समाजशास्त्रीय आलोचना का उद्भव और विकास - sociology and literary criticism
साहित्य के समाजशास्त्र का उद्भव और विकास यूरोप में शास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक दृष्टि के स्थान पर समाज के सन्दर्भ में साहित्य की विवेचना करने की परम्परा के रूप में हुआ है। प्लेटो की अनुकरण विषयक अवधारणा में साहित्य को समाज के प्रतिबिम्ब के रूप में देखने का विचार विद्यमान है। लेकिन यूरोप में साहित्य को समाज के सन्दर्भ में देखने की परम्परा की शुरूआत उन्नीसवीं सदी के आरम्भ के साथ हुई थी। इसकी शुरूआत फ्रांस की मदाम द स्ताल (1766-1817) के लेखन से हुई।
1800 ई. में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सामाजिक संस्थाओं के साथ सम्बन्धों के सन्दर्भ में साहित्य' ('द ला लित्रेत्युर दाँ से रैपो आवेक लेजिंस्तित्युशां सोशियाल्') में समाज और सामाजिक संस्थाओं के पारस्परिक सम्बन्धों पर विस्तारपूर्वक विचार किया गया है। मदाम दस्ताल ने मार्क्सवाद के उद्भव से पहले अपने क्रान्तिकारी चिन्तन के आधार पर युग चेतना और जातीय चेतना जैसी अवधारणाओं के विकास के अनन्तर साहित्य के सामाजिक स्वरूप, उसकी ऐतिहासिकता और सामाजिक संस्थाओं के साथ उसके सम्बन्धों को समझने का प्रयास किया था। उन्नीसवीं सदी में साहित्य के स्वतन्त्र समाजशास्त्र का विकास नहीं हो पाया था। कला और साहित्य के इतिहास के अन्तर्गत ही उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और सामाजिक सम्बन्धों की चर्चा कर ली जाती थी।
मदाम दस्ताल के समकालीन दार्शनिक जोहन्न गोल्फ्रेड हर्डर ने (1744-1803) ने काण्ट के इस सिद्धान्त का खण्डन किया कि सौन्दर्य का बोध विशुद्ध अनासक्त विवेक से ही प्राप्त किया जा सकता है। उनका तर्क था कि किसी भी साहित्यिक रचना की जड़ें विशेष सामाजिक और भौगोलिक वातावरण में होती हैं। हर्डर ने प्राकृतिक विज्ञान, इतिहास और मनोविज्ञान पर आधारित पूर्णतया अनुभवमूलक सौन्दर्यशास्त्र का प्रस्ताव किया।
फ्रांसीसी दार्शनिक और आलोचक ईपॉलीत अडोल्फ़ तेन (1828-1893) ने साहित्य और समाज के मध्य सम्बन्ध का व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया।
अपनी पुस्तक 'अंग्रेज़ी साहित्य का इतिहास (1864) की भूमिका में तेन ने लिखा है कि "कोई साहित्यिक कृति न तो व्यक्ति की कल्पना की क्रीड़ा है, न किसी उत्तेजित मन की भटकी हुई अकेली तरंग। वह समकालीन रीति-रिवाजों का पुनर्लेखन है और एक विशेष प्रकार के मानस की अभिव्यक्ति । हम महान रचनाओं से जान सकते हैं कि किसी समय समाज में मनुष्य कैसे सोचता और अनुभव करता है।" ('साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका'- मैनेजर पाण्डेय से उद्धृत) तेन के अनुसार साहित्य मुख्य रूप से परिवेश, वंश-परम्परा और रचनात्मक प्रतिभा की अभिव्यक्ति होता है। उसने साहित्य के समाजशास्त्र के चार पक्षों का उल्लेख किया है- (1) साहित्य के भौतिक सामाजिक मूलाधारों की खोज,
(2) लेखक के महत्त्व का विश्लेषण, (3) साहित्य में समाज के प्रतिबिम्बन की व्याख्या, और (4) साहित्य का पाठक से सम्बन्ध ।
