अपभ्रंश की प्रमुख विशेषताएँ - Salient Features of Apabhramsa

अपभ्रंशकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(1) अपभ्रंश में लगभग वे ही ध्वनियाँ थी जिनका प्रयोग प्राकृत में होता था। हस्व ए हस्व ओ और इ, ढ थे। यद्यपि लिखने में उनके लिए किसी नये चिह्न का प्रयोग नहीं होता था। कभी ए ओ और कभी इ उ का ऐं ओं के लिये प्रयोग कर दिया जाता था। ऋ का लेखन में प्रयोग था किन्तु स्वरूप में ध्वनि नहीं थी । श, ष के स्थान पर स ही प्रचलित था। 'श ध्वनि केवल मागधी अपभ्रंश में थी। वर्तमान भाषाओं को देखने से यह भी अनुमान लगता है कि विभिन्न अपभ्रंश में 'अ' का उच्चारण विवृत, अर्द्धविवृत आदि विभिन्न रूपों में होता है। ळ महाराष्ट्री आदि कई में था।


(ii) स्वरों का अनुनासिक रूप वैदिकी, संस्कृत, पालि, प्राकृत में था। अपभ्रंश में भी वह मिलता है। ऋ को छोड़कर सभी के अनुनासिक रूपों का प्रयोग अपभ्रंश में है । 


(iii) संगीतात्मक और नलात्मक स्वराघात की दृष्टि से अपभ्रंश की वही स्थिति थी, जो पालि, प्राकृत में थी।


(iv) अपभ्रंश एक उकार बहुला भाषा थी । 'ललित-विस्तर' तथा 'प्राकृत-धम्मपद' आदि गाथा तथा प्राकृत के ग्रन्थों में भी यह प्रवृत्ति मिलती है, किन्तु वहाँ यह प्रवृत्ति अपने बीज रूप में है। अपभ्रंश में यह बहुत अधिक है, जहाँ से यह ब्रजभाषा या अवधी आदि को मिली है। (जैसे एक्कु, करणु, पियासु, अंगु मूलु और जगु आदि ।


(v) ध्वनि-परिवर्तन की दृष्टि से जो प्रवृत्तियाँ (लोप, आगम, विपर्यय आदि) पालि में शुरू होकर प्राकृत में विकसित हुई थीं, उन्हीं का यहाँ आकर और विकास हो गया।


(vi) शब्द के अन्तिम स्वर के ह्रस्व होने की प्रवृत्ति प्राकृत में भी थी किन्तु अपभ्रंश में बढ़ गई।


(vii) अपभ्रंश में स्वराघात प्रायः आद्यक्षर पर था, इसलिए आद्यक्षर का स्वर यहाँ प्रायः सुरक्षित मिलता है। जैसे- माणिक्य- माणिक्क, घोटक घोडअ।


(viii) मका व (प्राकृत आमलम, अपभ्रंश ऑवल अ, कमल > कवल), व का ब (वचन > ब अण),

ण्ण का न्ह (कृष्ण > कान्ह), क्ष का क्ख या च्छ (पक्षी पक्सी पच्छी), स्म का म्ह (अस्मै > अम्ह), य का ज (युगल > जुगल), ड, द, न र के स्थान पर 'ल' (प्रदीप्त > पलित्त) आदि रूप में ध्वनि विकास की बहुत सी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं।


(ix) परवर्ती अपभ्रंश में समीकरण के कारण उत्पन्न संयुक्तता में एक व्यंजन बच जाता है और पूर्ववर्ती स्वर


में क्षतिपूरक दीर्घीकरण हो गया (सं. तस्य, प्रा. तस्स, अप., तासु कस्य कासु) ।


(x) पालि, प्राकृत में विकास तो हुआ था किन्तु सब कुछ ले देकर वे संस्कृत की प्रवृत्ति से अलग नहीं थी ।

अपभ्रंश पूर्णतः अलग हो गई और वह प्राचीन की अपेक्षा आधुनिक भारतीय भाषाओं की ओर अधिक झुकी है।


