वाक्य : स्वरूप एवं संरचना - Sentence: Form and Structure

वाक्य का स्वरूप

जब भी हमें अपने मन की बात दूसरों तक पहुँचानी होती है या किसी से बातचीत करनी होती है तो हम वाक्यों का सहारा लेकर ही बातचीत करते हैं। यद्यपि वाक्य की रचना विभिन्न पदों के योग से होती है और हर पद का अपना अलग अर्थ होता है पर वाक्य में आए सभी घटक परस्पर मिलकर एक पूरा विचार या सन्देश प्रकट करते हैं। वस्तुतः वाक्य भाषा की लघुतम इकाई है जो स्वयं में एक पूर्ण एवं स्वतन्त्र रचना होती है तथा किसी भाव या विचार को पूर्णतः व्यक्त कर पाने में समर्थ होती है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि 'वाक्य' मानव मन के भावों और विचारों को व्यक्त करने वाली भाषा की लघुतम इकाई है। देखिए वाक्यों के कुछ उदाहरण-

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(1) बच्चे पतंग उड़ा रहे हैं।


(ii) सब लोग बहस कर रहे हैं।


(iii) किसान खेतों में हल चला रहे हैं।


(iv) नौकर काम कर रहा है।


(v) बच्चों ने खाना खा लिया है।



(vi)


किताब मेज़ पर रखी है।


वाक्य की संरचना

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यदि वाक्यों की संरचना पर ध्यान दें तो स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि वाक्यों की रचना मुख्यतः 'कर्त्ता (संज्ञा पदबंध) तथा 'क्रिया' (क्रिया पदबंध) दो अंशों से मिलकर होती है। क्रिया पदबंध के बिना तो वाक्य हो ही नहीं सकता। यदि हम कहते हैं 'लड़के ने बिल्ली को डंडे से तो यह वाक्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि - इसमें 'क्रिया पदबंध' नहीं है। जब इसमें क्रिया पदबंध को भी जोड़ दिया जाता है तभी यह वाक्य बनता है जैसे- - 'लड़के ने बिल्ली को डंडे से मारा।' अतः ध्यान रखिए बिना क्रिया पदबंध के वाक्य नहीं बनता। प्राचीन शब्दावली में 'कर्त्ता' को 'उद्देश्य' तथा 'क्रिया पदबंध' को 'विधेय' कहते थे। अतः यह कहा जा सकता है कि वाक्य की रचना दो अंशों के मिलने से होती है- 'उद्देश्य' तथा 'विधेय' ।

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उद्देश्य -


उद्देश्य वाक्य का वह भाग है जिसके विषय में वाक्य में कुछ कहा जाता है या विधान किया जाता है। इसके अन्तर्गत कर्त्ता एवं कर्त्ता के विस्तारक आते हैं।


विधेय-


विधेय वह अंश है जिसका विधान उद्देश्य के लिए किया जाता है। विधेय के अन्तर्गत क्रिया पदबंध तथा


उसके विस्तारक आते हैं, जैसे-


'उद्देश की रचना में 'कर्ता' तथा 'कर्त्ता के विस्तारक' और 'विधेय' की रचना में 'विधेय' तथा 'विधेय के विस्तारक' आते हैं तथा वाक्य स्वयं में पूर्ण तथास्वतन्त्र होता है।