सामाजिक मूल्य बनाम साहित्यिक मूल्य - Social Values vs Literary Values

समाजशास्त्र और आलोचना से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सामाजिक मूल्यों और साहित्यिक मूल्यों के सहसम्बन्ध का है। क्या जिस समाज में साहित्य का सृजन हुआ है उसके सामाजिक मूल्यों को साहित्य में हू-ब- हू स्थानान्तरित किया जा सकता है ? निश्चित ही सीधे और सरल ढंग से ऐसा नहीं किया जा सकता। जिन सामाजिक परिस्थितियों से प्रेमचंद के कलात्मक विवेक का निर्माण हुआ था,

वे भारतीय समाज के सामन्तवादी- साम्राज्यवादी शोषण और दमन की परिस्थितियाँ थीं। सामाजिक विकास की दृष्टि से भारत का यह समय बुरा समय था। लेकिन उस समय में सृजित प्रेमचंद साहित्य को, जिसमें उन परिस्थितियों का चित्रण भी है, बुरा नहीं कहा जा सकता। अकाल एक विनाशकारी परिघटना है, लेकिन उसके साथ संघर्ष करते हुए मनुष्य के साहस और जिजीविषा का कलात्मक चित्रण साहित्य को महान् बना देता है। साहित्यिक मूल्यों और सामाजिक मूल्यों का सम्बन्ध सामाजिक यथार्थ के ज्ञान के साथ-साथ रचना के उद्देश्य,

रचनाकार के व्यक्तित्व और सामाजिक यथार्थ को समझने के उसके विवेक पर भी निर्भर होता है। हिन्दी साहित्य के भक्तिकाव्य और रीतिकाव्य के साहित्यिक मूल्यों में अन्तर इसका उपयुक्त उदाहरण है। अतः आलोचक यदि किसी कृति के अस्तित्व में आने के कारणों और परिस्थितियों को देखना चाहता है तो समाजशास्त्र उसकी सहायता करता है, परन्तु उसके बाद उसे अन्य उपयुक्त आधारों को अपनाकर उस कृति के मूल्यांकनकी दिशा में आगे बढ़ना होगा।