ध्वनि तथा वर्ण - sound and character
भाषा के दो रूप होते हैं- मौखिक तथा लिखित मौखिक भाषा भाषा का अस्थायी रूप होता है, क्योंकि मौखिक भाषा उच्चरित होते ही समाप्त हो जाती है। अतः मौखिक भाषा में सम्प्रेषण तभी सम्भव है जब वक्ता और श्रोता एक दूसरे के आमने-सामने हों। मनुष्य को जब यह अनुभव हुआ होगा कि वह अपने मन की बात दूर बैठे व्यक्ति तक या आगे आने वाली पीढ़ी तक भी पहुँचा सके तब उसे लिखित भाषा की आवश्यकता अनुभव हुई होगी और धीरे-धीरे भाषों के लिखित रूपों का विकास हुआ होगा। लिखित भाषा, भाषा का स्थायी रूप होता है। और उसमें जो कुछ भी वर्णित कर दिया जाता है वह स्थायी रूप ले लेता है।
भाषिक ध्वनियों (स्वर तथा व्यंजन) का सम्बन्ध मौखिक भाषा से होता है। वस्तुतः मौखिक भाषा का आधार मानव मुख से उच्चारित ध्वनियाँ होती हैं। भाषा को स्थायित्व प्रदान करने के लिए लिखित भाषा में इन्हीं मौखिक ध्वनियों के लिए कुछ 'लिखित चिह्न' बनाए गए जिन्हें 'लिपि चिह्न' या 'वर्ण' (letter) कहा गया। अतः ध्यान रखिए, 'वर्ण' किसी भाषिक ध्वनि का लिखित रूप है तथा 'ध्वनि' उस 'वर्ण का उच्चारित या मौखिक रूप ।
अलग-अलग लिपियों में एक ही 'ध्वनि' के लिए अलग-अलग 'वर्ण' हो सकते हैं। उदाहरण के लिए देवनागरी लिपि में प्, त्, क् जिन ध्वनियों को व्यक्त करते हैं उन्हीं ध्वनियों को रोमन लिपि में p, t, k वर्णों से व्यक्त किया जाता है।
ध्वनियों का वर्गीकरण हिन्दी की स्वर ध्वनियाँ
हिन्दी की स्वर ध्वनियाँ
हिन्दी में तीन तरह के स्वर प्राप्त होते हैं-
परम्परागत स्वर -
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ ये स्वर हिन्दी को संस्कृत से प्राप्त हुए हैं। इनमें से 'ऋ' का उच्चारण स्वर के रूप में हिन्दी में समाप्त हो गया है। हिन्दी भाषाभाषी इसका उच्चारण 'र + इ = रि' के रूप में करते हैं।
संस्कृत के 'ऋ' स्वर वाले जो शब्द हिन्दी में आ गए हैं, उनका लेखन तो 'ऋ' वर्ण से ही किया जाता है, भले ही उसका उच्चारण स्वर के रूप में नहीं होता। इसके बारे में हम अलग से विस्तार से चर्चा करेंगे।
(ii) आगत स्वर -
आगत ध्वनियाँ वे ध्वनियाँ होती हैं जो अन्य भाषाओं के आ जाने के कारण किसी भाषा में आ जाती हैं। हिन्दी में भी कुछ ध्वनियाँ जिनमें स्वर तथा व्यंजन दोनों हैं, अनेक विदेशी भाषाओं से आ गई हैं तथा इनके लिए नये वर्ण भी विकसित कर लिए गए हैं। जहाँ तक आगत स्वर का प्रश्न है हिन्दी में 'ऑ' आगत स्वर है तथा यह हिन्दी के अन्य स्वरों की तुलना में अर्थ परिवर्तन की क्षमता रखता है, जैसे-
बाल (hair), बॉल (ball), बोल (speech)
कॉफ़ी (coeffee), काफ़ी (sufficient) हॉल (hall) हाल (condition). होल (hole) आदि।
इस तरह यह कहा जा सकता है कि हिन्दी में (अंग्रेजी से) आगत 'ball', 'hall' आदि शब्द ऐसे हैं जिनमें आने वाला स्वर न तो हिन्दी के 'आ' के समकक्ष है और न ही 'ओ' के. इसीलिए इसके लिए 'आ' वर्ण के ऊपर चंद्राकर (C) मात्रा लगाकर 'ऑ' वर्ण बना लिया गया है। इससे बनाने वाले अन्य शब्द हैं डॉक्टर, टॉफी, शॉप, बॉय आदि। -
(iii) नव विकसित स्वर -
हिन्दी से जो परम्परागत स्वर प्राप्त हुए वे सब 'मौखिक' या 'निरनुनासिक' स्वर थे अर्थात् इनके उच्चारण में नासिका मार्ग बन्द रहता था और वायु केवल मुख से बाहर निकलती थी।
हिन्दी तक आते-आते सभी स्वरों का उच्चारण दो तरह से किया जाने लगा केवल मुख से हवा निकालकर - तथा मुख और नासिका दोनों से हवा बाहर निकालकर पहले प्रकार के स्वरों को ही 'मौखिक स्वर' कहा जाता है तथा दूसरे प्रकार के स्वों को 'अनुनासिक' ( nasalized vowels) । संस्कृत में 'अनुनासिक' (स्वर) नहीं थे। इनका विकास हिन्दी में ही हुआ है। 'अनुनासिकता' को लिखित भाषा में व्यक्त करने के लिए दो वर्ण 'चन्द्रबिन्दु' तथा 'बिन्दु' विकसित किए गए। जिन स्वर वर्णों - के ऊपर कोई मात्रा-चिह्न नहीं होता उनपर चन्द्रबिन्दु तथा जिन पर मात्रा-चिह्न होता है उन पर बिन्दु लगाया जाता है। देखिए कुछ उदाहरण-
सवार (स्+अ+ व् + आ + र् + अ )
सँवार (स् + अ + व् + आ + र् +अ)
गोद (ग् + ओ + द् + अ)
गोंद (11+ 347+&+39)
पूछ
( प + ऊ+छ् + अ )
(9+3+3+39)
भाग (भ् + आ + ग + अ)
भाँग (भू+ आँ + ग + अ)
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