हिन्दी साहित्य में मनोविश्लेषणवाद - Psychoanalyticism in Hindi Literature

हिन्दी में मनोविश्लेषण सम्बन्धी साहित्यिक चिन्तन के संकेत सन् 1930 के बाद से दिखाई देने लगते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबन्ध 'रसात्मक बोध के विविध स्वरूप' में फ्रायड द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों की चर्चा की है। काव्य और स्वप्न की मनोभूमि की समानता तथा काव्य और काम-भावना सम्बन्धी फ्लायड के विचारों का उन्होंने खण्डन किया है। अपने ग्रन्थ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में भी उन्होंने फ्रायड के काम-वृत्ति सम्बन्धी सिद्धान्त को स्पष्ट करते हुए साहित्य की व्याख्या के सन्दर्भ में उसे अस्वीकार किया है।


बाबू गुलाबराय द्विवेदी-युग के वैयक्तिकतावादी और आदर्शवादी आलोचनात्मक संस्कारों वाले आलोचक थे । यद्यपि उन्होंने मनोविज्ञान का गम्भीर अध्ययन किया और उसके सिद्धान्तों का उपयोग अपने साहित्य चिन्तन में करने का प्रयास भी किया, परन्तु वे इस नवीन सिद्धान्त को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं कर पाए। उन्होंने रस-विवेचन में भी मनोविज्ञान के सिद्धान्तों की सहायता ली है। फ्रायड ने काव्य और स्वप्न की मनोभूमि को एक समान माना है। लेकिन बाबू जी ने लिखा है कि हमारी चिन्ताएँ, उपचेतन में दबी हुई अभिलाषाएँ,

अतृप्त वासनाएँ और कभी-कभी ऐसी बातें जो हमारे मन को गम्भीरता से प्रभावित करती हैं, कल्पना के चित्रों के चुनाव का कारण बनती हैं। लेकिन स्वप्न सिद्धान्त के आधार पर कला कृतियों की सही परख नहीं की जा सकती है। उन्होंने फ्रायड के योगदान की चर्चा करते हुए कहा है कि उसने स्वप्न के सम्बन्ध में बहुत अनुसंधान किया है। इसमें उसने उपचेतन में दबी हुई अतृप्त वासनाओं और विशेषकर काम वासना पर अधिक बल दिया है तथा स्वप्नों में प्रतीकत्व भी माना है, जो वासनापूर्ति के नग्न रूप पर आवरण डाल देता है।


छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पंत ने भी अपने लेखन में कई स्थानों पर फ्रायड के विचारों की चर्चा की है।

उन्होंने 'आधुनिक कवि- 2' के 'पर्यालोचन' में अपनी कविता पर अंग्रेजी के रोमैंटिक कवियों और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के चेतन-अवचेतन प्रभाव को माना है। उनकी इस स्वीकारोक्ति में फ्रायड के कला-चिन्तन की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। एक स्थान पर योग को उन्होंने फ्रायड के मनोविश्लेषण से श्रेष्ठ कहा है। उन्होंने मनोवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण को नैतिकता के क्षेत्र में एक प्रकार की क्रान्ति माना है। मनोविश्लेषण सम्बन्धी पंत जी के दृष्टिकोण में बहुत स्पष्टता नहीं है। एक ओर उन्होंने उसके प्रभाव को स्वीकार किया है, तो दूसरी ओर उसे हीन और हानिकारक भी बताया है। अपने आरम्भिक लेखन में उन्होंने कल्पना के मानसिक जगत् को काव्य में प्रमुखता दी है, लेकिन प्रगतिवादी विचारधारा का प्रभाव ग्रहण करने के बाद वे बाह्य और सामाजिक तत्त्वों को महत्त्व देने लगे।


हिन्दी में मनोविश्लेषणवाद के आरम्भिक परिचय से लेकर उसके विकास की एक परम्परा रही है। जहाँ आरम्भ में इसे सन्देह और उत्सुकता की दृष्टि से देखा गया, बाद में लेखकों ने रचना और आलोचना दोनों ही क्षेत्रों में इसका बहुत उपयोग किया है। यहाँ तक कि मुक्तिबोध की आलोचनात्मक कृति 'कामायनी एक पुनर्विचार' तथा 'एक साहित्यिक की डायरी' में मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। हिन्दी में इस पद्धति में का उपयोग करने वालों में इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय, डॉ. नगेन्द्र और डॉ. देवराज उपाध्याय के नाम प्रमुख हैं।


इलाचन्द्र जोशी


प्रेमचंदोत्तर उपन्यास लेखकों में इलाचन्द्र जोशी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उपन्यास लेखन के साथ-साथ उन्होंने साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में भी कार्य किया है। आलोचक के रूप में इलाचन्द्र जोशी पर आरम्भ में नीत्शे के दुःखवाद का प्रभाव था। बाद में उन्होंने मनोविश्लेषण सिद्धान्त के आधार पर अपने साहित्य-समीक्षा कार्य को आगे बढ़ाया। साहित्य और कला के क्षेत्र में मनोविज्ञान के सिद्धान्तों की उपादेयता और महत्त्व के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है कि "व्यक्तिगत और समष्टिगत मानव-मन के भीतर विभिन्न स्तरों से जो आत्मकामी अथवा असामाजिक प्रवृत्तियाँ समय-समय पर उठती रहती हैं,

