समाजवादी यथार्थवाद - socialist realism
समकालीन रचनाशीलता के मूल्यांकन से ही साहित्यिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। प्रगतिशील आलोचकों ने साहित्य की परम्परा का मूल्यांकन किया, साथ ही समसामयिक साहित्य का विवेचन करते हुए अपनी साहित्यिक मान्यताओं और प्रतिमानों का परीक्षण भी किया। साहित्य की सामाजिक भूमिका, साहित्य और इतिहास दृष्टि तथा साहित्य का रूप और अन्तर्वस्तु जैसे कई विषयों पर प्रगतिवादी आलोचना ने विस्तार से वाद-विवाद और संवाद किया है। एक सुसंगत प्रगतिशील आलोचनात्मक दृष्टि एवं भारतीय सन्दर्भ में मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र के विकास के लिए साहित्य सम्बन्धी इन सभी विषयों पर विचार करना तथा उनके सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना आवश्यक कार्य था ।
प्रगतिशील लेखक संघ ने मैक्सिम गोर्की द्वारा प्रतिपादित 'समाजवादी यथार्थवाद' को साहित्यिक विषयों की व्याख्या के लिए स्वीकार किया। इसके अन्तर्गत साहित्य की ऐतिहासिक व्याख्या करते हुए समाज और साहित्य के अन्योन्याश्रय सम्बन्धों का उद्घाटन किया जाता है तथा सामाजिक परिवर्तन के लिए सचेतन रूप से साहित्यकारों को प्रेरित किया जाता है। 'समाजवादी यथार्थवाद' के अनुसार केवल लेखक की विचारधारा को आधार बनाकर किसी रचना का मूल्यांकन करना उचित नहीं है वास्तव में देखा यह जाना चाहिए कि कोई रचनाकार अपने युग की ऐतिहासिक शक्तियों और विचारधारा से किस प्रकार के सम्बन्ध कायम करता है।
शोषित वर्ग के सौन्दर्यबोध का चित्रण करने में वह कितना सफल हुआ है तथा कोई रचना वर्गहीन समाज के निर्माण की दृष्टि से क्या प्रयास करती है। इस प्रकार वर्ग सापेक्ष सौन्दर्य-दृष्टि ही समाजवादी यथार्थवाद के साहित्यिक मूल्यों का आधार है।
वर्गीय दृष्टिकोण और वर्ग संघर्ष का कलात्मक चित्रण
प्रगतिवादी आलोचना वर्गीय दृष्टिकोण से सामाजिक यथार्थ के चित्रण पर बल देती है। उसके अनुसार वही साहित्य श्रेष्ठ और मूल्यवान् है जिसमें समाज के शोषित वर्ग की समस्याओं को उभारा गया हो और एक वर्गहीन समाज की स्थापना को महत्त्व दिया गया हो।
इसमें समाज में व्याप्त शोषण और भेदभाव को समाप्त कर समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाला साहित्य उत्कृष्ट साहित्य माना जाता है।
प्रगतिवादी आलोचक मानते हैं कि रचना के साहित्यिक और सामाजिक मूल्यों में कोई विरोध नहीं है । साहित्य जनजीवन से शक्ति प्राप्त करता है, साहित्य का सम्बन्ध जनजीवन से जितना गहरा और घनिष्ठ होता जाएगा उसकी शक्ति भी बढ़ती जाएगी। रचना का सौन्दर्य और शक्ति जनता से उसके सम्बन्ध पर निर्भर है। वह जनता के वास्तविक जीवन के जितना अधिक निकट होगा उसका सौन्दर्य और शक्ति उतनी ही बढ़ी हुई होगी।
साहित्य के वास्तविक सौन्दर्य की सृष्टि लोकजीवन के व्यापक स्वरूप के उद्घाटन द्वारा ही होती हैं। सौन्दर्य की सत्ता समाज में व्याप्त शोषण के मार्मिक चित्रण और उससे मुक्ति के मार्ग की खोज में निहित है। अपनी व्यापक मानवीय सहानुभूति द्वारा रचना में जीवन-यथार्थ के विविध रूपों और स्तरों का अनुभव करते हुए रचनाकार जीवन और साहित्य का स्तर भी ऊपर उठाता है। प्रगतिवादी आलोचकों ने किसानों और मजदूरों के श्रम एवं भारत की शोषित पीड़ित आम जनता के जीवन-संघर्ष के चित्रण में साहित्य का सौन्दर्य देखा है।
सामाजिक यथार्थ के चित्रण को महत्त्व देने का अर्थ यह नहीं है कि साहित्य में कल्पना और आदर्श की एकदम उपेक्षा कर दी गई हो। कल्पना और आदर्श का महत्त्व है, लेकिन यह महत्त्व तब तक है जब तक उनका यथार्थ के साथ सम्बन्ध बना हुआ है। यथार्थ से विच्छिन्न कल्पना और आदर्श का प्रगतिवादी आलोचना तिरस्कार करती है।
रूप और विषयवस्तु
प्रगतिवादी आलोचना में साहित्य के रूप और विषयवस्तु दोनों को महत्त्वपूर्ण मानते हुए भी विषयवस्तु की प्रधानता स्वीकार की गई है। साहित्य की विषयवस्तु और रूप का वैशिष्ट्य और इनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि "रूप और विषयवस्तु का सम्बन्ध अभिन्न और अन्योन्याश्रित है।”
डॉ॰ शर्मा के अनुसार साहित्य की विषयवस्तु और कलात्मक पक्ष दोनों महत्त्वपूर्णहैं और दोनों की एकता ज़रूरी है। लेकिन साहित्य के लिए विषयवस्तु और कला दोनों का महत्त्व एक समान नहीं है। साहित्य में निर्णायक भूमिका हमेशा विषयवस्तु की होती है। केवल कला को निखारने का प्रयास करके उत्कृष्ट साहित्य की रचना नहीं की जा सकती, उसके लिए उच्चकोटि के विचार, भावबोध और यथार्थ का ज्ञान होना आवश्यक है। जिसके पास विषयवस्तु है, वह प्रयत्न करके उसे कलात्मक रूप दे देगा। साहित्यिक रचना की भाषा और शैली आदि तत्त्व विषयवस्तु को प्रभावशाली बनाते हैं। प्रगतिवादी आलोचना साहित्य में सुबोध और सरल भाषा को महत्त्वपूर्ण मानती है। जो भाषा और शैली सामान्य जन जीवन से अपने को समृद्ध करती है उसकी प्रेषणीयता में भी वृद्धि होती है । जन-जीवन की सादगी, सरलता और सहजता भाषा और साहित्य दोनों को समृद्ध और सम्प्रेषणीय बनाती है।
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