सर्वनाम: पुनरुक्त रूप - Pronoun: reducible form

हिन्दी के सर्वनामों में कुछ सर्वनाम ऐसे भी हैं जो पुनरुक्त या द्वित्व रूप में भी प्रयुक्त होते हैं। 'पुनुरुक्त' (पुनः+ उक्त) शब्द का अर्थ है 'कही हुई बात का पुनर्कथन' । हिन्दी में कुछ सर्वनामों के प्रयोग में सर्वनाम को दोहराया जाता है। उदाहरण के लिए वाक्य 'जो यहाँ रुकना चाहे, रुक सकता है' में आया 'जो' सर्वनाम किसी एक व्यक्ति की ओर संकेत करता है पर जब इसी सर्वनाम का प्रयोग पुनरुक्त या द्वित्व रूप में किया जाता है जैसे- 'जो-जो यहाँ रुकना चाहे, रुक सकता है' तो यहाँ 'जो-जो' एक से अधिक व्यक्तियों की ओर संकेत किया जा रहा है । इस तरह सर्वनामों के पुनरुक्त रूप प्रायः एक से अधिक या अनेक की ओर संकेत करते हैं पर संरचना के स्तर पर इनका प्रयोग एकवचन में ही होता है। देखिए कुछ सर्वनामों के पुनरुक्त रूपों में प्रयोग- -

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1. अनिश्चयवाचक सर्वनाम 'कोई' / कुछ- -


(1) कोई-कोई तो बहुत घमण्डी होता है। (ii) वह हमेशा कुछ-कुछ करती रहती है।


2. प्रश्नवाचक सर्वनाम 'कौन/क्या'- -


(1) मेरे साथ कौन-कौन चल रहा है?


(ii) आपने दावत में क्या-क्या खाया ?


3. सम्बन्धवाचक सर्वनाम 'जो/जिस'. 


(i) जो-जो आना चाहे, आ सकता है।


(ii) जिस जिस को चलना है, हाथ उठाए।

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4. निजवाचक सर्वनाम 'आप ही आप'


यद्यपि निजवाचक सर्वनामों के अनेक रूप हैं, जैसे स्वयं, खुद, आप ही, अपने आप आदि, लेकिन - पुनरुक्त रूप में केवल 'आप ही आप' का प्रयोग मिलता तथा यह व्यक्ति के स्वयं कार्य करने की ओर ही संकेत करता है अतः यह 'अनेक' का अर्थ नहीं देता, जैसा की अन्य सर्वनामों के द्वित्व रूप देते हैं, जैसे-


(1) वह आप ही आप खा रही थी।


(ii) वह आप ही आप बोले जा रहा था।