उनका विश्लेषण करके मूल-सूत्र से यदि रसग्राही जनता को परिचित कराया जाए तो बहुत सी मानसिक उलझनों और असन्तुलित मनोविकारों से मुक्त होने में उन्हें सहायता मिल सकती है।" ("विवेचना) उनके अनुसार समस्त मानवीय कलाओं का उद्भव मनुष्य की सामूहिक अज्ञात- चेतना से ही हुआ है। मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों के आलोक में कलाकार जान लेता है कि वह किस विशेष उद्देश्य से प्रेरित होकर मानव की अज्ञात चेतना के तत्त्वों को आधार बनाकर रचना में प्रवृत्त होता है। जोशी जी ने 'साहित्य सृजना', 'विवेचना', 'देखा-परखा' आदि कृतियों में मनोवैज्ञानिक आलोचना का विकास किया है।

उन्होंने हिन्दी के कई लेखकों और रचनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है और इस आधार पर कई नये निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने हिन्दी के भक्ति साहित्य को दमित काम-कुण्ठा का प्रतीक बताया है। उन्होंने छायावादी काव्य में भी यौन भावनाओं की अभिव्यक्ति देखी हैं। उनकी मान्यता है कि जो साहित्यकार जितना ही महान् और अनुभूतिशील होगा, सामूहिक प्रगति की आकांक्षा जिसके मन में जितनी गहरी और प्रबल होगी, वैयक्तिक कुण्ठा का प्रश्न उसके आगे उतना ही अधिक परिस्फुट रूप में उभरकर आएगा, क्योंकि अन्तर्दृष्टि रखनेवाले साहित्यकार से यह बात छिपी नहीं रह सकती कि व्यक्ति के भीतर चलने वाले द्वन्द्व सहज सामाजिक प्रगति में किस हद तक बाधक सिद्ध होते हैं। ('देखा-परखा')


अज्ञेय


अज्ञेय के साहित्य-चिन्तन पर मनोविश्लेषण का पर्याप्त प्रभाव रहा है। मनोविश्लेषण के आचार्यों या सिद्धान्तों की प्रत्यक्ष चर्चा उन्होंने कम की है, लेकिन प्रयोगवाद में संक्रमण से पहले और उसकी पृष्ठभूमि के रूप में मनोविश्लेषण के सिद्धान्त अज्ञेय के साहित्य-चिन्तन के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं। अज्ञेय आधुनिक हिन्दी साहित्य को अतृप्ति का साहित्य कहते हैं। उनके अनुसार रचनाकार के मन को पकड़ने में असमर्थ आलोचना निरर्थक हैं । अज्ञेय के रचनात्मक साहित्य में, विशेष रूप से उनके उपन्यासों में मनोविश्लेषण की मान्यताओं को अलग-अलग सन्दर्भों में प्रस्तुत किया गया है। उनकी पुस्तकों 'त्रिशंकु', 'आत्मनेपद', 'हिन्दी साहित्य : एक परिदृश्य', 'भवन्ती', 'संवत्सर' आदि में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से साहित्य को समझने-समझाने के प्रयास देखे जा सकते हैं। अज्ञेय ने माना है कि कलाकार जब अपनी अनुपयोगिता की अनुभूति से आहत होकर विद्रोह कर देता है तब उसका यह विद्रोह ही कलात्मक सृष्टि के रूप में प्रकट होता है।


डॉ० नगेन्द्र


डॉ. नगेन्द्र ने भी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर साहित्य की समीक्षा की है। उनके रस-विवेचन पर भी इन सिद्धान्तों का प्रभाव है। अपने निबन्ध संग्रह 'विचार और अनुभूति' में आधुनिक नाटकों के विवेचन में स्पष्ट रूप में मनोविश्लेषण का आधार लिया है। अपनी एक अन्य पुस्तक 'विचार और विश्लेषण' में उन्होंने फ्रायड और अन्य मनोवैज्ञानिकों के विचारों की विवेचना की है। डॉ० नगेन्द्र के अनुसार फ्रायड के प्रभाव से हिन्दी साहित्य में कई प्रकार के अच्छे परिणाम सामने आए हैं। हिन्दी में शृंगार का पुनरुत्थान हुआ और वह काम- कुण्ठाओं का विश्लेषण करने वाला माध्यम बना। काम की छद्म चेतना और अभिव्यक्तियाँ अनावृत्त हो गई । अवचेतन सिद्धान्त के प्रभाव से हिन्दी लेखकों के चिन्तन में सूक्ष्मता और प्रखरता आई। इसी से छायावाद की सूक्ष्म चेतना को समर्थन प्राप्त हुआ और कला के अन्तर्मुख रूपों को बल मिला ।


डॉ. देवराज उपाध्याय


डॉ. देवराज उपाध्याय ने अपनी पुस्तक 'साहित्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन' में मनोविश्लेषण के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पक्षों पर गहराई से विचार किया है। उन्होंने आलोचना में मनोविश्लेषण को अत्यन्त उपयोगी माना है। क्योंकि इसने मनुष्य की उन मूल प्रवृत्तियों को समझने और समझाने का प्रयत्न किया है जो युग- युग से महान् साहित्यकारों को प्रेरित करती रही हैं। डॉ० उपाध्याय मनुष्य के स्वप्न तन्त्र और साहित्य के रचना- तन्त्र में समानता देखते हैं। वे साहित्य में अन्तर्निहित तत्त्व की खोज को आलोचना का मुख्य कार्य मानते हैं।