पालि की प्रमुख विशेषताएँ - Salient Features of Pali

पालि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(i) पालि में वैदिक संस्कृत की 5 स्वर ध्वनियाँ लुप्त हो गईं ऋ, ऋ, लृ, ऐ औ । -


(ii) पालि में वैदिक संस्कृत के 5 व्यंजन लुप्त हो गए श, ष, विसर्ग () जिहामूलीय, उपध्मानीय । (iii) पालि में दो नये स्वर आ गए, हस्व ऍ, हस्व ओ ।


पालि में वैदिक संस्कृत के दो व्यंजन ळ् ळह भी मिलते हैं।


(v) पालि में संस्कृत के ऐ > ए, औ> ओ हो गए हैं।


(vi) पालि में संयुक्तवर्ण से पूर्ववर्ती दीर्घ को हस्व हो जाता है, यदि दीर्घ स्वर रहेगा तो संयुक्त व्यंजन में से


एक का लोप हो जाएगा।


जीर्ण>जिण्ण, दीर्घ दीघ


vii) अघोष वर्ण घोष हो जाता है क् गं प्रतिकृत्य पटिक च्च च् >> ज् स्रुच् > सत्रुजा त् द्- वितस्ति विदति ।


(viii) ड, ढ को ळ, न्वह । बडवा > बळवा ।


(ix) सन्धियों में केवल तीन सन्धियाँ हैं. स्वर सन्धि ii. व्यंजन सन्धि iii. निग्गहीत (अनुस्वार) सन्धि । विसर्ग सन्धि आदि नहीं है।


(x) पालि में हलन्त शब्द नहीं है। केवल अजन्त ही है। हलन्त शब्दों को अकारान्त बना देते हैं या अन्तिम व्यंजन का लोप कर देते हैं।


धनवत् > धनवन्त, अस्मन् > अन्त (xi) पालि में द्विवचन नहीं होता है।


(xii) पालि में तीनों लिंग हैं।


(xiii) शब्द रूपों में चतुर्थी और षष्ठी के रूप समान होते हैं।


(xiv) स्त्री प्रत्यय सात हैं- आ, ई, इनी, नी, उनानी, ऊ, ति, अजा, कुमारी, यक्खिनी, दण्डिनी, मातुलानी,


वामोए, युवति। (xv) पालि में 500 से अधिक धातुएँ हैं। 9 गण हैं। अक्षादि और जुहोत्यादि नहीं हैं। क्रियादि के दो भेद


हैं- ना, णा वाले।


(xvi) पालि में लोट् लकार वाले भी रूप मिलते हैं हनासि, दहासि


(xvii) पालि में णिच्, सन्, यङ् नामधातु, प्रत्यय वाले रूप मिलते हैं।


(xviii) पालि में वैदिक संस्कृत के तुल्य तुम् अर्थ वाले अनेक प्रत्यय मिलते हैं। जैसे- तुम, तवे, तुये, जि>


जिनतुम हा > पहातवे, गण्- गणेतुये ।


(xix) आत्मनेपद का प्रयोग प्रायः लुप्त हो गया। परस्मैपद शेष रहा।


(XX) टर्नर आदि के अनुसार पालि में दोनों प्रकार का स्वराघात था संगीतात्मक और बलाघात्मक ।


(xxi) पालि में तद्भव शब्दों का आधिक्य हैं। तत्सम और देशज शब्द कम हैं।