृष्टं विदुः" - काव्यादर्श अवन्ती औश्र बाहलीक प्राकृत महाराष्ट्री में ही अन्तर्भूत है।
महाराष्ट्री प्राकृत : प्रमुख विशेषताएँ
महाराष्ट्री प्राकृत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) स्वर - बाहुल्य मध्यगत व्यंजनों के लोप से स्वरों की प्रधानता अतएव संगीतात्मकता ।
(ii) मध्यगत अल्पप्राण (क,ग,च, ज, त, द) का लोप । लोकः > लो ओ, हृदय हि अ अ, प्राकृत > पाउअ, जानाति > जाणाइ ।
(iii) मध्यगत य का सदा लोप होता है। प्रिय > पिअ, वियोग विओग (iv) मध्यत महाप्राण स्पर्शो (ख, घ, थ, ध, फ, भ) को ह । अन्य > अहं कथं कहं, मुख> मुह, लघुक
> लहुअ, थ को ह महाराष्ट्री की प्रमुख विशेषता है। शौरसेनी में थ का ध होता है।
(v) ऊष्म वर्णों (श, ष, स ) को प्रायः ह हो जाता हैं दश दह, धनुष> धगुह, पाषाण पाहाण दिवस > दिअहं ।
(vi) क्षकाच्छ । कुक्षि > कुच्छि इक्षु > उच्छु ।
(vii) कर्मवाच्य य को इज्ज । पृच्छयते > पुच्छिज्जइ ।
(viii) त्वा को ऊण पृष्ट्वा > पुच्छिऊण ।
(ix) तुम को उ और क्त (त) का उन कर्तुम् > काउं, गृहीत > गहिअ ।
(x) अनीय को अणिज्जय । करणीय > करणिज्ज ।
मागधी प्राकृत
यह मगध की भाषा थी। इसका साहित्य बहुत कम मिलता है। इसका प्राचीनतम रूप अश्वघोष के नाटकों में मिलता है। भरत के नाट्यशास्त्र के अनुसार यह अन्त: पुर के नौकर, अश्वपालक आदि की भाषा थी। मार्कण्डेय के अनुसार भिक्षु, क्षपणक, राक्षस चेह आदि मागधी बोलते थे। लंका में पालि को 'मागधी' कहते हैं, क्योंकि पालि मगध से वहाँ गई थी। इसके तीन प्रकार मिलते हैं शाकारी, चाण्डाली शाबरी। मागधी से भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, उड़िया, असमिया विकसित हुई हैं।
मागधी प्राकृत : प्रमुख विशेषताएँ
मागधी प्राकृत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) प् स को श्। पुत्तरश, भविष्यति > भविशशदि ।
(ii) र कोल । पुरुषः > पुलिशे, राज्ञः > लाआणो ।
(iii) ज को त होता है। संस्कृत का य पूर्ववत् रहता है। जानाति याणादि, जायते यायदे, यथा यथा ।
(iv) द्य, र्ज, र्य को य्य होता है। अद्य और आर्य अय्य, मद्य मय्य
(v) ण्य, न्य, ज्ञ, ञ्ज को ञ्ज होता है।
(vi) मध्यगत च्छ को श्च होता है। गचछति गचदि ।
(vii) र्थ और स्थ को स्त होतो है अर्थ: अस्ते, उपस्थित > अवस्तिद ।
(viii) स्क को स्क, ष्टको स्ट होता है। शुष्क > शुस्क कस्ट > कस्ट ।
(ix) प्रथमा एक में विसर्ग को ऐ होता है। देवः > देवे, एषः > एशे
अर्द्धमागधी प्राकृत
1 अर्द्धमागधी का क्षेत्र मागधी और शौरसेनी के मध्य में है। यह प्राचीन कोसल के समीपवर्ती क्षेत्र की भाषा थी। इसमें मागधी के गुण अधिक हैं। साथ ही शौरसेनी के गुण भी है, अतः इसे अर्द्धमागधी कहा जाता है। इसको ऋषिभाषा या आर्यभाषा भी कहते हैं। भगवान् महावीर के सारे धर्मोपदेश इसी भाषा में है।
