समाजशास्त्र और साहित्य-समीक्षा - sociology and literary criticism

साहित्य और समाजशास्त्र दोनों का कार्य मनुष्य के जीवन और समाज का विवेचन करना, उसका मार्गदर्शन करना एवं समाज के व्यापक हित में उसकी समस्याओं का समाधान ढूँढना है। व्यक्ति सामाजिक अनुभवों से अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता है, अपनी सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण करता है और सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति करता है।


किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में समाजशास्त्रीय अध्ययन और अनुसंधान से प्राप्त समाजविशेष के ज्ञान को साहित्यिक कृतियों के विश्लेषण का आधार कैसे बनाया जा सकता है ? क्या इस सामाजिक ज्ञान से कृति की भाषा, शैली और अन्तर्वस्तु को सही सन्दर्भ में समझने में कोई सहायता मिलती है ? और क्या सामाजिक तथ्यों का ज्ञान साहित्य-सृजन और पठन-पाठन की प्रवृत्तियों पर कोई प्रकाश डाल सकता है ? साहित्य की आलोचना में ऐसे कई प्रश्नों से हमारा सामना होता है।

यह कहना साहित्य को एक उपयोगी वस्तु में बदल देना है कि उस विशेष कालखण्ड में समाजविशेष के लिए किसी रचना ने बहुत महत्त्वपूर्ण सामाजिक प्रकार्य का निर्वाह किया है, इसलिए वह एक अच्छी रचना है। साहित्य के मूल्य उसकी तात्कालिक सामाजिक उपयोगिता के आधार पर निर्धारित नहीं किए जा सकते । सामयिकता साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण गुण है,

लेकिन सामयिकता और देश-काल से आगे बढ़कर मनुष्य के जीवन और चरित्र को उच्चतर बनाना साहित्य का स्थायी मूल्य है। समसामयिक सामाजिक कारकों का साहित्यिक विधाओं और प्रविधियों पर बहुत प्रभाव होता है। लेखक की अन्तर्दृष्टि सामाजिक मूल्य- व्यवस्था से प्रभावित होती है। लेखक की दृष्टि में जो सामाजिक मूल्य अच्छे होते हैं उन्हें वह सकारात्मक सन्दर्भों में प्रस्तुत करता है और बुरे तथ्यों और मूल्यों के प्रति उसका दृष्टिकोण नकारात्मक रहता है। इन सब बातों का प्रभाव रचना की विषयवस्तु और रूप पर पड़ता है।

समाजशास्त्र यह समझने में आलोचक की सहायता करता है। कि कोई रचना जैसी है वैसी ही क्यों है ? सामाजिक तथ्य साहित्य को प्रभावित करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि साहित्य में उन तथ्यों की उपस्थिति उसी रूप में दर्शायी जाय। यदि किसी लेखक की प्रतिभा के प्रस्फुटन में उसकी शारीरिक-मानसिक कठिनाइयाँ और कष्ट मुख्य कारण हैं, इसलिए यह कहा जाय कि कठिनाइयाँ और कष्ट अच्छे होते हैं, तो यह समाजशास्त्र और आलोचना दोनों के साथ अन्याय है।