(xi) भाषा में धातु और नाम दोनों रूप कम हो गए। इस प्रकार भाषा अधिक सरल हो गई। (xii) वैदिकी, संस्कृत, पालि तथा प्राकृत संयोगात्मक भाषाएँ थीं । प्राकृत में वियोगात्मकता या


अयोगात्मकता के लक्षण दिखाई देने लगे थे किन्तु अपभ्रंश में आकर ये लक्षण प्रमुख होगए। (xiii) संज्ञा सर्वनाम से कारक के रूप के लिये संयोगात्मक भाषाओं में केवल विभक्तियाँ लगती हैं, जो जुड़ी होती हैं।

किन्तु वियोगात्मक भाषाओं में अलग से शब्द लगाने पड़ते हैं, जो अलग रहते हैं। हिन्दी में 'ने, को, में, से' आदि ऐसे ही अलग शब्द है। प्राकृत में इस तरह के दो तीन शब्द मिलते हैं, किन्तु अपभ्रंश में बहुत से कारकों के लिये अलग शब्द मिलते हैं जैसे करण के लिये सहुँ तण, सम्प्रदान के लिए केहि रेसि अपादान के लिये थिड, होन्त, सम्बन्ध के लिये केर, कर, का और अधिकरण के लिये मह, मञ्झ आदि।


(xiv) संयोगात्मक भाषाओं में तिङ प्रत्यय के योग से काल और भाव की रचना होती है। वियोगात्मक भाषाओं में सहायक क्रिया के सहारे कृदन्तीय रूपों से ये बातें प्रकट की जाती हैं।

इस प्रकार की वियोगात्मक प्रवृत्तियाँ प्राकृत में अपनी झलक दिखाने लगी थीं, किन्तु अब ये बातें बहुत स्पष्ट हो गयीं। संयुक्त क्रिया का प्रयोग होने लगा। तिङ्न्त रूप कम रह गए।


(xv) नपुंसकलिंग समाप्त प्रायः था।


(xvi) अकारान्त पुल्लिंग प्रतिवादिकों की प्रमुखता हो गई। अन्य प्रकार के थोड़े बहुत प्रतिपादिक थे भी तो उन पर इसी के नियम प्रायः लागू होते थे। इस प्रकार इस क्षेत्र में एकरूपता आ गई। (xvii) कारकों में रूप बहुत कम हो गए अपभ्रंश में लगभग छह रूप रह गए, दो वचनों और तीन कारकों -


1. कर्त्ता, कर्म, सम्बोधन, ii. करण, अधिकरण, iii. सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध के । (xviii) स्वार्थिक प्रत्यय - 'ड' का प्रयोग अधिक होने लगा, राजस्थानी आदि में यही ड़ड़ी, ड़िया आदि रूपों में मिलता है।


(xix) उपर्युक्त कारणों के परिणामस्वरूप वाक्य के शब्दों के स्थान निश्चित हो गए।


(XX) अपभ्रंश के शब्द भण्डार की प्रमुख विशेषताएँ हैं-


(क) तद्भव शब्दों का अनुपात अपभ्रंश में सर्वाधिक है।


(ख) दूसरा नम्बर देशज शब्दों का है, क्रिया शब्दों में भी ये शब्द पर्याप्त हैं। ध्वनि और दृष्टि के (ग) तत्सम शब्द अपभ्रंश के पूर्वार्द्ध काल में बहुत कम हैं किन्तु उत्तरार्द्ध में उनकी संख्या बढ़ गई है ।


आधार पर बने नये शब्द भी अपभ्रंश में बहुत हैं।


(घ) इस समय तक भारत का पर्याप्त विदेशी सम्पर्क हो गया था, इसी कारण उत्तरकालीन अपभ्रंश में


कुछ विदेशी शब्द भी आ गए हैं। जैसे- ठठ्ठा, ठक्कुर, नीक, तुर्क, तहसील, नौबती आदि ।