प्रगतिशील लेखक संघ का उदय - Rise of Progressive Writers Association

भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में समाजवादी चेतना के प्रसार से देश के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को समाजवादी समाज के निर्माण की दृष्टि से चिन्तन और लेखन की प्रेरणा मिली और उन्होंने समाज के निर्माण की समस्याओं को समझने के गम्भीर प्रयास किए। 'जागरण' पत्र के सम्पादकों और लेखकों में सम्पूर्णानन्द और नरेन्द्र देव जैसे समाजवादी नेताओं के साथ प्रख्यात कथाकार प्रेमचंद भी थे। प्रेमचंद ने 'हंस' में 'महाजनी सभ्यता' शीर्षक से लिखे गए सम्पादकीय में समाजवाद की सफलता का स्वागत किया।


सन् 1936 तक आते-आते भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और कॉग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के विचारधारात्मक हस्तक्षेप ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को शोषण और उत्पीड़न से मुक्त एक नये समाज के निर्माण के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ाने और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को तीव्र करने का रास्ता दिखाया। साहित्य और कला के क्षेत्र में भी इस वैचारिक परिवर्तन का गहरा प्रभाव हुआ। प्रगतिशील आन्दोलन का आरम्भ इसी परिवेश में प्रतिबद्ध रचनाशीलता के सृजनात्मक अभियान के रूप में हुआ।


प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लेखक और कलाकार संगठित होकर फासिज्म और साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपना प्रतिरोध प्रकट कर रहे थे।

इस प्रतिरोध को संगठित रूप देने के उद्देश्य से सन् 1936 में पेरिस में ई. एम. फोर्स्टर की अध्यक्षता में 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' की स्थापना की गई। इसी से प्रेरित होकर लंदन प्रवासी कुछ विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों ने 'भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना की। मुल्कराज आनन्द इसके अध्यक्ष और सज्जाद ज़हीर सचिव चुने गए। सज्जाद ज़हीर ने भारत आकर प्रतिष्ठित लेखकों और बुद्धिजीवियों का समर्थन प्राप्त किया और आन्दोलन के लिए प्रतिबद्ध लोगों के प्रयासों का समन्वय किया।

09 और 10 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में 'अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ' का प्रथम सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें भारत की लगभग सभी भाषाओं के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया । सम्मेलन के अध्यक्ष पद से बोलते हुए प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचंद ने घोषणा की कि "हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो जो इसमें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।"


प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण, प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र और सम्मेलन की बैठकों में पढ़े गए पत्रों और उन पर हुई बहसों से साहित्य की सामाजिक भूमिका की व्याख्या हुई तथा प्रगतिशील आन्दोलन का उदय हुआ । प्रेमचंद ने 'प्रगतिशील लेखक संघ नाम की उपयुक्तता पर सन्देह प्रकट किया था । उन्होंने कहा था कि साहित्यकार स्वतः प्रगतिशील होता है।


भारत में प्रगतिशील लेखक संघ के गठन से पूर्व लेखकों को संगठित करने के प्रयास शुरू हो चुके थे। अख्तर हुसैन रायपुरी ने कलकत्ता से प्रकाशित पत्र 'विश्वमित्र' में 'साहित्य और क्रान्ति' शीर्षक लेख लिखकर साहित्य की सामाजिक भूमिका की व्याख्या की थी।

सन् 1934 में रामनरेश त्रिपाठी, किशोरीदास वाजपेयी और प्रेमचंद के संयोजन में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा और सहकारी प्रकाशन संस्थान खोलने के उद्देश्यों को लेकर लेखक संघ के गठन की कोशिश हो चुकी थी। इस दिशा में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, जैनेन्द्र कुमार और महात्मा गाँधी की भूमिकाएँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण रहीं। बाद में प्रेमचंद ने इनके सहयोग से 'भारतीय साहित्य परिषद्' की स्थापना की और अक्टूबर 1935 से 'हंस' 'भारतीय साहित्य परिषद' के मुखपत्र के रूप में प्रकाशित होने लगा। 'भारतीय साहित्य परिषद्' के प्रस्तावों में प्रगतिशील साहित्य का समर्थन करने का रुख दिखाई देता है।


किसी भी साहित्यिक आन्दोलन में सृजनात्मक साहित्य के साथ-साथ एक विशिष्ट आलोचना प्रणाली भी विकसित हो जाती है। प्रगतिवादी आन्दोलन में आलोचना-साहित्य ने साहित्य की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करते हुए सृजन और समीक्षा सम्बन्धी विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श कर अनेक साहित्यिक समस्याओं का निराकरण प्रस्तुत किया तथा आन्दोलन को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया। प्रगतिशील आन्दोलन की पृष्ठभूमि में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रेमचंद निराला और जयशंकर प्रसाद के प्रगतिशील साहित्यिक प्रतिमानों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।


सन् 1930 के आस-पास छायावाद की भावुकता और रहस्यवाद तथा उसकी स्वच्छन्दता और काल्पनिकता के बीच अन्तर्विरोध बढ़ रहा था। कविता में कल्पना के स्थान पर यथार्थ और वैयक्तिकता के स्थान पर सामाजिकता की भावना प्रबल हो रही थी। इससे नये प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी। प्रेमचंद की बढ़ती हुई लोकप्रियता में ये संकेत स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्य के सामाजिक मूल्यांकन की दिशा में आगे बढ़ते हुए लिख रहे थे कि "मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। उसका अपनी सत्ता का ज्ञान तक लोकबद्ध है। लोक के भीतर ही कविता क्या किसी भी कला का प्रयोजन और विकास होता है।" साहित्य की रचना,

उद्देश्य और उसके प्रभाव के बारे में शुक्ल जी की दृष्टि बहुत स्पष्ट और वैज्ञानिक थी । प्रगतिवादी आलोचना ने शुक्ल जी की वैचारिक ज़मीन से खड़े होकर अपना रूप प्राप्त किया और आगे बढ़ी।


मार्क्सवाद के वैचारिक आधार पर इन पूर्ववर्ती प्रगतिशील प्रतिमानों का व्यवस्थित विकास करके ही प्रगतिशील आलोचना विकसित हुई है। तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों और टिप्पणियों तथा शिवदान सिंह चौहान, रामविलास शर्मा, राहुल सांकृत्यायन, प्रकाशचन्द्र गुप्त, चन्द्रबली सिंह, अमृतराय, रांगेय राघव, मन्मथनाथ गुप्त, हंसराज रहबर, महेंद्र भटनागर, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल आदि की कृतियों में प्रगतिशील आलोचना का स्वरूप प्रकट हुआ है।