भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रगतिशील दौर - Progressive phase of the Indian National Movement

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ के उदय और समाजवाद के विकास ने विश्व की शोषित-पीड़ित जनता की मुक्ति को सम्भव बनाया और नये विश्व की राह दिखाई। रूस की महान् अक्टूबर क्रान्ति की प्रेरणा का स्रोत और आधार मार्क्सवादी चिन्तन था । इस क्रान्ति की सफलता के बाद विश्व की पीड़ित दलित मानवता अपनी मुक्ति के लिए मार्क्सवाद की ओर आकर्षित हुई और अपने मुक्ति-संघर्ष में मार्क्सवाद का वैचारिक आधार ग्रहण करने लगी। रूस की समाजवादी क्रान्ति और दुनिया के प्रथम सर्वहारा राज्य की स्थापना ने समाजवाद को एक काल्पनिक स्वप्न से ठोस यथार्थ में परिवर्तित कर दिया था।

समाजवादी विचारों की प्रतिध्वनियाँ स्वामी विवेकानन्द और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे कुछ चिन्तकों द्वारा प्रसंगवश की गई टिप्पणियों के रूप में सुनाई देने लगी थीं। लाला हरदयाल द्वारा 1912 में 'मार्क्स एक आधुनिक ऋषि शीर्षक लिखे गए लेख और 1912 में केरल के पत्रकार रामकृष्ण पिल्लई द्वारा मलयालम भाषा में लिखी गई मार्क्स की जीवनी के प्रकाशन के साथ भारत में मार्क्सवाद से जनता के परिचय का सिलसिला शुरू हो चुका था, लेकिन यह सब भी जन-जीवन और साहित्य की प्रधान गतिविधियों का अंग नहीं था। रूस की समाजवादी क्रान्ति के साथ भारत में मार्क्सवाद सम्बन्धी ज्ञान जनता के व्यापक हिस्सों में फैलने लगा, जिसे भारत के स्वाधीनता संघर्ष के तीव्र होने के साथ नये आयाम प्राप्त होने लगे।


सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम से लेकर सन् 1919 तक आते-आते भारत की जनता में अपने पारम्परिक समाज को बदलने की चेतना का विकास राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की चेतना के रूप में हो चुका था । जन- विरोधों की शृंखला के बीच जालियाँवाला बाग हत्याकांड और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने जन असन्तोष को बढ़ाने का कार्य किया। इसी दौरान भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस ने अपने अधिवेशनों में मजदूरों के अधिकारों तथा उन्हें संगठित करने की आवश्यकता सम्बन्धी प्रस्ताव पारित किए।

सन् 1921 में लाला लाजपतराय की अध्यक्षता में मजबू के प्रथम केन्द्रीय संगठन 'एटक' का गठन हुआ। सन् 1923 तक देश के कुछ औद्योगिक केन्द्रों में छोटे- छोटे कम्युनिस्ट गुटों की गतिविधियाँ शुरू होगई थीं। दिसंबर 1925 में कानपुर में एक अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की गई। कॉंग्रेस ने सन् 1929 में अपने लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज्य' के लक्ष्य की घोषणा कर दी। सन् 1931 में कॉंग्रेस के कराची अधिवेशन में मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव पास किया गया और यह मान लिया कि जनता के कष्टों को दूर करने के लिए राजनैतिक स्वतन्त्रता में आर्थिक स्वतन्त्रता का निहित होना आवश्यक है।

सन् 1934 में आचार्य नरेन्द्रदेव और जयप्रकाश नारायण ने कॉंग्रेस के भीतर कॉंग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की। स्वतन्त्रता आन्दोलन में आर्थिक स्वतन्त्रता का मुद्दा महत्त्व प्राप्त कर रहा था । कम्युनिस्ट पार्टी के विकास के साथ समाजवादी आन्दोलन आगे बढ़ रहा था । समाजवादी विचारों से प्रभावित विद्यार्थियों, किसानों और नवयुवकों के संगठन बन रहे थे। सन् 1936 में कॉंग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के अध्यक्ष पद से नेहरू जी ने भारत और विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए समाजवाद को एकमात्र रास्ता कहकर राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नयी दिशा देने की कोशिश की।