रेमंड विलियम्स ने समकालीन राजनैतिक समस्याओं पर विचार करते हुए सांस्कृतिक विषयों पर गम्भीरता से चिन्तन किया है। उनका मुख्य क्षेत्र संस्कृति ही है। वे संस्कृति को जीवन की समग्र पद्धति मानते हैं। उन्होंने साहित्य, समाज और संस्कृति के बीच विद्यमान जटिल सम्बन्धों का विवेचन करते हुए 'परम्परा' को इन तीनों को जोड़ने वाली प्रमुख कड़ी बताया है। रेमंड विलियम्स ने भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, उसे हमारी अनुभूति का स्रोत भी माना है । साहित्य के समाजशास्त्र के विकास की दृष्टि से उनकी कृतियाँ - 'संस्कृति और समाज' (1958), 'दी लॉन्ग रेवॉलूशन' (1961), 'कम्यूनिकेशन' (1962) आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
साहित्य के समाजशास्त्र के विकास में आलोचनात्मक समाजशास्त्र (फ्रैंकफ़र्ट स्कूल) के समाजशास्त्री लियो लोवेंथल (1900-1993) का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। उनकी कृतियों 'लिट्रेचर एंड दी इमेज ऑफ मेन (1957), 'लिट्रेचर, पॉपुलर कल्चर एंड सोसाइटी, (1961) आदि में साहित्य की सामाजिकता का विश्लेषण किया गया है। उन्होंने साहित्य में यथार्थ की अनुभूति को यथार्थ चित्रण से अधिक महत्त्व दिया है और लेखक या कृति की सामाजिक चेतना के विश्लेषण को उसके यथार्थ चित्रण से अधिक महत्त्व दिया है।
उन्होंने साहित्य के समाजशास्त्र में मनोविज्ञान की सहायता से समाज और साहित्य के सम्बन्धों की खोज पर बल दिया है। उन्होंने पाठक की दृष्टि से साहित्य की सामाजिकता की व्याख्या करते हुए साहित्य के उत्पादन, वितरण और उपभोग की सम्पूर्ण प्रक्रिया को एक सूत्र के रूप में देखा है। उनकी दृष्टि में महान् साहित्य के साथ-साथ लोकप्रिय साहित्य भी सामाजिक दृष्टि से मूल्यवान् है क्योंकि इनके माध्यम से आधुनिक समाज की मूल्य व्यवस्था और मानवीय चेतना को समझने में बहुत सहायता मिलती है।
साहित्य के समाजशास्त्र को एक व्यापक ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आधार पर सुव्यवस्थित रूप प्रदान करने में फ्रांसीसी दार्शनिक और समाजशास्त्री लूसिए गोल्डमन का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है। 'अव्यक्त ईश्वर' (1956), 'उपन्यास के समाजशास्त्र की दिशा में' (1964), 'आधुनिक युग में सांस्कृतिक सृजन (1916) तथा 'साहित्य के समाजशास्त्र की पद्धति' (1980) आदि रचनाओं में साहित्य और समाज के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया है। गोल्डमान किसी भी साहित्यिक कृति को उसके लेखक के विचारों और अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मानते हैं।
उन्होंने अपने विवेचन में दर्शन,
मनोविज्ञान और समाजशास्त्र का सार्थक प्रयोग करते हुए साहित्य के समाजशास्त्र की ऐसी पद्धति विकसित की है जिसके आधार पर साहित्य को व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ सामाजिक प्रक्रिया की समग्रता में देखा जा सके और साहित्य की व्याख्या मनुष्य की रचनाशीलता के रूप में की जा सके।
हंगरी के विचारक जॉर्ज लुकाच कला के क्षेत्र में सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब के सिद्धान्तकार के रूप में साहित्य के समाजशास्त्र के विकास में योगदान देने वाले महत्त्वपूर्ण चिन्तक थे। लुकाच मार्क्सवादी साहित्य चिन्तन के अन्तर्गत 'यथार्थवाद' के मुख्य प्रवक्ता रहे हैं। उन्होंने 'गेटे और उनका युग' (1947), 'यथार्थवाद सम्बन्धी नियम' (1948), 'विश्व साहित्य में रूसी यथार्थवाद' (1949) और 'ऐतिहासिक उपन्यास' (1952) आदि कृतियों में प्रकृतिवाद का खण्डन करते हुए जीवन के वास्तविक सन्दर्भों में यथार्थवाद की स्थापना की। उन्होंने यथार्थवाद को ही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का साहित्यिक प्रतिनिधि माना है।
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