हिन्दी आलोचना में साहित्य की सामाजिक दृष्टि - Social vision of literature in Hindi criticism

पण्डित बालकृष्ण भट्ट ने साहित्य को जन-समूह (नेशन) के चित्र का चित्रपट कहा था । भारतेन्दु युग के आरम्भ में ही 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है' का उद्घोष करते हुए भट्ट जी ने साहित्य की सामाजिकता को रेखांकित करते हुए उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने का प्रयास किया था। इसी परम्परा का विकास आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, डॉ. नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय आदि की आलोचना में हुआ है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को जातीय जीवन का प्रतिबिम्ब बताते हुए उसे सामाजिक शक्ति या सामाजिक कमज़ोरी तथा सामाजिक सभ्यता या असभ्यता का एकमात्र निर्णायक तत्त्व बताया।

उन्होंने सामाजिक परिवर्तन और चेतना के विकास में साहित्य की भूमिका की पहचान भी की।


हिन्दी-साहित्य में सामाजिक दृष्टि का विकास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना में सुसंगत रूप से हुआ है। 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' के आरम्भ में शुक्ल जी अपनी इतिहास दृष्टि को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं। कि "जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है।" अर्थात् साहित्य में समाज का रूप जनता की चित्तवृत्ति के माध्यम से अभिव्यक्त होता है ।

वही समाज और साहित्य के सम्बन्धों को समझने की कुंजी है। शुक्ल जी यह भी लिखते हैं कि "जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनैतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है । अतः कारणस्वरूप इन परिस्थितियों का दिग्दर्शन भी साथ ही आवश्यक होता है।" शुक्ल जी की मान्यता है कि साहित्यकार को देश- काल की सामाजिक परिस्थितियों का ज्ञान होना आवश्यक है। इस ज्ञान के अभाव में उसका लेखन कल्पना का खेल मात्र रह जाएगा, जनता की चित्तवृत्तियों का प्रतिबिम्ब नहीं बन सकेगा। शुक्ल जी ने पाठकों की रुचि और रचना की लोकप्रियता को साहित्य के विवेचन में महत्त्वपूर्ण माना है। इस प्रकार शुक्ल जी ने साहित्य और समाज के सम्बन्धों की खोज कई रूपों में की है।


आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य में सामाजिक दृष्टि को बहुत महत्त्व दिया है। उन्होंने माना है कि साहित्य के सृजन और आस्वादन दोनों ही दृष्टियों से सामाजिक मूल्यों और व्यवस्थाओं के परिवर्तन की जानकारी आवश्यक होती है, क्योंकि साहित्यिक मूल्यों के परिवर्तन से सामाजिक मूल्यों के परिवर्तन का गहरा सम्बन्ध होता है। उनके अनुसार समाज और साहित्य की विकास प्रक्रिया आपस में जुड़ी हुई है।


डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने 'साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका' और 'आलोचना की सामाजिकता' जैसी पुस्तकों में साहित्य के समाजशास्त्र के विभिन्न पक्षों का विवेचन किया है।


हिन्दी में साहित्य के समाजशास्त्रीय चिन्तन के व्यवस्थित विकास में मार्क्सवादी आलोचना का महत्त्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि मार्क्सवादी पद्धति और समाजशास्त्रीय पद्धति अलग-अलग हैं, फिर भी मार्क्सवादी चिन्तन में साहित्य को समाजशास्त्रीय आधार पर देखने-परखने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। मार्क्सवादी आलोचना में समाज और साहित्य के सम्बन्धों के विभिन्न रूपों को समझने के प्रयास हुए हैं।