प्रमुख प्रगतिवादी आलोचक और आलोचना - Prominent Progressive Critics and Criticism
आधुनिक हिन्दी आलोचना में मार्क्सवादी चिन्तन से अनुप्राणित होकर जिन आलोचकों ने प्रगतिवादी आलोचना का आरम्भ किया उनमें शिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव और डॉ० रामविलास शर्मा के नाम उल्लेखनीय हैं। शीघ्र ही इनके साथ हिन्दी के बहुत से आलोचक जुड़ गए। इनमें मुक्तिबोध, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, डॉ. नामवर सिंह, डॉ० रमेशकुंतल मेघ, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. शिवकुमार मिश्र, और डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने प्रगतिवादी आलोचना के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इन सभी आलोचकों की आलोचना- दृष्टि तो मूलतः मार्क्सवादी प्रगतिवादी ही है, लेकिन इनकी आलोचना-शैली और आलोचना- क्षेत्र काफी अलग-अलग हैं।
डॉ. रामविलास शर्मा कवि हैं, तो मुक्तिबोध कवि और कथाकार। डॉ. शर्मा ने सैद्धान्तिक आलोचना और व्यावहारिक आलोचना दोनों क्षेत्रों में बहुत गम्भीर और विशाल लेखन किया है। मुक्तिबोध ने आलोचना, विशेष रूप से प्रगतिवादी आलोचना की सैद्धान्तिक समस्याओं पर अधिक ध्यान दिया है। शिवदान सिंह चौहान और प्रकाशचन्द्र गुप्त ने व्यावहारिक आलोचनाएँ अधिक लिखी हैं यद्यपि इन दोनों ने आलोचना के सिद्धान्त-पक्ष पर भी प्रचुर मात्रा में लिखा है। डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, मुक्तिबोध, डॉ॰ नामवर सिंह डॉ. रमेशकुंतल मेघ, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. शिवकुमार मिश्र और डॉ० मैनेजर पाण्डेय मुख्य रूप से कविता के आलोचक हैं।
यद्यपि इनमें से कई आलोचकों ने कथा साहित्य की भी महत्त्वपूर्ण आलोचनाएँ लिखी हैं। इसके अतिरिक्त डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय ने भारतीय काव्यशास्त्र पर, डॉ. शिवकुमार मिश्र ने मार्क्सवादी साहित्य-चिन्तन और प्रगतिवाद पर, डॉ. रमेशकुंतल मेघ ने सौन्दर्यशास्त्र पर तथा डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने साहित्य के समाजशास्त्र पर बहुत महत्त्वपूर्ण आलोचना ग्रन्थ लिखे हैं। डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह और डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने साहित्य, आलोचना और इतिहास के पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन करते हुए उनके स्वरूप को स्पष्ट करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। परम्परा के मूल्यांकन की दृष्टि से डॉ० रामविलास शर्मा का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है।
हिन्दी साहित्य के विभिन्न युगों की प्रमुख रचनाओं और प्रवृत्तियों पर इन आलोचकों ने समय-समय पर बहुत गम्भीर आलोचनाएँ लिखी हैं। साहित्य के रूप और अन्तर्वस्तु की समस्या को सुलझाने का श्रेय प्रगतिवादी आलोचना को ही है।
साहित्य की परम्परा के प्रगतिशील तत्त्वों की खोज, साहित्य की रचना और मूल्यांकन के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण- विवेचन, समकालीन साहित्य में प्रगतिशीलता की पहचान कर उसे महत्त्व प्रदान करना तथा साहित्य की निराशावादी, पतनशील और प्रतिगामी प्रवृत्तियों की आलोचना कर उन्हें साहित्य से तिरस्कृत करने का कार्य प्रगतिवादी आलोचना निरन्तर गम्भीरतापूर्वक कर रही है।
प्रगतिवादी आलोचना को विकसित और समृद्ध करने में उपर्युक्त आलोचकों के अलावा दूसरे अनेक आलोचकों ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और जिनमें से कई आलोचक अद्यतन सक्रिय हैं। प्रगतिवादी आलोचना के इस अध्ययन में उनके योगदान की विस्तृत चर्चा का यहाँ
अवकाश नहीं है, परन्तु कम से कम इनमें से नयी और पुरानी पीढ़ी के कुछ आलोचकों का नामोल्लेख यहाँ सर्वथा उचित होगा। मार्क्सवादी प्रगतिवादी आलोचना में योगदान देने वाले प्रमुख आलोचक हैं- भगवतशरण उपाध्याय, शमशेर बहादुर सिंह, अमृत राय, डॉ. नेमिचन्द्र जैन, डॉ. चन्द्रबली सिंह डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, डॉ. कुंवरपाल सिंह, राजेन्द्र यादव, डॉ. नन्दकिशोर नवल, डॉ. विजयबहादुर सिंह, डॉ. चंचल चौहान, डॉ. मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह, डॉ. विमल चन्द्र सिंह, विजेन्द्र, डॉ. कर्णसिंह चौहान, कमला प्रसाद, डॉ. शम्भुनाथ, डॉ. अजय तिवारी, परमानन्द श्रीवास्तव, डॉ. प्रदीप सक्सेना, डॉ. जवरीमल पारख, रमेश उपाध्याय, डॉ. वीर भारत तलवार, डॉ॰ रामबक्ष, डॉ. सूरज पालीवाल, डॉ. शम्भु गुप्त आदि ।
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