प्रगतिवाद बनाम प्रगतिशील - progressivism vs progressive
'हिन्दी साहित्य कोश' के अनुसार "प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाया गया वह साहित्यिक आन्दोलन है, जिसमें जीवन और यथार्थ के वस्तु-सत्य को उत्तर-छायावाद काल में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहित्यिक चेतना को अग्रसर होने की प्रेरणा दी। "
हिन्दी साहित्य में सन् 1936 से सन् 1951 तक के कालखण्ड को प्रगतिवाद का समय माना जाता है। एक आन्दोलन के रूप में 'प्रगतिवाद' भले ही समाप्त हो गया है,
लेकिन साहित्य की एक प्रवृत्ति और साहित्य- समीक्षा की पद्धति के रूप में वह अद्यतन हिन्दी साहित्य में व्यापक रूप में विद्यमान है। 'प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही 'प्रोग्रेसिव लिटरेचर' के सम्बन्ध में विचार-विमर्श शुरू हो गया था । 'प्रोग्रेसिव' के अर्थ में हिन्दी में 'प्रगतिवादी' और 'प्रगतिशील' शब्दों के प्रयोग का प्रचलन तभी से हुआ। 'प्रगतिशील लेखक संघ' के संस्थापकों में प्रायः सभी 'मार्क्सवादी चिन्तन' में विश्वास करने वाले या उससे प्रभावित लेखक थे, इसलिए मार्क्सवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले लेखकों को 'प्रगतिशील' या 'प्रगतिवादी' माना गया। बाद में 'प्रगतिवादी' और 'प्रगतिशील' में अन्तर करने के प्रयास भी हुई।
कुछ लोगों ने 'मार्क्सवाद' में विश्वास करने वाले लेखकों के साहित्य को 'प्रगतिवाद' कहा तथा छायावाद के बाद की व्यापक सामाजिक चेतना वाले उस साहित्य को 'प्रगतिशील साहित्य' कहा, जिसके लेखक मार्क्सवादी सिद्धान्तों को भले ही नहीं मानते हों, परन्तु उनमें सामान्य मानवतावादी भावना पाई जाती हो। 'प्रगतिवाद' को संकीर्ण तथा 'प्रगतिशील' को उदार कहने की प्रवृत्ति भी देखी गई। 'प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा निर्धारित और प्रचारित साहित्य को 'प्रगतिवादी' और शेष समस्त साहित्य को 'प्रगतिशील' साहित्य कहकर भी दोनों में भेद प्रस्तावित किया गया। वस्तुतः 'प्रगतिवादी' और 'प्रगतिशील' साहित्य का यह भेद निरर्थक है। दोनों एक ही साहित्यिक प्रवृत्ति के दो नाम हैं।
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