अपभ्रंश - prolapse

 अपभ्रंश - prolapse


मध्यकालीन आर्यभाषा का अन्तिम रूप 'अपभ्रंश के रूप में दिखाई पड़ता है। अपभ्रंश का विकास प्राकृतकालीन बोलचाल की भाषा से हुआ है। इस रूप में उसे प्राकृत और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की कड़ी कहा जा सकता है। विभिन्न ग्रन्थों में अपभ्रंश के अन्य नाम 'ग्रामीण भाषा', देसी, देशभाषा आभीरोक्ति, अपभ्रष्ट, अवहंस (अपभ्रंश शब्द का विकसित रूप) अवहत्थ, अवहट्ठ, अवहठ तथा अवहट्ट (ये चारों अपभ्रंश शब्द के विकसित रूप हैं) आदि मिलते हैं। 'अपभ्रंश' का अर्थ है बिगड़ा भ्रष्ट या गिरा हुआ भाषा का विकास पण्डितों को सर्वदा ह्रास दिखाई पड़ता है अतः नामकरण के पीछे यह भावना दिखाई देती है। अपभ्रंश का काल 500 ई. से 1000 ई. तक है।


'अपभ्रंश' शब्द के प्राचीनतम प्रयोग व्याडि (पतंजलि से कुछ पूर्व तथा पतंजलि के महाभाष्य (ई.पू. 150 के लगभग) आदि में मिलते है। किन्तु वहाँ इसका अर्थ भाषा-विशेष न होकर संस्कृत शब्द या तत्सम शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है। भाषा के अर्थ में इस शब्द के प्रयोग सर्वप्रथम छठी सदी में मिलते हैं। इस दृष्टि से भामह के 'काव्यालंकार' और चंड के 'प्राकृत-लक्षणम्' के नाम उल्लेखनीय हैं।


अपभ्रंश भाषा के प्राचीनतम उदाहरण भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र (300 ई.) में मिलते है। इसका आशय यह है कि उसके बीज इससे भी पूर्व फूटने लगे थे। कालिदास के नाटक 'विक्रमोर्वशीयम्' के चौथे अंक में अपभ्रंश के कुछ छन्द मिलते है।

इन छन्दों के सम्बन्ध में थोड़ा विवाद भी है। कुछ इसे बाद का प्रक्षिप्त मानते हैं और कुछ कालिदास का लिखा । कालिदास द्वारा लिखित होने का मत अधिक ठीक लगता है। छठी सदी तक आते-आते अपभ्रंश में काव्य-रचना होने लगी थी, तब से लेकर 15वीं 16वीं सदी तक इसमें साहित्य रचना हुई। यद्यपि बोलचाल की भाषा के रूप में इसका प्रचार 1000 ई. के आस-पास समाप्त हो गया। जिनमें उल्लेखनीय ग्रन्थ रघु का करकण्डचरिउ, धर्मसूरि का जम्बूस्वामी रासा, पुष्पदन्त का आदिपुराण,

सरह का दोहाकोश, रामसिंह का पाहुडदोहा, स्वयंभू का पउमचरिउ तथा धनपाल की 'भविसत कहा' आदि हैं।


अधिकांश विद्वान् यह मानते है कि अपभ्रंश की प्रारम्भिक विशेषताएँ सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर प्रदेश में विकसित हुई। कीथ आदि कुछ लोगों ने मूलतः अपभ्रंश का सम्बन्ध मध्यप्रदेश की भाषा से मानते हैं। यद्यपि बाद में वे उस पर अपभ्रंश के अन्य रूपों के प्रभाव का भी संकेत करते हैं। डॉ. सक्सेना भी मध्यदेशीय या शौरसेनी अपभ्रंश को ही उस काल की परिनिष्ठित भाषा मानते हैं।