इसमें प्रचुर मात्रा में जैन साहित्य मिलता है। अतः इसका विशेष महत्त्व है। इसमें गद्य और पद्य दोनों प्रकार का साहित्य है। आचार्य विश्वनाथ ने 'साहित्य दर्पण' में इसे चेट, राजपूत्र एवं सेठों की भाषा बताया है। इसका प्राचीनतम प्रयोग अश्वघोष के नाटकों में मिलता है। मुद्राराक्षस और प्रबोधचन्द्रोदय में अर्द्धमागधी का प्रयोग हुआ है। इससे पूर्वी हिन्दी का विकास हुआ है।
अर्द्धमागधी प्राकृत : प्रमुख विशेषताएँ
अर्द्धमागधी प्राकृत की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(i) दन्त्य को मूर्धन्य होता है। स्थित ठिथ।
(ii) श, ष को स होता है। श्रावक सावक
(iii) य को ज हो जाता है। यौवन > जोव्वण ।
(iv) संयुक्त व्यंजनों में प्रायः स्वर भक्ति के द्वारा विच्छेद होता है। कृष्ण कसिन, स्नान > सिनान ।
(v) सन्धि-स्थलों पर म् लग जाता है। अन्योन्यम् > अन्नमन्नम्, अण्णमण्णम् ।
(vi) स्पर्श का लोप हो जाने पर 'य' श्रुति सागर> सामर ।
(vii) सन्धि स्थलों पर स्वर भक्ति का प्रयोग होता है। दृचहेन > दुयोहेण, स्वाख्यात > सुक्खाय ।
(viii) गद्य और पद्य में भेद है। गाय में मागधी के तुल्य 'ए' और पद्य में शौरसेनी के तुल्य 'ओ' है।
पैशाची प्राकृत
पैशाची का क्षेत्र पश्चिमोत्तर भारत एवं अफगानिस्तान का क्षेत्र थे। पैशाची को पैशाचिक, भूतभाषा, भूतभाषित आदि भी कहते थे। महाभारत में कश्मीर के पास रहने वाली 'पिशाच' जाति का उल्लेख है । गुणाठ्य की अतिप्रसिद्ध रचना 'वृहत्कथा' पैशाची प्राकृत में ही थी। इस समय इसका साहित्य नगण्य है। इसका ही विकसित रूप 'लहँदा' भाषा है। हेमचन्द्र-कृत 'कुमारपालचरित' और 'कात्यानुशासन' में तथा 'हम्मीरमदमर्दन' नाटक में इसका प्रयोग मिलता है। राक्षस, पिशाच, निम्न कोटि के पात्र लोहार आदि इसी का प्रयोग करते थे।
पैशाची प्राकृत : प्रमुख विशेषताएँ
पैशाची प्राकृत की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(1) वर्ग के तृतीय को प्रथम वर्ण होता है। नगर नकर, तडाग तटाक (ii) वर्ग के चतुर्थ का द्वितीय वर्ण होता है।
निर्झर > निच्छर, मेघ > मेखो।
(iii) पैशाची में पंचम वर्ण केवल 'न' है।
(iv) स्ल का विपर्यय। कभी र कोल, कभी ल कोर रूर्द > लुद्, कुमार कुमाल, रुधिर > लुधिरं ।
(v) ज़, न्य ण्य को ञ्च । अन्य > अञ्च, पुण्य > पुञ्च, प्रज्ञा > पञ्चा
(vi) स्वरभक्ति (मध्य में अ, इ, उ) । कस्ट > कसट, स्नानं सिनानं भार्या भारिया ।
(vii) ष काश या स तिष्ठति > चिश्वदि, विषम > विसमो ।
(viii) मध्यगत व्यंजनों का लोप नहीं होता। मधुर मधुरं ।
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