उपसर्ग - prefix
उपसर्ग से तात्पर्य
'उपसर्ग', भाषा के वे 'रूप' या लघुतम अर्थवान् खण्ड हैं जो मूल शब्दों के आरम्भ में लगकर नये-नये शब्दों की रचना करते हैं। शब्दों की तरह ये भी विभिन्न ध्वनियों के मेल से बनते हैं और अर्थवान् भी होते है, हाँ स्वतन्त्र होना इनके लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। इसीलिए इनका प्रयोग भाषा में शब्दों की तरह स्वतन्त्र रूप से नहीं किया जा सकता । भाषाविज्ञान में इस तरह की लघुतम अर्थवान् इकाइयों को 'रूप' (morph ) कहा जाता है।
उपसर्गों से शब्द बनाने के कुछ उदाहरण देखिए वि + शेष विशेष, आ + जन्म = आजन्म, उप + मंत्री = उपमंत्री, स पूत सपूत, आदि। अतः ध्यान रखिए- =
(i) 'उपसर्ग' शब्द नहीं हैं बल्कि शब्दों के छोटे-छोटे खण्ड हैं।
(ii) शब्दों की तरह ये भी अर्थवान् इकाइयाँ हैं।
(iii) उपसर्ग शब्दों की तरह स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त नहीं हो सकते।
(iv) उपसर्ग हमेश किसी मूल शब्द के प्रारम्भ में लगकर नया शब्द बनाते हैं।
जिस प्रकार हिन्दी में स्रोत के आधार पर शब्दों के तत्सम तद्भव तथा आगत या विदेशी भेद किए जाते हैं
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उसी तरह उपसगों के भी स्रोत के आधार पर निम्नलिखित भेद किए जा सकते हैं तत्सम उपसर्ग, तद्भव उपसर्ग तथा आगत या विदेशी उपसर्ग।
तत्सम उपसर्ग
'तत्सम' शब्द 'तत्' +सम' शब्दों के योग से बना है। 'तत्' का अर्थ है 'उसके' तथा 'सम' का अर्थ है 'सामान' । इस तरह इस शब्द का अर्थ हुआ 'उसके सामान' । यहाँ 'उसके' सर्वनाम का प्रयोग 'संस्कृत' के लिए हुआ है। अतः 'तत्सम उपसर्ग' वे उपसर्ग हैं जिनका प्रयोग हिन्दी में संस्कृत के सामान ही होता है।
वस्तुतः हिन्दी में अनेक उपसर्ग अपने शब्दों के साथ संस्कृत से सीधे आ गए हैं और हिन्दी के तत्सम शब्दों में संस्कृत की ही भाँति प्रयुक्त होते हैं। इन उपसर्गों को 'तत्सम उपसर्ग' कहा जाता है। नीचे कुछ प्रमुख तत्सम उपसर्ग और उनसे बनने वाले शब्दों के उदाहरण दिए जा रहे हैं-
उपसगों की तरह प्रयुक्त होने वाले संस्कृत के कुछ शब्दांश:
संस्कृत में कुछ शब्दांश समास रचना में पूर्व पद के रूप में प्रयुक्त होते थे पर हिन्दी में आकर ये इतने अधिक प्रचलित हो गए कि इनका हिन्दी में प्रयोग उपसर्गों की तरह होने लगा है।
तद्भव उपसर्ग
तद्भव उपसर्ग मूलतः तत्सम उपसर्गों या संस्कृत के उपसर्गों से ही विकसित हुए हैं। इन्हीं को हिन्दी उपसर्ग भी कहा जाता है। इनमें से कुछ उपसर्ग थोड़े-बहुत रूप परिवर्तन के साथ भी विकसित हो गए हैं, जैसे 'अघ' => 'अघ', 'कु' => 'क', 'सु' => 'स' आदि। कुछ संस्कृत के तत्सम उपसर्ग हिन्दी में आकर हिन्दी के अपने बन गए और यथावत रूप में तद्भव शब्दों के साथ लगकर शब्द रचना करने लगे। अतः आपको कुछ उपसर्ग जो तत्सम उपसर्गों की सूची में मिलते हैं, वे तद्भव या हिन्दी उपसर्गों की सूची में भी दिखाई देंगे, पर ध्यान देने की बात यह है कि ये तद्भव शब्दों के साथ मिलकर नये शब्दों की रचना करेंगे।
आगत या विदेशी उपसर्ग
हिन्दी में अनेक शब्द अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी फ्रांसिसी पुर्तगाली आदि अनेक भाषाओं से आये हैं। और आज हिन्दी के अपने बन गए हैं। इन शब्दों के साथ इन भाषाओं के उपसर्ग भी ठीक वैसे ही आ गए हैं जैसे संस्कृत शब्दों के साथ तत्सम उपसर्ग आए थे। इन उपसर्गों को 'आगत' या 'विदेशी' उपसर्ग कहा जाता है।
उपसर्ग तथा परसर्ग में अन्तर
'उपसर्ग' की संकल्पना से आप परिचित हो चुके हैं।
उपसर्ग भाषा के वे लघुतम अर्थवान् रूप हैं जो किसी मूल शब्द के आरम्भ में लगकर नये-नये शब्दों की रचना करते हैं। जहाँ तक परसर्गों का प्रश्न है ये अविकारी शब्द कहलाते हैं। इन्हें 'सम्बन्धबोधक' अव्यय भी कहते हैं। ये वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम के बाद प्रयुक्त होकर वाक्य के किसी अन्य पद (संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया) के साथ सम्बन्ध का बोध कराते हैं। इनके उदाहरण हैं में, से, -
को, पर, के लिए, के सामने, के बारे में, आदि। देखिए कुछ उदाहारण-
0) आपके कमरे में एक लड़की बैठी है।
(ii) घर के सामने बहुत भीड़ है।
(iii) मेज़ पर एक किताब रखी है।
(iv) वह बच्चों के लिए मिठाई लायी।
अतः ध्यान रखिए शब्द रचना के साथ 'परसर्गों' का कोई सम्बन्ध नहीं है।
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